Saturday, November 28, 2020 01:21 AM

कोरोना टीका ‘चुनावी’ नहीं

किसी बीमारी, आपदा या अन्य मानवीय संकट को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जा सकता। कोरोना वायरस चीन से भारत में आया अथवा जानवरों से फैला या संक्रमित इनसान के संपर्क में आने से फैला, अभी तक भी कोई ठोस शोधात्मक निष्कर्ष हमारे देश के सामने नहीं है। कोरोना संक्रमण के फैलाव के ये तीनों कारण ही संभव हैं। यह वायरस इतना तीव्र और तीखा है कि दुनिया में किसी भी देश के पास कारगर दवाई और इलाज आज भी नहीं है। कोरोना के इस दौर में विश्व में 4.15 करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और 11 लाख से ज्यादा मौतें भी हुई हैं। ये इलाजहीनता के ही त्रासद परिणाम हैं। बेहतर स्थिति यह है कि वैज्ञानिक और डॉक्टर विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं, विविध फॉर्मूले तैयार कर रहे हैं और लैब्स में अनुसंधान जारी हैं, लेकिन अब भी वह दिन अनिश्चित है, जब बाजार में कोरोना की औषधि या टीका उपलब्ध होंगे। दुनिया के देशों में कोरोना वायरस के खिलाफ  इनसानी टीकाकरण के अभियान शुरू होंगे और अन्य वायरस की तरह कोरोना भी निष्प्रभावी साबित होने लगेगा। ऐसे परिवेश में भाजपा ने बिहार चुनाव में कोरोना का टीका मुफ्त देने का वादा किया है, तो यह मानवता का गंभीर उपहास है। लगे हाथ तमिलनाडु और मध्यप्रदेश सरकारों ने भी मुफ्त कोरोना टीका मुहैया कराने की घोषणा की है।

वैसे जनता अब इतनी जागरूक हो गई है कि चुनाव घोषणा-पत्रों के आश्वासनों को महज ‘जुमला’ मानने लगी है, लेकिन अब भी गरीब और अनपढ़ नागरिकों की संख्या करोड़ों में है, जो अपने जर्जर हालात के कारण नेताओं और राजनीतिक दलों की घोषणाओं की तरफ  एक भरी-पूरी उम्मीद से देखने लगते हैं। बिहार में चुनाव 10 नवंबर को समाप्त हो जाएगा और जनादेश भी घोषित हो जाएगा, लेकिन भारत में ही कोरोना टीके के इनसानी परीक्षण के दौर फिलहाल जारी रहेंगे। ड्रग्स कंट्रोलर जनरल, भारत सरकार ने बीती 22 अक्तूबर को भारत बायोटेक कंपनी के प्रयोगाधीन टीके के तीसरे चरण की मंजूरी दी है। परीक्षण की प्रक्रिया पेचीदा और लंबी होती है, लिहाजा उम्मीद की एक किरण भी नहीं फूट पाएगी कि कोरोना टीका अमुक समय तक आ सकता है! भाजपा का कोरोना टीका के लिए उतावलापन ऐसा है कि वह तमाम वैज्ञानिक और प्रशासनिक प्रोटोकॉल पर ही सवार लगती है! हालांकि कोरोना से अभी तक की लड़ाई गैर-राजनीतिक रही है। नतीजतन हम संक्रमण को अपेक्षाकृत सीमित रखने में सफल रहे हैं, लेकिन क्या कोरोना का टीका अब चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए?

फिलहाल दुनिया भर में कोरोना टीके पर 100 से अधिक प्रयोग जारी हैं, लेकिन जिन कंपनियों के इनसानी परीक्षण तीसरे चरण तक पहुंच चुके हैं, उनके टीके की भी निश्चित तारीख तय नहीं है। भारत इन परीक्षणों में काफी पीछे है। अभी तक केंद्र सरकार, एजेंसियों और टीका उत्पादक कंपनियों के बीच कोई सर्वसम्मत सहमति नहीं बन पाई है कि बाजार में कोरोना टीके का मूल्य क्या होगा? जो संक्रमण की चपेट में हैं या संक्रमण को लेकर अतिसंवेदनशील हैं, क्या उन्हें मुफ्त में टीका दिया जाएगा? गरीब लोगों को कितनी सबसिडी पर यह टीका उपलब्ध हो सकेगा? अभी तो यह समस्या भी सुलझनी है कि जिस तापमान पर कोरोना टीका को रखने की अनिवार्यता है, क्या उन संयंत्रों या उपकरणों का बंदोबस्त किया जा चुका है? खसरा, कंठमाला, रुबेला और नवजात शिशुओं को शुरुआती 21 दिन में ही लगाए जाने वाले टीकों को बेहद कम तापमान पर संरक्षित रखा जाता है। उससे भी कम और ऋणात्मक तापमान पर कोरोना का टीका रखना पड़ेगा। कमोबेश सरकार इसके बंदोबस्त का तो खुलासा करे! देश में अभी तक पोलियो और मलेरिया सरीखी महामारियों के टीके निःशुल्क मुहैया कराए गए हैं। खसरा, रुबेला और बीसीजी के टीके भी सरकारी अस्पताल मुफ्त में लगाते रहे हैं। कोरोना टीके का वितरण और व्यवस्था क्या होगी, बिहार में चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस संदर्भ को छुआ तक नहीं। कोरोना वैश्विक महामारी है, लिहाजा उसके मद्देनजर हमारी सरकारों, व्यवस्थाओं, निजी क्षेत्र और राजनीति को सोच-समझ कर कुछ बोलना चाहिए। यह बोलने का भी नहीं, कुछ सार्थक और सटीक निर्णय का समय है।

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