Saturday, January 23, 2021 07:24 PM

धर्म का चोला: अजय पाराशर, लेखक, धर्मशाला से हैं

चाहे उनके धर्म का चोला अब चीथड़ों में बदल चुका है, पर आदि काल से धार्मिक चोले में लिपटे वे आज भी इसे छोड़ने को कतई तैयार नहीं दीखते। भले ही उनके चोले में आडंबरों की जुएं रेंगती नज़र आएं या अंध-विश्वासों के पिस्सू-तिलचट्टे उछलते-तैरते दिखाई दें या चोला स्वार्थों-रूढिय़ों की थिगलियों से भरा पड़ा हो, इस घोर कलियुग में देशभक्त नेताओं की तरह उनमें इतनी ़गैरत भी नहीं कि कम से कम ज़रूरत के मुताबिक खादी का नया चोला ही सिलवा कर पहन लें। बेचारी सरकार तो राष्ट्रहित को ध्यान में रख कर, राष्ट्रपिता के जन्मदिन से लेकर उनके शहीदी दिवस तक खादी पर बीस प्रतिशत छूट का ऐलान भी करती है। लेकिन लोग हैं कि चाहे भूख हो या न हो, आनन-फानन में धर्म की जलेबी तो खा लेते हैं, लेकिन जलेबी की तरह धर्म कैसे बना, कभी समझने का प्रयास नहीं करते। इसी बात का ़फायदा उठाते हुए सदियों से कई झांसा राम, चाँईं राम या अपनी ़िफल्मों में हवा में उडऩे का चमत्कार दिखाने वाले काम-लहीम संत लोगों को धर्म की अ़फीम चटाते आ रहे हैं।

लोग आंखें इसीलिए नहीं खोलते क्योंकि खुली आंखों से देखने पर अंध-विश्वास शीशे की तरह चुभता है और ़गरीब उम्मीद की तरह उनकी आस्था चूर-चूर हो जाती है। चमत्कारों पर विश्वास करने वाले लोग संतों से वैसे ही सवाल-जबाव नहीं करते, जैसे वे राष्ट्रभक्त नेताओं से कभी नहीं पूछते कि तुमने जो दस साल में आमदनी को दोगुना करते हुए ़गरीबी दूर करने की घोषणाएं की थीं, उनका क्या हुआ? क्योंकि लोगों को पता है अगर ़गरीब है तभी ़गरीबी रहेगी। नहीं तो ़गरीबी हटाने के लिए ़गरीब को ही हटाना पड़ेगा। लेकिन अगर ़गरीब हट गया तो वोट कौन देगा? यह बात दीगर है कि ़गरीबी की परिभाषा क्या हो? परिभाषा वही जो सरकार दे या फिर चिथड़ों में लिपटे रहने वाले को ़गरीब माना जाए या वह मध्यम वर्ग, जो बजट बनाती हर सरकार के निशाने पर रहता है, इन्कम टैक्स भी भरता है लेकिन जीने की जद्दोजहद में ज़रूरत का सामान इकट्ठा करने के लिए ताउम्र अपना पेट काटता रहता है। वैसे सरकार ़गरीबी को परिभाषित करने के लिए जितनी कैलोरी प्रतिदिन अनिवार्य बताती है, उतनी कैलोरी तो बड़ी सरकार की रखवाली में उनके घर का विदेशी नस्ल का कुत्ता एक बार में चट कर जाता है।

यह बात अलग है कि सरकार सतरंगी सपनों की घोषणाओं के दो-चार साल बाद नई घोषणाओं का जाल फैंकती है और लोग नए जाल में फंसने के लिए बिलबिलाते नज़र आते हैं। जिस तरह किसी धर्मगुरू से दीक्षित होने के बाद शिष्य अक्सर आध्यात्मिक जुलाबों से पीडि़त होकर जगह-जगह अपने गुरू और संप्रदाय की गंध बिखेरते रहते हैं, उसी तरह पार्टियों से बंधे अधिकांश लोग बिना सोचे-विचारे अपने नेता और पार्टी का गुणगान करते हुए, बैठकों-जलसों में भाग लेते रहते हैं। जबकि त़करीबन सौ ़फीसदी धर्मगुरुओं के आध्यात्मिक बल्ब की तरह नेताओं का सेवा बल्ब भी ़फ्यूज़ ही रहता है। लेकिन असली शिष्य और कार्यकर्ता वही, जो केवल मलाई चट करना जानता हो। आम शिष्य और कार्यकर्ता तो केवल गुरू और नेता की जय-जयकार करते रह जाते हैं। धर्मांधता बनाए रखने के लिए जैसे धर्मगुरू अरबों ़खर्च करते हैं, उसी तरह ़गरीबी बनाए रखने के लिए सरकारें भी खरबों ़खर्च करती हैं। ऐसे ही कभी ़गरीबी में जीने वाले एक राष्ट्र महात्मा की यात्रा, आश्रम और बकरियों के रख-रखाव पर भले ज़माने में लाखों ़खर्च होते थे। अब धर्मांधता और ़गरीबी की अमर बेल को फलने-फूलने के लिए दऱख्तों का सहारा तो चाहिए ही।

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