Tuesday, August 11, 2020 12:36 AM

कोरोना से जूझता पर्यटन

कोरोना से जूझती हिमाचल की प्राथमिकताएं पुनः बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं और इसीलिए पर्यटन क्षेत्र की हलचल देखी जा सकती है। हिमाचल पर बढ़ते आर्थिक दबाव का सामना अब केवल योजनाओं और नीतियों ही समीक्षा नहीं,बल्कि प्रभावित क्षेत्रों की अपनी परिपाटी भी है। कहने को सरकार ने होटलों के बंद ताले खोलने का मंत्र फूंक दिया, लेकिन पर्यटन केवल होटल व्यवसाय नहीं, इससे जुड़ा एक बड़ा तंत्र है। यह दीगर है कि पर्यटन क्षेत्र के खुलते ही कुछ ऐसे सुराख नजर आए जहां सैलानियों की आमद में शर्तों का ही लबादा उतर गया। कुल्लू घाटी में पहुंचे करीब सत्तर पर्यटकों को इसलिए लौटना पड़ा, क्योंकि उनके पास आवश्यक कोविड टेस्ट का कोई प्रमाण नहीं था, जबकि कांगड़ा में फर्जी रिपोर्ट के सहारे पर्यटक पहुंच गए। ऐसे में पर्यटन की नई परिभाषा से सारे इंजताम पुख्ता करने होंगे,जबकि पूरे उद्योग का संचालन महज एक कोशिश हो सकती है। हिमाचल का पर्यटन पिछले दो दशकों में बहुत आगे बढ़ा, तो इसके कई कारण और आर्थिक वृद्धि की एक व्यवस्था बनी है। हिमाचल में युवा व सप्ताहांत पर्यटन की कई कसौटियां बनीं जबकि साहसिक पर्यटन ने सारी गतिविधियां ही बदल दीं। वास्तव में निजी तौर पर हिमाचल ने पर्यटन के कई मुहावरे बदले और अगर अब निजी क्षेत्र ही तैयार नहीं, तो चाह कर भी परिणाम नहीं आएंगे। दरअसल हिमाचल का पर्यटन उन पहियों पर दौड़ा, जो निजी वाहनों की तादाद में दर्ज है। वे तमाम वोल्वो, ए.सी. व दूसरी बसें जिनके कंधों पर पर्यटन विराजित था, वे आज विराम में चली गईं तो कहीं सारा चक्र बाधित रहेगा। विडंबना तो यह है कि धीरे-धीरे कई रेस्तरां, गिफ्ट केंद्र तथा पर्यटन से जुड़े व्यवसाय बंद हो चुके हैं। हिमाचल सरकार सर्वप्रथम विभागीय तौर पर अध्ययन व सर्वेक्षण करते हुए यह स्पष्ट करे कि वास्तव में आफत का स्तर क्या है और किस गति से आहत हुआ यह क्षेत्र अपने दरवाजे बंद कर रहा है। पर्यटन को मोहलत चाहिए, आर्थिक मदद चाहिए या इसे अगले सीजन तक चलने की ऊर्जा देनी होगी, वरना हर होटल के आंसू पूरे पर्यटन को डुबोने की इत्तला देते रहेंगे। यह दीगर है कि वर्तमान स्थिति से हटकर जयराम सरकार अपनी पर्यटन योजनाओं का विवेचन कर रही है। बहुत सारे कार्य रुक गए हैं या योजनाओं-परियोजनाओं की फाइलें दब गईं हैं। पर्यटन समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने कमोबेश हर परियोजना को सार्थक अंजाम तक पहुंचाने का रास्ता दिखाया है और यह वक्त की नजाकत भी है कि जब तक सैलानी पूरी तरह नहीं लौटते, प्रदेश अपनी अधोसंरचना को मुकम्मल कर सकता है। यह एक तरह से अगले पर्यटन सीजन को पूरी तरह से पकड़ने की कोशिश हो सकती है। रज्जु मार्गों का निर्माण, पैराग्लाइडिंग व अन्य साहसिक गतिविधियों में इजाफा, मनोरंजन ढांचे का सुदृढ़ीकरण, टूरिस्ट गाइड ट्रेनिंग व शिल्प मेलों का आगाज करने के लिए इस दौर का इस्तेमाल करना चाहिए। पर्यटन व्यवसाय ने अपना केवल आर्थिक ढांचा ही नहीं खोया, बल्कि साहस, समर्थन व छवि भी कम की है। कल तक जो सैलानी थे, वे आज कोरोना काल के सजायाफ्ता हैं। यानी जब देश-विदेश में माहौल खुशियों के काबिल नहीं रहा, तो हिमाचल का पर्यटन उद्योग हाल फिलहाल मुस्करा नहीं सकता। यह एक साल की बाधा है या यह दौर अगले दो सालों की व्यथा है, कोई नहीं कह सकता। इसलिए पर्यटन को तात्कालिक परिदृष्य में बचाने और सुदृढ़ करने की जरूरत है। अब यह मुमकिन नहीं कि विभाग की कोरी फाइल पर हस्ताक्षर कर देने से यह क्षेत्र उन्नति कर लेगा या सरकार इसे पुराने ढर्रे से हांक पाएगी। सर्वप्रथम यह समझा जाए कि इसने किस हद तक क्या खोया है। करीब दो करोड़ पर्यटकों की आवभगत करते हिमाचल के पर्यटन ढांचे को कोरोना की जो चपत पड़ी है,उसे चंद पर्यटकों के सशर्त स्वागत से पूरा नहीं किया जा सकता है। दरअसल कोरोना ने हर तरह के पर्यटक पर ही प्रहार किया है और जब तक उसकी आर्थिक विवशताएं नहीं टूटतीं, वह कदापि नहीं लौटेगा। इस दौरान सरकार को पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों को अधिकतम राहत देने के साथ-साथ यह भी विचार करना होगा कि किस तरह पर्यटक स्थलों का मूड और शृंगार बदला जाए। वर्षों से अधूरी पड़ी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए यह एक अवसर सरीखा है। पर्यटन को सशक्त काम पर लौटाना है, तो प्रदेश को पर्यटन पुलिस को मजबूत आधार देना होगा ताकि यह जांच होती रहे कि कहीं कोई फर्जी कोविड दस्तावेजों से खलल तो नहीं डाल रहा।

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