देश सेवा का जज्बा: पूरन सरमा, स्वतंत्र लेखक

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक

घर के बाहर किसी ने आकर तीन बार ‘भारत माता की जय हो’ नारे लगाए तो स्वाभाविक तौर पर मैं चौंका। बाहर आया तो देखा तीन-चार युवक थे। फिर उनमें से एक को गौर से देखा तो पहचान गया, वह गोपाल था। गोपाल मेरे दफ्तर में था। लेकिन हुलिया एकदम बदला हुआ था, चोला-पायजामा और सिर पर टोपी। मुझे देखते ही उसने मेरे चरण कमलों का स्पर्श किया और बोला- ‘सर, आपका आशीर्वाद चाहिए।’ मैंने कहा- ‘भाई गोपाल वह तो सदैव तुम्हारे साथ रहा है, जब तुम दफ्तर में कामचोरी करते थे, तब भी मेरा आशीर्वाद था तुम्हें। परंतु तुमने अपना लिबास कब बदल लिया।

मैं रिटायरमेंट के समय तो तुम्हें अच्छा-भला छोड़कर आया था।’ वह बोला- ‘सर, यह लिबास मैंने आज ही बदला है और आपको बताने आया हूं कि मैं चांदनी चौक से एम.एल.ए. का चुनाव लड़ रहा हूं।’ मेरे नेत्र खुले के खुले रह गए और मैं बोला- ‘चुनाव, लेकिन चुनाव लड़ने जैसी बात तो तुमने पहले कभी बताई नहीं थी। यह यकायक तुम्हें क्या हुआ है? मेरा मतलब तुमने नौकरी छोड़ दी है?’ वह बोला- ‘हां साहब, मैं देश सेवा करना चाहता हूं।’ तब तक मैं थोड़ा सहज हो गया था, इसलिए बोला-‘वैरी गुड, देश सेवा भी बुरा धंधा नहीं है। इसमें हाथ डालोगे तो कुछ न कुछ बन भी जाओगे। लेकिन भाई इसमें तो पैसा बहुत चाहिए। पहले निवेश करो, तब रिटर्न सालों में मिलता है।’ गोपाल बोला-‘सर, मैं वाकई देश सेवा करना चाहता हूं। अन्ना का भक्त हूं। उन्हीं की प्रेरणा से आज सब कुछ त्याग कर मैं मूल्यों की राजनीति करना चाहता हूं।

’ मैंने कहा-‘वही तो मैं कह रहा था, राजनीति बिना मूल्य के आज करेगा भी कौन?’ गोपाल ने मेरा छुपा व्यंग्य समझा नहीं और उत्साह से बोला-‘सर, बस यही समझिए। दरअसल मैं भ्रष्टाचार और महंगाई के विरुद्ध आवाज उठाकर चुनाव जीतने का दम भर रहा हूं। आप खुद देख रहे हैं, देश की हालत क्या हो रही है।’ मैं बोला- ‘गोपाल, मैं सब देख रहा हूं। तुम्हारे दोनों मुद्दे ज्वलंत हैं। इसमें गरीबी मिटाने जैसा तुर्रा और लगा लेते तो राह आसान हो जाती। मेरा मतलब भय, भ्रष्टाचार और भूख मिटाने से है।’ गोपाल के होंठ थोड़ा हंसे और वह बोला-‘सर भ्रष्टाचार और महंगाई, दोनों ही मुद्दे गरीब के लिए हैं। मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। धंधेबाज राजनेता देश को लूट रहे हैं और भारत चमकाने और भारत निर्माण की बातें कर रहे हैं। सर, इन सबका पर्दाफाश होना ही चाहिए।’ मैंने देखा गोपाल का चेहरा तो उस पर ईमानदारी का जोश और व्यवस्था से लड़ने का जज्बा दिखाई दिया। मुझे गोपाल के बीवी-बच्चों का ख्याल आ गया कि अगर यह वाकई देश सेवा करने निकल गया तो वे क्या करेंगे? मैंने ही यही प्रश्न गोपाल पर दागा तो उसने कहा- ‘सर, देश सेवा पहले है। बीवी-बच्चों को पेंशन बहुत है। अब मैं चुप नहीं रह सकता।’

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