Friday, September 24, 2021 08:57 AM

पर्यटन आर्थिकी के मुजरिम

मोहलत, पनाह या दरगाह, किसके हिस्से क्या आया। कौन सुने कौन रह जाए, आह, आहट या आगाह। सदमे उम्र भर के लुटाने आया है कोई, इस आकाश को धरती पे मिटाने आया है कोई। करेरी झील इस बार आंसुओं से लबालब। बोह-दरीणी के ट्रैकिंग रूट गुमनाम गुनाह की शिनाख्त से आहत। कल जिस धरती से आसमान चीरने की बात हो रही थी, आज उसी की कोख से लाशें निकल रही हैं। आहत पर्यटन आर्थिकी के हम सभी मुजरिम। करेरी के रोमांच में खोया पंजाबी सूफी गायक मनमीत सिंह, आखिर अव्यवस्थित पर्यटन की फिरौती में ही तो मारा गया। हमने पर्यटन की आवारगी को अपना धंधा बना लिया और पर्वतारोहण, ट्रैकिंग एवं साहसिक खेलों को साधारण मनोरंजन की गतिविधि मानने लगे। क्या मनमीत सिंह के करेरी आगमन को हिमाचल का पर्यटन संबोधित कर पाएगा। यह गोपनीयता के कदम थे जो मौत के दामन में चले गए या इस अंधेरे आयोजन की वजह पूछी जाएगी। क्या हिमाचल का हर पहाड़ अब पर्यटन की कोख बन गया और अगर है तो यह चिन्हित क्यों नहीं। एक समय था जब पर्वतारोहण को एक अलग पर्यटन की तहजीब में प्रशिक्षित व परिमार्जित किया गया।

 पर्वतारोहण संस्थान बना, इसका क्षेत्रीय कार्यालय व छात्रावास बने, लेकिन अब यह ऐसी गतिविधियों का नेतृत्व नहीं कर रहा। ग्रीष्म ऋतु से बरसात तक पहाड़ों पर चढ़ने की ललक ने हिमाचल के एक तबके को इसी बहती गंगा में हाथ धोने का अभिप्राय बना दिया। पिछले कुछ सालों से पहाड़ों की ओर युवा सैलानियों का रुख बेइंतहा बढ़ा है और इसी रफ्तार में कुछ जोखिम भरे अभियान मौत के मुंह में समा गए। ऐसा क्यों है कि लगातार बढ़ती घटनाओं के बावजूद हम अनियंत्रित पर्यटन की रखवाली नहीं कर पा रहे या युवा सैलानियों से जुड़े खतरों की मॉनिटरिंग व सुरक्षा नहीं कर पा रहे। हर साल ब्यास नदी, मणिमहेश से श्रीखंड यात्रा तक, पैराग्लाइडिंग, ट्रैकिंग व तेज रफ्तार वाहनों पर दौड़ते पर्यटकों की मौत की घटनाएं हिमाचल के लिए निगहबानी की जरूरत बढ़ा देती हैं। हमारा पर्यटन मौत का सौदागर न बने, इसके लिए रोडमैप, कायदे-कानून, हिफाजत के तरीके, पर्यटन प्रबंधन और इसके विकास की अहर्ताएं तय करनी होंगी। हर पहाड़ और हर मौसम, हर वक्त पर्यटक का बोझ नहीं उठा सकता।

 आश्चर्य यह कि पंद्रह जुलाई से पंद्रह अगस्त तक पैराग्लाइडिंग व रिवर राफ्टिंग के प्रतिबंध पर भी एतराज होने लगा है। भारी बर्फबारी या बरसात में भी ट्रैकिंग पर पर्यटन आगमन का दौर आमादा होने लगा। पिछले कुछ सालों से बिना किसी अनुमति और पर्यटन विभाग के दिशा-निर्देशों की अवहेलना करती कई इकाइयां, प्रशिक्षण हीन गाइडों की भूमिका तथा बेतरतीब आगमन वृद्धि के कारण हमें प्रधानमंत्री की ओर से मिल रही सलाह ही मान लेनी चाहिए। हम पुनः दोहरा दें कि केंद्रीय सरकार को सलाह के बजाय पर्वतीय विकास मंत्रालय का गठन करके ऐसे सभी मसलों का हल निकालना चाहिए। अगर चार धाम यात्रा उच्च मार्ग के लिए केंद्र अपने संसाधनों का आशीर्वाद उत्तराखंड को दे सकता है, तो हिमाचल की पर्यटन आर्थिकी को भी एक पूर्ण पर्यटन ढांचे की दरकार है। गोवा और पूर्वोत्तर भारत की तर्ज पर हिमाचल में सुरक्षित पर्यटन के विकास को केंद्रीय बजट का आबंटन चाहिए। बावजूद इसके हिमाचल खुद अपनी पर्यटन प्राथमिकताओं का निर्धारण करते हुए यह तय करे कि पूर्व घोषित ‘ईको टूरिज्म’ नीति का क्या हुआ। जंगल के देवता वन मंत्री राकेश पठानिया ईको टूरिज्म की शेखी बघारते कहां निकल गए कि करेरी जैसे इलाके पर पंजाबी के मशहूर गायक मनमीत सिंह हमारे पर्यटन पर भरोसा करके मौत के ग्रास बन गए। कितना भयावह है पर्यटन के रास्ते पर मौत का यह तांडव। क्या कोई सैलानियों की अंधी गलियों को बहकने से रोक कर, सुरक्षित पर्यटन को बख्श देगा।