Tuesday, December 07, 2021 05:27 AM

विकास की जमीन

हिमाचल प्रदेश में विकास की गाथा को हर राजनीतिक पार्टी लंबा कर सकती है और कमोबेश हर सरकार के हिस्से में यह श्रेय उसकी निपुणता, प्राथमिकता और प्रदर्शन के साथ रहा है,लेकिन विकास में विमर्श और योजनाओं में भविष्य का स्पर्श दिखाई नहीं देता। विकास कई बार ताश के पत्तों की तरह अस्थिर, अस्थायी व चालबाज बन जाता है या राजनीतिक पहरे में इसकी चमक दुबक जाती है। मसलन शहरी निकायों की गिनती में बढ़ोतरी, अब पांच नगर निगमों की संख्या तक में इजाफा करते हुए आगे बढ़ जाती है, लेकिन यह मालूम नहीं कि आखिर करना क्या है। यह तमगे भी ओहदेदार बन कर उसी व्यवस्था की खरौंचों में तबदील हो जाते हैं। मंडी-सोलन के साथ केवल पालमपुर का नगर निगम बनना ज्यादा न्यायोचित था या इस ट्रेन से हमीरपुर, नाहन, ऊना तथा कुल्लू जैसे जिला मुख्यालयों का उतर जाना अधिक प्रासंगिक था। नगर परिषदें क्यों नगर निगमों में तबदील हों या कल के नगर निगम कैसे होंगे, इस पर विमर्श के बिना विकास की सहमति को अंगीकार करना बेमानी है। चार-छह जगह कूड़ा-कर्र्कट प्रबंधन की हामी भरना पूरे प्रदेश की स्वच्छता को प्रमाणित कैसे करेगा।

दशकों बाद भी उपग्रह नगरों का यथार्थ शून्य रहे, तो आवासीय व्यवस्था के नजरिए से हिमाचल कब पुष्ट होगा। चंडीगढ़ के आसपास इस दशक की रियल एस्टेट में से पचास फीसदी खरीद हिमाचली करते रहे, तो इस मांग पर कौन सा विकास हुआ। दशक पहले आवासीय मांग के सर्वेक्षण से मालूम हुआ कि लगभग अस्सी हजार लोग विभिन्न शहरों या कस्बों में आशियाना बसाना चाहते हैं, लेकिन यह उत्कंठा भी आज तक पूरी नहीं हुई। विकास का दूसरा पहलू निजी उन्नति को दर्शाता है, लेकिन शहरी सड़कों को घेरते वाहनों को देखते हुए समझा जा सकता है कि कहीं योजनाओ-परियोजनाओं में ही भविष्य को पढ़ने का सामर्थ्य नहीं है। कमोबेश गांव से कस्बों तक के हालात में भी विकास को चबूतरों पर खड़ा कर देने की चेष्टा ने नागरिक समाज को भंवर में फंसा दिया है। यह विकास का अजूबा है, जो हर हिमाचली को खेती छोड़ने पर विवश कर रहा है और सस्ते राशन की कतार से जोड़ रहा है। विकास को अगर किसी होर्डिंग पर विकसित होते देखना शुरू करेंगे, तो उसकी वास्तविकता ही नजरअंदाज होगी। अगर बरसात के बाद नेशनल हाई-वे पर भी गड्ढों को ढांपने का पैच वर्क के बजाय मिट्टी से भर दिया जाए, तो भविष्य की कामना क्या होगी। आश्चर्य यह कि वर्षों बाद भी एनडीआरएफ बटालियन की जमीन तय नहीं हो रही हो, तो आपदा प्रबंधन की प्राथमिकता क्या होगी। सैकड़ों आपत्तियां लगाने वाले वन विभाग से क्यों न पूछा जाए कि उसका गठन किस लिए हुआ। क्या वन विभाग से विकास के रिश्ते को नया आधार मिल पाएगा। क्या विकास के अधिकार से हिमाचल केवल एक महकमे या वन संरक्षण अधिनियम की वजह से वंचित रह जाएगा। क्या हमने कभी सोचा कि हिमाचल के प्रमुख शहरों में वन विभाग ने कितनी जमीन हथियायी है। ऐसे में क्यों न वन विभाग के समस्त कार्यालयों तथा आवासीय बस्तियों को ऐसे जंगलों में भेजा जाए, जहां विभाग अपने विकास की कर्मठता में खुद को ही अनुमति दे।

 प्रदेश की राजधानी शिमला की विडंबना यह है कि राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इसके विकास की बाडबंदी कर दी है। क्या शिमला को केवल एनजीटी से मिले दंडनीय अपराध के कारण भविष्य के अनिश्चय में छोड़ दें या सरकार को नया रोड मैप बनाना होगा। शहरों के विकास के लिए लैंड बैंक की अवधारणा को व्यापक बनाना होगा। इससे पहले विभिन्न कार्यालयों के तहत जाया भूमि या अतीत की योजनाओं को नए सिरे से कार्यान्वित करने की जरूरत है। शहरों में स्थापित विभिन्न विभागों के अलग-अलग विश्राम गृहों को एक बड़े परिसर में समाहित करते हुए अतिरिक्त जमीन को भूमि बैंक में डाला जा सकता है। इसी तरह विभागीय इमारतों को संयुक्त कार्यालयों की शक्ल में स्थानांतरित करके भूमि जोड़ी जा सकती है। कार्यालय परिसर से आवासीय भवन अलग करने होंगे। यह छूट कुछ हद तक चिकित्सा क्षेत्र को दी जा सकती है। शहरी क्षेत्रों से अनावश्यक विभाग हटाए जाएं, मसलन कृषि, मत्स्य पालन व पशु पालन जैसे विभागों के बड़े कार्यालय भी फील्ड में स्थानांतरित किए जाएं। पुलिस लाइंस व जेलें भी शहरों से हटाई जा सकती हैं। प्रदेश की समस्त सरकारी संपत्तियों के विस्तार, रखरखाव तथा नवनिर्माण के लिए राज्य का अपना एस्टेट विकास प्राधिकरण होना चाहिए ताकि सरकारी कर्मचारी व अधिकारियों को आवासीय सुविधा पीपीपी मोड के तहत उपलब्ध करा कर निजी निवेश या स्वरोजगार बढ़ाया जा सकता है। हिमाचल के विकास की भविष्यगामी योजनाओं में समरूपता, नवाचार व भूमि का सही इस्तेमाल अति आवश्यक है।