Saturday, September 26, 2020 02:16 PM

कोरोना को मत बनाओ बहाना

हिमाचल जैसे राज्य में कोरोना काल, ‘करो न काल’ न बने इसके लिए सबसे अधिक सरकारी क्षेत्र को सोचना होगा। सरकारी फैसलों की तफरीह में घूमती आंखें कमोबेश पुराने ढर्रे की नई वकालत को देख रही हैं, जबकि  समय न तो चादर ओढ़कर सो रहा है और न ही खुद को खोने के लिए हमारी हथेली देख रहा है। ऐसे में  सबसे पहले सरकारी क्षेत्र को अपने औचित्य के दामन में पिछले साढ़े चार महीनों का घाटा पूरा करना होगा। आरंभिक रुझान में अगर हिमाचल सरकार का सर्वेक्षण यह बता रहा है कि पुनः लॉकडाउन कर देना चाहिए, तो इसकी तासीर समझी जाए। यह सरकारी दफ्तरों में घूमते फ्री के इंटरनेट की राय है जो कोरोना काल को भी नई कार्यसंस्कृति बना रहा है। बेशक कुछ महकमे अपने जमीनी कर्त्तव्य की पहचान में जल व विद्युत आपूर्ति या परिवहन सेवाओं का संचालन कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश का अभिप्राय ही सिमट गया है। परिवहन विभाग ने ऑनलाइन सेवाओं का मुहूर्त अगर इस दौर में ढूंढ लिया, तो जनता के सबसे अधिक सवाल तो राजस्व विभाग या अदालतों में खड़े हैं। चिकित्सा की त्वरित जरूरतों में स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता का कोई जवाब नहीं, लेकिन इससे इतर भी तो करामात चाहिए। देखना यह होगा कि जनता से जुड़े महकमे इस दौर में क्या कर रहे हैं।

शिक्षा विभाग को ही लें, तो नवाचार के बजाय निजी स्कूलों के ताने बाने में फीस को मुद्दा बनाकर सो गया या ऑनलाइन पढ़ाई के मंतव्य में सिर्फ विभागीय पगार को प्रासंगिक बनाने के नैन-नक्श बनाता रहा। हम चाहते तो सार्वजनिक क्षेत्र के ढेरों प्रश्नों का उत्तर ढूंढ पाते या जनता की राहत में नई राहें खड़ी कर देते। उदाहरण के लिए राजस्व विभाग के ढेरों प्रश्न फाइलों में बंद हैं, तो कोरोना काल में इन्हें ही झाड़ कर एक नई कवायद शुरू कर सकते थे। यानी जो मसले कभी हल नहीं हुए, उन पर माथापच्ची से हल की निगाह से जनता को राह दिखा देते। इसी तरह सरकारी दस्तावेजों का निरूपण और निर्धारण और व्यवस्थित हो सकता था। कुछ फैमिली अदालतें चाहे धीरे से ही चलतीं, तो समाज के बिगड़े स्वरूप में आशा की किरण उभर आती। इसी तरह कार्मिक व लेबर मामलों को निपटाने के लिए कोरोना काल का सदुपयोग अदालत को देवता बना देता। दरअसल कोरोना काल अपनी तरह से बजट और खर्च का नया तात्पर्य बनकर जो नसीहत  निजी क्षेत्र को दे चुका है, उसकी बानगी में सरकारी पगार का भी हिसाब होना चाहिए। निजी बनाम सरकारी क्षेत्र में कोरोना काल का यथार्थ छुपा है। अगर इस दौरान बड़े व्यापारियों ने सब्जी या मास्क बेच कर गुजारा किया, तो सरकारी खर्च के बिंदुओं को भी तो अपनी हिफाजत करनी चाहिए।

 निजी क्षेत्र ने अनावश्यक खर्च या पगार का दबाव कम करके अपने अस्तित्व का संघर्ष जारी रखा, तो इस अवधि में सत्ता की घोषणाओं का संदेश क्या होना चाहिए। क्या फिजूलखर्ची के लम्हे कम हो गए या कोरोना काल की पड़ताल में सियासत के द्वंद्व ही तय करेंगे कि क्षेत्र का असली हकदार कौन। विपक्ष खूंटों पर सवार अपनी राजनीति के केंद्र में रहेगा, तो भी यह दौर ऐसी परीक्षाओं की नकेल से बांधा नहीं जा सकता। हर राज्य को अपने संसाधनों की तस्वीर में कोरोना काल के खिलाफ हल्ला ही नहीं बोलना, बल्कि कल को नए ढंग से लिखने की शुरुआत करनी है। कल तक पहुंचना ही आज का कोरोना काल है, इसलिए अनलॉक होकर भी लॉकडाउन की परछाई रहेगी। चिंतपूर्णी मंदिर अगर इस दौरान श्रद्धालुओं तक प्रसाद पहुंचाने की व्यवस्था कर रहा है, तो कई निगम अपने उत्पादों को उपभोक्ता तक पहुंचाने की नई परिपाटी खड़ी कर सकते हैं। कुछ इसी तरह कला, भाषा एवं संस्कृति विभाग ने भी इस दौर में ऑनलाइन सुर्खियों से समा बांधा है। कोरोना काल में सरकारी क्षेत्र की क्षमता का अति सक्षम पक्ष नए प्रयोग व व्यावहारिकता तभी सिद्ध होगी अगर यह राज्य की आर्थिकी पर अपना बोझ कम करना सीख जाए।

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