Sunday, May 09, 2021 07:34 PM

पार्टी के रंग में देश

जंगल में अगर फल, चारा, ईंधन, खाद, रेशा और दवाई देने वाले वृक्ष, झाडि़यां और घास लगाए जाएं तो बिना पेड़ काटे लोगों को अच्छी खासी आमदनी पैदा करके दी जा सकती है। अपने आसपास रोजी का साधन पैदा होने से लोगों में आत्मविश्वास की भावना भी बढ़ती है। रोजी पर खतरे का भाव कम होता जाता है, जो आगे चल कर शांति व्यवस्था में भी सुधार का कारण बनता है। गैर इमारती वन उत्पादों से भरपूर वन तैयार करने पर जोर देकर ऐसा किया जा सकता है...

पर्वतीय क्षेत्रों और अन्य वनाच्छादित क्षेत्रों में वानिकी को नई दिशा देकर आजीविका वानिकी की ओर मोड़ना आज की जरूरत बनती जा रही है। खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां कृषि भूमि कम है और वन क्षेत्र ज्यादा है, वहां वन क्षेत्रों को स्थानीय आबादी के लिए रोजगार और रोजी-रोटी का साधन बनाया जा सकता है। अंग्रेजी हुकूमत के समय से वनों को सरकारी आय का साधन या औद्योगिक कच्चे माल का स्रोत मात्र मान लिया गया था। इसके चलते स्थानीय वन आधारित आजीविका और वन प्रबंधन करने वाली ग्रामीण संस्थाएं धीरे-धीरे कमजोर होकर नष्ट हो गईं। वनों के स्वरूप को भी औद्योगिक जरूरतों और व्यापार की दृष्टि से बदला गया। बहु-उद्देश्यीय मिश्रित वनों के स्थान पर एकल प्रजाति व्यापारिक वनों को पनपाया और फैलाया गया। आजादी के बाद भी उद्योगों के लिए और व्यापार के लिए ही वनों का प्रबंधन किया गया। यह माना गया कि इससे स्थानीय लोगों को भी कुछ रोजगार मिल जाएगा। किंतु लोगों की जरूरत के वन उत्पाद नष्ट हो जाने के कारण जितनी आजीविका नष्ट हुई, उतनी उद्योगों के माध्यम से खड़ी नहीं हो सकी।

अब तो औद्योगीकरण का स्वरूप बिल्कुल ही बदल गया है। उद्योग ऐसी तकनीकी पर निर्भर होते जा रहे हैं जिसमें श्रम की जरूरत घटती ही जा रही है। स्वचालित तकनीकों के प्रसार ने हालत ही बिगाड़ दी है। अब नई स्वचालित तकनीकों से उत्पादन तो बढ़ाया जा रहा है, किंतु कार्यकर्ताओं की जरूरत घटती ही जा रही है। इसी कारण इस उत्पादन वृद्धि और अर्थ तंत्र की वृद्धि को जॉबलैस ग्रोथ कहा जा रहा है। कोरोना जैसी विपदा ने तो उद्योगों में भी मंदी का दौर शुरू कर दिया है। केवल कृषि या अन्य प्राथमिक उत्पादन कार्य ही यथावत चल रहे हैं। इससे एक बात तो समझ में आती है कि विपत्ति के समय अपने नजदीक हो सकने वाला प्राथमिक उत्पादन ही भरोसे के लायक होता है। खेती तो लोग कर ही रहे हैं। बढ़ती आबादी की जरूरतों के अनुसार कृषि क्षेत्र का विस्तार भी संभव नहीं है, तो एक रास्ता यह बचता है कि वन क्षेत्र को आजीविका का साधन बनाया जाए, वह भी इस तरह कि बिना पेड़ काटे वनों से आजीविका खड़ी की जाए। हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से राज्य का ही उदाहरण लें तो कुल 70 लाख की आबादी में ही लगभग 8 लाख लोग बेरोजगार हैं। कोरोना काल में पता चला कि जिला चंबा से घोड़े-खच्चर चलाने लोग अरुणाचल प्रदेश में पहुंचे हुए हैं। कोई 10 वर्ष पहले चंबा के लिहल-बेल्ज इलाके के लोग ऊना में भाबर घास काटने की मजदूरी करते देखे थे, जो मुश्किल से पेट भरने लायक थी। ऐसी स्थितियां देश भर में वन क्षेत्रों के आसपास रहते लोगों की हैं।

