Friday, September 25, 2020 08:31 AM

कोरोना पॉजिटिव से नेगेटिव होने तक: नरेश  कुमार, लेखक बैजनाथ से हैं

नरेश  कुमार

लेखक बैजनाथ से हैं

मेरे जीवन में एक और अध्याय जुड़ गया। आज मेरे शरीर में अच्छी संख्या में एंटी बॉडीज उत्पन्न हो गए हैं और मुझे खुशी है कि मैं अब एक संभावित प्लाज्मा डोनर बन गया हूं। यह इस बात का सबूत है कि साथ मिलकर हम महामारी से बच सकते हैं। मैं यह संदेश अपने सभी हिमाचलवासियों को देना चाहता हूं कि अगर हम यह विश्वास रखें कि हम इस महामारी पर विजय प्राप्त कर सकते हैं तो आधी जीत तभी हासिल हो जाती है…

कोविड के रसातल से वापसी की मेरी यात्रा किसी चमत्कार और आत्म-जागृति से कम नहीं है। सामाजिक अलगाव और बीमारी के साथ संघर्ष हमें बहुत कुछ सिखाता है। संकट से बाहर आने के बाद मैं कह सकता हूं कि यह बीमारी हमारे शरीर के लिए जो कुछ भी नकारात्मक कर सकती है, उसे अपने दिमाग पर हावी न होने दें। मुझे कुछ साल पहले ही मधुमेह का पता चला था और शायद यह मेरे परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। मैं पिछले कुछ दिनों से बुखार और खांसी से पीडि़त था। मेरी आशंका सच साबित हुई और 16 जून को मेरा कोविड टेस्ट पॉजिटिव आया। यह मेरे लिए एक बड़ा झटका था क्योंकि कोमॉर्बिडिटी की वजह से कोरोना के साथ मेरी यह लड़ाई आसान नहीं होने वाली थी। मैं अपने और उससे भी ज्यादा अपने परिवार के लिए चिंतित हो गया। परिवार से आइसोलेशन, जो पहले केवल कोविड के रिजल्ट आने तक का था, अब बढ़कर 17 दिनों का हो गया था। मैंने पूरी हिम्मत के साथ कोरोना के साथ अपना संघर्ष आरंभ किया।

मेरी दुनिया सिमट कर एक कमरे की हो गई थी। मेरे जैसे जन संचार प्रोफेशनल के लिए सबसे कठिन था सबसे कटकर आइसोलेशन में समय बिताना। इस कठिन वक्त में मेरे कार्यालय के साथियों, जन संचार के क्षेत्र के  विशेषज्ञों, मीडिया के मित्रों  और अन्य वरिष्ठों के फोन कॉल और संदेशों ने मेरे भीतर एक नए संकल्प का निर्माण किया और मुझे नकारात्मक विचारों से भी अलग कर दिया। अब मुख्य लड़ाई थी होम आइसोलेशन के दौरान अपने आपको योजनाबद्ध तरीके से शांत रखने के लिए एक प्रबंधन तंत्र विकसित करने की ताकि इस बीमारी से जुड़ी नकारात्मकता मेरे स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर प्रतिबिंबित न हो। मैंने आत्म-चिंतन किया और खुद ही तर्कसंगत तरीकों को खोजा ताकि मुझे और मेरे परिवार को प्रभावित करने वाले वायरस के डर पर काबू पाया जा सके।

मैंने आत्मज्ञान की तलाश में और इस ट्रामा से बाहर आने के लिए मेडिटेशन करना एवं विश्लेषण करना शुरू किया। मैंने ध्यान करने की अपनी नई दिनचर्या शुरू की और अपनी ऊर्जाओं को केंद्रित किया। हर दिन अपने कमरे में बैठे मैं यह कल्पना करता कि राजसी हिमालय पर बैठा हूं और आत्मबल को विकसित कर रहा हूं। इससे मुझे अपना रक्तचाप सामान्य से कम करने में मदद मिली। इस तरह ध्यान और साधना के माध्यम से मेरा मेरे अतीत से साक्षात्कार होने लगा। मैं महसूस करने लगा कि मैं हिमाचल की वादियों में चल रहा हूं और बिनवा दरिया के निश्छल बहने की कल-कल ध्वनि भी महसूस कर रहा हूं। ध्यान में मैं अपने बचपन के दोस्तों के साथ हिमालय में खेल रहा था, अपने बचपन के सुंदर दिनों को, अपनी किशोरावस्था को याद करते हुए, मुझे ऐसा भी एहसास होने लगा था कि मैं स्वर्ग में बैठे अपने पुरखों की बुद्धिमान सलाह भी सुन पा रहा हूं।

