Friday, September 24, 2021 06:25 AM

पर्यावरण में योगदान

मेरा राजा वीरभद्र सिंह जी से परिचय प्रसिद्ध पर्यावरणविद  सुंदर लाल बहुगुणा जी के माध्यम से हुआ था। अब वे दोनों ही ईश्वर के चरणों में पहुंच चुके हैं। 1983 में जब वे हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, उस समय हिमाचल प्रदेश में चिपको आंदोलन की शुरुआत हो रही थी और मैं चिपको सूचना केंद्र के प्रभारी के नाते आंदोलन में अपनी ओर से नम्र प्रयास कर रहा था। उसी सिलसिले में हम बहुगुणा जी के साथ शिमला में वीरभद्र जी से मिले। उनका वन संरक्षण के प्रति लगाव, उनके बहुगुणा जी के साथ विशेष लगाव का कारण था। एक संक्षिप्त भेंट के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि अब हिमाचल में सक्रिय वन माफिया पर नियंत्रण होने वाला है और हुआ भी। फिर आंदोलन की मांगों को लेकर 22 मार्च 1984 को विधानसभा परिसर कार्यालय में डेपुटेशन के रूप में मिले तो उन्होंने छूटते ही पहचान लिया और उलाहना देने के स्वर में कहा कि आपने आंदोलन के दौरान चीड़ के पेड़ों को नष्ट क्यों किया?

उन्हें जो गलत रिपोर्ट दी गई थी, उसके अनुसार उनका उलाहना जायज़ ही था, किंतु मैंने स्थिति स्पष्ट की और बताया कि हमने तो नर्सरियों में चीड़ और सफेदा के केवल बीज को निकाल कर उसमें पञ्च जीवन वृक्षों के बीज लगाए हैं (फल, चारा, खाद, रेशा, ईंधन और दवाई देने वाले वृक्ष), हमारी समझ से चीड़, सफेदा के पर्यावरण और स्थानीय आजीविका को हानि पहुंचाने वाले एकल प्रजाति के वन रोपण का अहिंसात्मक विरोध करने का यही प्रभावकारी तरीका था। और यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि वन विभाग सुधार वानिकी के नाम पर प्राकृतिक वनों को गर्डलिंग करके सुखा कर उस स्थान पर चीड़-सफेदा रोपण कर रहा है, जो मिट्टी और पानी का विनाश करने वाली प्रजातियां हैं और इनमें आग भी बहुत लगती है। इसके परिणामस्वरूप मैंने कई वनों में गर्डलिंग से सुखाए गए पेड़ों के फोटो दिखाए तो वीरभद्र जी दंग रह गए।

 उन्होंने वहां बैठे मुख्य अरण्यपाल श्री वीके शर्मा से पूछा कि क्या यह सच है, तो मुख्य अरण्यपाल जी के यह बताने पर कि यह सुधार वानिकी की आम प्रक्रिया है और अंग्रेजों के समय से चल रही है, तो वीरभद्र सिंह जी ने तत्काल पलट कर हमें पूछा कि आपकी मांगें क्या हैं? हमने हरे पेड़ों के व्यापारिक कटान पर प्रतिबंध की मांग के साथ-साथ चीड़, सफेदा रोपण बंद करने, बान और बुरांस को संरक्षित प्रजाति घोषित करने, सूखे ईंधन से कोयला बना कर न बेचने की मांगें रखीं। मुख्यमंत्री जी ने उसी समय आदेश दिया कि इनमें कोई भी मांग वनों और उन पर निर्भर समुदायों के विरुद्ध नहीं है, अतः आदेश पारित करके इन मांगों की स्वीकृति संबंधी सूचना सभी अरण्यपाल और वनमंडल अधिकारियों को भेजी जाए और उसकी दस प्रतियां चिपको सूचना केंद्र कामला को भेजी जाएं। जनहित के मुद्दों पर तत्काल निर्णय लेने की ऐसी हिम्मत बिरले ही देखने को मिलती है। वीरभद्र जी से पर्यावरण से संबंधित मुद्दों पर लगातार मिलना होता रहा। एक अन्य अवसर पर उन्होंने आश्वासन दिया कि थर्मल पावर को कोई स्वीकृति नहीं मिलेगी, और ऐसा ही हुआ। कोई उनके साथ असहमत भले हो सकता है, किंतु हिमाचल प्रदेश की विकास यात्रा में उनके योगदान को नकार नहीं सकता। ईश्वर उनकी आत्मा को मोक्ष प्रदान करे।

कुलभूषण उपमन्यु

अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान