Friday, September 24, 2021 08:22 AM

हिमाचल यात्रा में अपराध

अतिथि और आतिथेय के बीच यह कौन सा विश्वासघात जो पर्यटन आगमन की पलकों को घायल करने लगा। तलवार के साथ आ रहे, गली में शोर मचा रहे या बेअदब होते सैलानी पर संदेह क्यों न करें। एक अति नर्म उद्योग को कांटों के रास्ते पर घसीटा जाए या अब यह कानून-व्यवस्था का प्रश्न बन चुका है। लगातार दो आपराधिक घटनाओं ने पर्यटन उद्योग के रिश्तों में दबाव, अविश्वास और संदेह की चादर मोटी कर दी। मंडी से निकली तलवारें, मनाली में आकर फिर खूंखार हुईं, तो मसला हमारी चौकसी से जुड़ता है और यह भी कि पुलिस व्यवस्था में पर्यटन की शालीनता को अब आपराधिक तंत्र से बचाने की कसरतें शुरू करनी होंगी। हम पिछले काफी समय से कहते आ रहे हैं कि प्रदेश में एकतरफा पर्यटन या युवा पर्यटन के बीच हुड़दंग या निरंकुश होने का माजरा रोका जाना चाहिए। पर्यटन को हम एक ही तरह धकिया नहीं सकते और न ही ऑनलाइन बुकिंग के सहारे इसे व्यवस्थित कर पाएंगे। पर्यटन को हिमाचल के प्रवेश द्वार पर समझा होता, तो हर वाहन की चैकिंग से मालूम हो जाता कि कौन कैसे आ रहा है और किसकी यात्रा में अपराध छिपा है।

 मंडी के बाद मनाली में पर्यटकों द्वारा लहराई गई तलवारें दरअसल हमारी लापरवाही का सबूत भी हैं। पर्यटन को भीड़ बनाने, भीड़ मानने में हिमाचल दोषी है। पर्यटक और यात्री में अंतर, रोमांच और हुड़दंग में अंतर तथा व्यापार और पर्यटन आर्थिकी के अंतर को समझना होगा। जिस ओवरटेकिंग पर तलवारें निकलीं, उसके लिए पुलिस प्रशासन से पूछना होगा। जिस तरह सार्वजनिक स्थानों पर कुछ पर्यटक सरेआम शराब सेवन करके शांति भंग कर रहे हैं, उसके लिए पुलिस व प्रशासनिक व्यवस्था कौन करेगा। अगर पर्यटक स्थलों को होटल या गेस्ट रूमों का मोहल्ला बनाएंगे या हर पहाड़ी के वीरान लम्हों को हो हल्ले में रात-दिन जगाएंगे, तो वहां पर्यटन के मायने वीभत्स हो जाएंगे। यह जो भीड़ या रेवड़ आ रहा है, उसमें पर्यटक तो गिने चुने हैं, तो क्या प्रवेश द्वार यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि सैलानी कितने पानी में है। होना तो यह चाहिए कि हिमाचल के प्रवेश द्वार को ही पर्यटन विभाग के सबसे अहम स्वागत कक्ष की तरह तरजीह दें और वहां डेस्टिनेशन के हिसाब से पंजीकरण हो। मसलन पर्यटक अगर केवल रेणुका झील तक जा रहा है, तो पंजीकरण की एक दर और अगर इसके साथ वह ट्रैकिंग व शिमला-सोलन भी जोड़ता है तो इसी हिसाब से शुल्क बढ़ा दिया जाए। हर पर्यटक को पंजीकरण शुल्क अदायगी के साथ एक तय रूट मैप मिले तथा वह पर्यटन ऐप के इस्तेमाल से अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। इस तरह का पंजीकरण धार्मिक पर्यटन का अलबेलापन रोकेगा।

 बाइक व वाहन के साथ एंट्री की भी दर प्रवेश पर ही तय हो। पर्यटन ऐप के जरिए पंजीकृत पर्यटक की निगरानी पुलिस की टीम अपनी आईटी स्किल व बंदोबस्त से कर पाएगी। हिमाचल के तमाम ट्रैकिंग रूट, खड्डें व जोखिम के रास्ते अलार्म सिस्टम से जुडे़ं और वहां ऐसे सेंसर स्थापित किए जाएं जो पर्यटन ऐप को हर तरह का सिग्नल देते रहें। प्रदेश के माउंटनरिंग इंस्टीच्यूट, पर्यटन विभाग, प्रशासन तथा वन विभाग को पंजीकृत ट्रैकिंग साइट्स की निगरानी व वहां सूचना तंत्र विकसित करना होगा ताकि पर्यटन ऐप के जरिए पर्यटक हमेशा हेल्प लाइन से जुड़ा रहे। हिमाचल के हर विभाग को पर्यटन  का पार्टनर बनाने के अलावा यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रदेश की हर दृश्यावली फीस अदायगी से ही उपलब्ध हो। कर्नाटक, केरल व कई अन्य राज्य पर्यटन आकर्षण के हर द्वार पर शुल्क वसूल कर ही आगे जाने की अनुमति देते हैं। हिमाचल के नजरिए से पर्यटक खोज में शुल्क अदायगी व पंजीकरण अति आवश्यक है, वरना भीड़ हमेशा भेड़ की तरह सींग मारती रहेगी और हमारा पर्यटन परिदृश्य घायल होता रहेगा। मनाली जैसी घटनाएं गंभीर पर्यटक को विचलित करती हैं और यह संपूर्ण पर्यटन उद्योग की छवि के खिलाफ जाएगा। हिमाचल पर्यटन कम से कम ऐसे पर्यटन से लांछित ही होगा।