Friday, September 24, 2021 04:49 AM

नई सार्वजनिक इकाइयां बनाइए

इसलिए सरकार को कठोर कदम उठाते हुए स्टेट बैंक को छोड़ कर अन्य सरकारी बैंकों, एयर इंडिया, तेल कंपनियों आदि का निजीकरण कर देना चाहिए और मिली हुई रकम को नई तकनीकों के आविष्कार में निवेश करना चाहिए। इस सुझाव के विपरीत कहा जा सकता है कि जो सार्वजनिक इकाई के समीप हैं, उनके हितों को संरक्षित करने के लिए इनका निजीकरण नहीं होना चाहिए। मैं मानता हूं कि यह तर्क नहीं ठहरता है क्योंकि इकाई का निजीकरण किया जा रहा है, कर्मचारियों को सेवानिवृत्त नहीं किया जा रहा है। जो भी उद्यमी इन इकाइयों को खरीदेगा, उसे भी कर्मचारियों की जरूरत होती है...

तकनीकों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में हम पिछड़ते जा रहे हैं। चीन ने सफलतापूर्वक मंगल ग्रह पर अपना यान उतारा है। सूर्य के ताप के  बराबर का ताप अपनी प्रयोगशाला में बना लिया है और लड़ाकू विमानों को राफेल या दूसरी कंपनियों से खरीदने के स्थान पर उन्होंने स्वयं बनाने में सफलता हासिल की है। यदि हमें तकनीकों के क्षेत्र में अपनी पैठ बनानी है तो नई तकनीकों के सृजन में भारी निवेश करना जरूरी होगा। लेकिन कोविड के इस काल में वर्तमान चालू खर्चों को सरकार पोषित नहीं कर पा रही है। यद्यपि वर्तमान वर्ष 2021-2022 के बजट में केंद्र सरकार ने पूंजी खर्चों में लगभग 35 फीसदी की वृद्धि की है और वर्तमान वर्ष में 5.5 लाख करोड़ रुपए का पूंजी खर्च करने का प्रस्ताव है, परंतु यह फलीभूत होगा कि नहीं, यह निश्चित नहीं है। इस निवेश में नई तकनीकों का क्या हिस्सा है, यह भी स्पष्ट नहीं है। सच यह है कि आने वाले समय में तकनीकों का ही बोलबाला होगा। जिस देश के पास आधुनिकतम तकनीकें होंगी, वही विजयी होगा। हम देख चुके हैं कि किस प्रकार अमरीका की आधुनिक पैट्रियोट मिसाइलों ने सद्दाम हुसैन के इराक की सेना को चंद दिनों में ही ध्वस्त कर दिया था। इसलिए हमें तकनीकों में भारी निवेश करना होगा। प्रश्न है कि इसके लिए रकम कहां से आए? सरकारी इकाइयां तीन प्रकार की हैं। पहली इकाइयां सार्वजनिक सुविधाओं को प्रदान करने वाली हैं, जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया हर जिले में क्लीयरिंग हाउस चलाता है अथवा जैसे सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन द्वारा पूरे देश के विद्यालयों को नियमित किया जाता है।

 इस प्रकार की सार्वजनिक इकाइयों को बनाए रखना जरूरी है। इन कार्यों को निजी हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता है। दूसरी इकाइयां वे हैं जिनके समकक्ष निजी इकाइयां वर्तमान में सफल हैं, जैसे स्टेट बैंक को छोड़कर अन्य बैंकों के सामने कोटक महिंद्रा आदि प्राइवेट बैंक सफल हैं, अथवा जैसे एयर इंडिया के सामने इंडिगो एवं स्पाइस जेट एयरलाइन सफल है, अथवा जैसे तेल कंपनियों में इंडियन ऑयल के सामने रिलायंस सफल है। इन क्षेत्रों में सार्वजनिक इकाइयों को बनाए रखने का औचित्य नहीं है क्योंकि इन सेवाओं को निजी उद्यमी उपलब्ध करा सकते हैं। यह सही है कि निजी उद्यमियों द्वारा जनता से अधिक रकम वसूल कर मुनाफाखोरी की जा सकती है, लेकिन इस समस्या को नियंत्रण व्यवस्था सुदृढ़ करके संभाला जा सकता है, जैसे ट्राई ने मोबाइल सेवा प्रदान करने वाली निजी कंपनियों पर नियंत्रण कर देश में सस्ती मोबाइल सेवाएं उपलब्ध कराई हैं। इसी प्रकार रिज़र्व बैंक द्वारा निजी बैंकों के नियंत्रण से सस्ती बैंकिंग सेवाएं प्रदान कराई जा सकती हैं। इस प्रकार की तमाम इकाइयों का निजीकरण किया जा सकता है जिनके द्वारा प्रदत्त सेवाएं निजी क्षेत्र द्वारा उपलब्ध कराई जा सकी हैं। वर्तमान में सार्वजनिक इकाइयों का ‘मार्केट कैपिटलाइजेशन’ यानी उनके शेयरों की बाजार में कीमत लगभग 20 लाख करोड़ है। इसके सामने वर्तमान वर्ष 2021-2022 सरकार द्वारा कुल पूंजी खर्च केवल 5.5 लाख करोड़ रुपए किया जा रहा है। अतः यदि वर्तमान सार्वजनिक इकाइयों का निजीकरण कर दिया जाए तो हमें 20 लाख करोड़ की विशाल रकम मिल सकती है। इसमें यदि एक-चौथाई इकाइयां जैसे स्टेट बैंक को मान लें जिनका निजीकरण नहीं करना चाहिए, तो हमें लगभग 15 लाख करोड़ रुपए की विशाल रकम मिल सकती है।