 उनकी स्थितियों को आज के औद्योगिक मॉडल के चलते औद्योगीकरण के माध्यम से सुधार पाना संभव नहीं दिखाई देता है। इसलिए वनों को ही आजीविका देने वाले प्राथमिक उत्पादन के जरिए आजीविका का साधन बना कर समस्या को हल करने की दिशा में बढ़ा जा सकता है। अब तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स का युग शुरू हो चुका है। श्रम शक्ति की मांग तो घटती ही जाएगी। इसलिए कुछ हट कर सोचने की जरूरत है। जंगल में अगर फल, चारा, ईंधन, खाद, रेशा और दवाई देने वाले वृक्ष, झाडि़यां और घास लगाए जाएं तो बिना पेड़ काटे लोगों को अच्छी खासी आमदनी पैदा करके दी जा सकती है। अपने आसपास रोजी का साधन पैदा होने से लोगों में आत्मविश्वास की भावना भी बढ़ती है। रोजी पर खतरे का भाव कम होता जाता है, जो आगे चल कर शांति व्यवस्था में भी सुधार का कारण बनता है। गैर इमारती वन उत्पादों से भरपूर वन तैयार करने पर जोर देकर ऐसा किया जा सकता है। मौसमी फलों के साथ काष्ठ फल, फलों के व्यापार और निजी उपभोग से आजीविका के साधन बन सकते हैं। चारे की बहुतायत से अच्छा पशुपालन कम लागत पर किया जा सकता है। ईंधन व खाद देने वाले वनों से खेती को जैविक खाद से मजबूत करने के साथ सस्ते ईंधन से ठंडी जगहों पर आग तापने की जरूरतों की पूर्ति की जा सकती है। सुधरे ईंधन उपलब्ध न होने की सूरत में लकड़ी के ईंधन से कमी पूर्ति की जा सकती है। लकड़ी के ईंधन को गैसीय ईंधन में भी बदला जा सकता है।

रेशा देने वाले पेड़ यानी कुछ स्थानीय दस्तकारी के लिए कच्चा माल तैयार किया जा सकता है। अतिरिक्त बचे कच्चे माल को उद्योगों को भी बेचा जा सकता है। इस श्रेणी में ब्यूहल और टौर (माल धन) जैसी प्रजातियों के अलावा बांस की विभिन्न प्रजातियां भी लगाई जा सकती हैं। बांस को भी एक बारगी पूरा काट कर नष्ट नहीं करना पड़ता है। उसके हर साल जो नए-नए रायजोम निकलते हैं, उन्हें ही काटा जाता है। बांस का झुण्ड भी बना रहता है और हर साल उपज के रूप में बांस प्राप्त भी किए जा सकते हैं। बांस की नए-नए दस्तकारी उत्पाद  बनाने के लिए, पारंपरिक टोकरी आदि बनाने के लिए और कई औद्योगिक उत्पाद बनाने के लिए भारी मांग रहती है। बांस की कागज़, प्लाई, फर्श की टायलें, बोर्ड, कोयला, गैसीय ईंधन, फर्नीचर, निर्माण सामग्री आदि अनेक उत्पाद बनाने में इसकी खपत हो सकती है। ऐसे सामुदायिक और विभागीय वन तैयार करके एक नए युग की शुरुआत की जा सकती है, जो पर्यावरण संरक्षण और आजीविका के लिए वन प्रबंधन के द्वारा मानव जाति के भविष्य को सुरक्षित करने पर टिका होगा।

निर्मल असो

स्वतंत्र लेखक

पार्टी की कढ़ाई में गहरा रंग उबल कर ठंडा हो चुका था और अब नेताओं को इसमें डुबो-डुबो कर यह पता लगाना था कि किस पर कितना चढ़ा है। नेता एक-एक करके आ रहे थे और डुबकी लगा रहे थे। सफेदपोश बने पार्टी अध्यक्ष के सामने नेता रंग-बिरंगे हो रहे थे। जिन पर रंग नहीं चढ़ रहा था, उन्हें अलग से कतारबद्ध किया जा रहा था और देखते ही देखते इनकी पंक्ति लंबी हो गई। पार्टी में चिंता फैल गई कि अधिकांश नेताओं पर रंग क्यों नहीं चढ़ रहा। किसी ने कहा पार्टी के रंग में कोई खोट है। किसी ने कहा कि पार्टी के भीतर से रंग निकल गया है, तो बीच में आवाजें आने लगीं कि अब पार्टी को अपना रंग बदल लेना चाहिए। तरह-तरह की बातें, तरह-तरह के आरोप लग रहे थे। एक पुराने हो चुके कार्यकर्ता ने आजादी वाली हिम्मत दिखाते हुए कहा, ‘श्रीमान इसमें पार्टी रंग का खोट नहीं, लेकिन सत्ता का रंग इतना चढ़ गया है कि कोई दूसरा चढ़ता नहीं।’ बड़े नेताओं को लगा कि बूढ़ा सठिया गया है।

