Tuesday, September 22, 2020 08:38 PM

ध्यान में गहरे उतरना

ओशो

जितना ध्यान में गहरे उतरता हूं, उतना ही अपने आपके लिए तथा पूरे संसार के लिए जिम्मेदार मानता हूं। यह कैसे संभव है? जितना तुम स्वयं में प्रवेश करोगे, उतना ही तुम जगत के प्रति जिम्मेदारी महसूस करोगे। क्योंकि तुम इस जगत के टुकड़े हो। तुम इससे अलग नहीं हो। स्वयं जैसे होने का अर्थ है अत्यंत जिम्मेदारी का बोध, लेकिन वह बोझ नहीं है। यह एक आनंद है कि तुम कुछ अस्तित्व के प्रति कर सकते हो। अस्तित्व ने तुम्हारे लिए बहुत कुछ किया है। जो अस्तित्व ने हमारे लिए किया है, उसकी तुलना में यह कुछ भी नहीं है, किंतु यह हमारा अहोभाव होगा। सवाल छोटे और बड़े का नहीं है, सवाल है हमारी प्रार्थना का, हमारे धन्यभाव का और हमारी समग्रता का। हां, ऐसा होगा, जितना तुम स्वयं जैसे होओगे, उतना ही तुम जिम्मेदारी महसूस करोगे जो पहले कभी नहीं की थी।

मुझे याद है जैन धर्म के अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रवर्तक महावीर के जीवन में, वह अपने निकटतम शिष्य गोशालक के साथ एक गांव से दूसरे गांव जा रहे हैं। महावीर कहते हैं कि अस्तित्व के प्रति जिम्मेदारी प्रदर्शित करती है कि तुम कितने वास्तविक सत्य तक पहुंचे हो। हम तुम्हारी प्रमाणिक सच्चाई को नहीं देख सकते, किंतु हम तुम्हारे उत्तरदायित्व देख सकते हैं। चलते-चलते वे एक छोटे से पौधे के पास पहुंचते हैं। गोशालक बहुत तार्किक है। वह पौधे को उखाड़कर फेंक देता है। पौधा छोटा था, तो उसकी जड़ें भी छोटी थीं। महावीर कहते हैं ये गैरजिम्मेदारी है, किंतु तुम अस्तित्व के विरोध में कुछ नहीं कर सकते। तुम प्रयास कर सकते हो, किंतु यह पुनर्जीवित हो जाएगा। गोशालक कहता है, अस्तित्व मेरा क्या कर सकता है?  मैंने पौधा उखाड़ दिया है अब अस्तित्व इसे जीवित नहीं कर सकता। महावीर हंसे। वे बस्ती गए और भिक्षा ली। भोजन करने के बाद दोनों वापस आ रहे थे और वे अचंभित हो गए, पौधे की जड़ों ने पुनः जमीन पकड़ ली। पौधा पुनः जीवित हो गया। जब वे बस्ती में थे, तभी वर्षा होने लगी और पौधे की जड़ें वर्षा का सहारा पाकर पुनः जमीन में चली गई। जड़ें छोटी थीं, हवा बह रही थी और हवा ने पौधे को पुनः खड़ा कर दिया। जब वे लौटे तब तक पौधा सहज स्थिति में लौट चुका था। महावीर ने कहा, पौधे को देखो मैंने कहा था कि तुम अस्तित्व के विरोध में कुछ नहीं कर सकते।

तुम प्रयास कर सकते हो लेकिन यह स्वयं का ही विरोध होगा, क्योंकि यह तुम्हें अस्तित्व से खंडित करेगा। यह तुम्हें तुम्हारे निकट नहीं लाएगा। इस पौधे को देखो। कोई नहीं सोच सकता था कि ऐसा भी होगा कि वर्षा और हवा पुनः जड़ों को पृथ्वी से जोड़ देंगी। यह अपना जीवन जीने जा रहा है। यह हमें छोटा पौधा दिखता है, किंतु यह विराट ब्रह्मांड, विराट अस्तित्व असीम शक्ति का अंश है और महावीर गोशालक से कहते हैं कि अब से हमारे मार्ग अलग होते हैं। मैं ऐसे व्यक्ति को मेरे साथ नहीं रख सकता जो अस्तित्व के विरोध में हो और जिम्मेदारी न महसूस न करता हो। महावीर की अहिंसा की संपूर्ण धारणा, अस्तित्व के प्रति सम्मान इन शब्दों के द्वारा बेहतर प्रदर्शित की जा सकती है। अहिंसा केवल एक छोटा सा भाग है। इसे कसौटी समझो कि जितना तुम लोगों के प्रति, अस्तित्व के प्रति जिम्मेदार महसूस करो उतना तुम समझो कि तुम सही मार्ग पर हो।

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