इस विशाल रकम को हमें नई तकनीकों के सृजन में तत्काल निवेश करना चाहिए, जैसे एक इकाई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को बढ़ावा देने के लिए बनाई जा सकती है। वर्तमान में मेडिकल आदि क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सहायता से डॉक्टरों द्वारा पर्चे आसानी से लिखे जा रहे हैं और रोगियों को लाभ मिल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा रोगी के तमाम टेस्ट का अध्ययन करके डॉक्टर को सुझाव दिया जाता है। इससे डॉक्टर के लिए तमाम टेस्ट रिपोर्ट को स्वयं देखना आवश्यक नहीं रह जाता है। दूसरे, छठी पीढ़ी के इंटरनेट के सृजन के लिए हमें निवेश करना चाहिए। तीसरे, इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसे इंटरनेट के माध्यम से किसी दफ्तर की सुरक्षा व्यवस्था को संचालित करना, एयर कंडीशनिंग को नियंत्रित करना इत्यादि में निवेश करने में बहुत संभावनाएं हैं। चौथा, आने वाले समय में जेनेटिक जीन परिवर्तन से नई दवाएं इत्यादि बनाई जा रही हैं जिस पर भी हमें निवेश करना चाहिए, जैसे आलू की प्रजाति में सुधार करके उसके माध्यम से विटामिन परोसा जा सकता है। पांचवां, आयुर्वेद, यूनानी एवं होम्योपैथी जैसी वैकल्पिक दवाओं के विस्तार के लिए हमें इकाई बनानी चाहिए जोकि इन उपचार व्यवस्थाओं का अंतरराष्ट्रीय प्रचार करे और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार इन पर शोध करे इत्यादि। छठवां, अमरीका की वर्जिन गैलेक्टिक कंपनी ने अंतरिक्ष में वाणिज्य यान भेजने का ऐलान किया है। इसी प्रकार भारत सरकार भी एक इकाई बना सकती है। वर्तमान में इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन द्वारा दूसरे देशों के सेटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाया जा रहा है।

 यही कार्य एक अलग इकाई द्वारा किया जा सकता है। चीन ने मंगल ग्रह पर अपना यान उतारा है। भारत भी वाणिज्यिक स्तर पर अंतरिक्ष एवं दूसरे ग्रहों में यान भेज सकता है। इन तमाम तकनीकी संभावनाओं को फलीभूत करने के लिए जरूरी है कि देश वर्तमान की तुलना में नई तकनीकों के सृजन में 10 गुना निवेश बढ़ाए। सरकार के वर्तमान बजट के अंतर्गत यह संभव नहीं है। इसलिए सरकार को कठोर कदम उठाते हुए स्टेट बैंक को छोड़ कर अन्य सरकारी बैंकों, एयर इंडिया, तेल कंपनियों आदि का निजीकरण कर देना चाहिए और मिली हुई रकम को नई तकनीकों के आविष्कार में निवेश करना चाहिए। इस सुझाव के विपरीत कहा जा सकता है कि जो सार्वजनिक इकाई के समीप हैं, उनके हितों को संरक्षित करने के लिए इनका निजीकरण नहीं होना चाहिए। मैं मानता हूं कि यह तर्क नहीं ठहरता है क्योंकि इकाई का निजीकरण किया जा रहा है, कर्मचारियों को सेवानिवृत्त नहीं किया जा रहा है। जो भी उद्यमी इन इकाइयों को खरीदेगा, उसे भी कर्मचारियों की जरूरत होती है। यदि कर्मचारी ईमानदारी से काम करेंगे तो उन्हें वह निकालें, ऐसी कोई जरूरत नहीं है। अतः इस समय सार्वजनिक इकाइयों के श्रमिकों के हित साधने के स्थान पर सरकार को देश का तकनीकी भविष्य साधना चाहिए और तमाम गैर आवश्यक सार्वजनिक इकाइयों का निजीकरण करके उस मिली रकम को नई तकनीकों के आविष्कार में लगाना चाहिए।

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

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