यह एक दिव्य अलौकिक अनुभूति थी जिसका शब्दों में वर्णन संभव नहीं। मैंने वास्तविकता के साथ समझौता किया और इससे दोस्ती कर ली। मैंने खुद को याद दिलाया कि जब मैं लाहुल-स्पीति एवं लद्दाख में अपने एडवेंचर्स ग्रुप के साथ मोटरबाइक और जिप्सी चला सकता हूं, लगभग 20 साल पहले जब इन क्षेत्रों में आज की तरह अच्छी सड़कें नहीं थीं और इतनी रास्ता दिखने को आधुनिक टेक्नोलॉजी भी नहीं थी, तब भी मैं इलाके के सबसे दुर्गम रास्तों पर ड्राइव करता था, तो मैं एक वायरस से क्यों नहीं लड़ सकता? अपने में साहस की भावना भरने और और इस बीमारी का सामना करने में मेरी आंखों के सामने प्रतिबिंबित मेरे अतीत का बड़ा योगदान रहा। हिमाचली होने के नाते, मेरे अंदर पहाड़ों के लिए एक नैसर्गिक आत्मीयता है और मैं अपने जीवन में प्रकृति से हमेशा जुड़ा रहा हूं। मैं मतवाली पहाड़ी नदियों में राफ्टिंग करने का शौकीन रहा हूं और इस दौरान कई बार डूबते-डूबते बचा हूं। इसने मुझे मृत्यु को काफी करीब से देखने का अनुभव भी दिया है। ब्यास, जस्कर और गंगा नदियों की बलवती और अप्रत्याशित धाराएं हमें परेशान करती हैं और दुरूह परिस्थितियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करती हैं। इस तरह उच्च ज्वार के साथ खेलने का जुनून हममें बढ़ता जाता है। मेरा हिमाचल से जुड़ाव और प्यार मेरे लिए फायदेमंद साबित हुआ। प्रकृति ने मुझे सिखाया था कि यदि आप इसे प्यार करते हैं और इसका सम्मान करते हैं तो यह हमेशा आपकी सुरक्षा का ख्याल रखेगी।

मेरा जीवन कभी भी ऐश्वर्यपूर्ण नहीं था, मैं कठिन परिस्थितियों से रूबरू होकर इस मुकाम तक पहुंचा हूं और इसने मुझमें कठिनाइयों से लड़ने और समस्याओं का निडर होकर सामना करने का बल दिया है। हिमालय की धौलाधार श्रेणी के एक साधारण किसान परिवार की पृष्ठभूमि से मुझे जीवन और प्रकृति को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिली है। हमने बिना किसी शिकायत के सकारात्मक रूप से कठिन से कठिन परिस्थितियों को संभालने का अदम्य साहस इन शक्तिशाली और खूबसूरत पर्वतों से सीखा था। यह हमारी रगों में भरी कठिन हिमालयी जीवन शैली और हमारे बुजुर्गों से विरासत में मिला आत्मबल ही था जिसने इस संघर्ष को आसान बना दिया।

17 दिनों के बाद मैंने जब अपने कमरे का दरवाजा खोला तो यह न केवल मेरे जीवन को पूरी दुनिया से जोड़ने वाला केवल ताजी हवा का एक झोंका था, बल्कि अपने परिवार को देखने, उनसे मिलने की मेरी कामना की पूर्ति का भी क्षण था, शायद यह पल हमेशा के लिए रुक जाता! उन सभी से इतने दिनों बाद रूबरू होना एक पारलौकिक अनुभव था। मेरे जीवन में एक और अध्याय जुड़ गया। आज मेरे शरीर में अच्छी संख्या में एंटी बॉडीज उत्पन्न हो गए हैं और मुझे खुशी है कि मैं अब एक संभावित प्लाज्मा डोनर बन गया हूं। यह इस बात का सबूत है कि साथ मिलकर हम महामारी से बच सकते हैं। मैं यह संदेश अपने सभी हिमाचलवासियों को देना चाहता हूं कि अगर हम यह विश्वास रखें कि हम इस महामारी पर विजय प्राप्त कर सकते हैं तो आधी जीत तभी हासिल हो जाती है। अगर कोविड संक्रमण होता है तो आपको परिस्थिति का सामना सकारात्मक मनोदशा, आत्मबल और निडर होकर करना होगा और खुद को संभालना होगा।

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