 सत्ता को बदनाम करके कौनसी पार्टी जिंदा रहेगी, बल्कि सत्ता ही तो अब पार्टी है। अब पूरे देश में सत्ता चल रही है, तो पार्टी चल रही है। देश के कितने ही नेता बदरंग हैं, लेकिन जब कभी पार्टी की कढ़ाई में फेंके तो अपने रंग के हो गए। अगर यह रंग तृणमूल कांग्रेस से छीने गए नेताओं पर चढ़ सकता है, तो अपनी शाखा के नेताओं पर इसका असर क्यों नहीं। अंततः पार्टी ने कढ़ाई बदल कर बड़ा बड़ कनस्तर रख लिया। पहला प्रयोग अब दूसरी पार्टियों से छीने नेताओं पर किया गया। यह असरदार हुआ। अब देश भर की सत्ताविहीन पार्टियों के नेता आ रहे थे और उनका रंग चमत्कारिक ढंग से बदल रहा था। किसी न कहा कि सबसे अधिक बदरंग नेता कांग्रेस में हैं, लेकिन हमारा कनस्तर देखते ही रंग बदल लेते हैं। अब सत्तारूढ़ पार्टी अपनी विचारधारा को केवल इसी रंग में देखने लगी और इसलिए देश की राजनीति के लिए यह रंग भरा कनस्तर पवित्र माना जाने लगा। अध्यक्ष महोदय हर चुनाव में यही रंग छिड़क-छिड़क कर धरती पर भी अपना रंग देखने लगे हैं। पार्टी रंग का महत्त्व इनसान के खून के रंग से कहीं बेहतर सिद्ध होने लगा। धरती पर गिरा खून अब दिखाई नहीं देता, लेकिन लाश को पहचानने के लिए अब पार्टी का रंग देखा जा रहा है।

 देश की मौन स्वीकृतियां इसी रंग से जुड़ गईं। कानून-व्यवस्था से न्याय व्यवस्था के रंग में अगर उम्मीद देखनी है, तो पार्टी का रंग देखना पड़ता है। आश्चर्य यह कि पार्टी पूरे देश और देश की संस्थाओं को अपने रंग में रंगने के बावजूद अपने नेताओं को रंगने में असमर्थ हो रही थी। दूसरी पार्टियों के नेता अब अपने जैसे लगने लगे थे, लेकिन अपने रंग से दूर हो रहे थे। पार्टी के लिए देश को रंगना आसान था, लेकिन पार्टी के भीतर अपनों को रंगना क्यों मुश्किल हो रहा है, यह विषय अब पार्टी अध्यक्ष के साथ-साथ सत्ता के मुखिया के लिए भी देश का सबसे बड़ा प्रश्न बन गया। जिस सत्तारूढ़ दल के लिए देश का कोई भी जटिल प्रश्न मायने नहीं रखता था, उसके लिए अपना रंग क्यों धोखा दे रहा था, इस पर नए प्रयोग होने लगे। मंदिरों में पूजा होने लगी। भक्त प्रार्थना करने लगे कि पार्टी का रंग उनमें समा जाए। देश के हर अंश को पार्टी का रंग चाहिए था, इसलिए सोचा गया कि कुछ गिरगिट खोज कर रंगे जाएं। आश्चर्य यह कि जैसे ही गिरगिट रंग में डाले, वे भी सफेदपोश हो गए। अंततः गुपचुप तरीके से पार्टी के अध्यक्ष और सत्ता के मुखिया खुद को राते के अंधेरे में रंगते रहे, लेकिन उन पर भी पुरानी पार्टी का रंग बेअसर हो चुका था। थक-हार कर पार्टी ने अपने रंग के चश्मे बनाने का ठेका अपनी ही सत्ता को दे दिया। देश अब सत्तारूढ़ दल के चश्मे से देख रहा है। सारे समाज को निःशुल्क चश्मे मिल रहे हैं और इस तरह सत्तारूढ़ दल फिर से रंगीन नज़र आ रहा है।