दिल मांगे मोर

कर्नल (रि.) मनीष धीमान

स्वतंत्र लेखक

बीते सप्ताह देश में कुछेक मुख्य घटनाएं जैसे लद्दाख बॉर्डर पर चल रही तनातनी खत्म हुई और दोनों देश शांति से मुद्दा सुलझाने के लिए सहमत हो गए। भारत कोरोना संक्रमित देशों की सूची में विश्व में तीसरे पायदान पर पहुंच गया। यूपी के एक सरफिरे बदमाश ने आठ पुलिस अधिकारियों को मार गिराया। पिछले सप्ताह जो भी हुआ, वह आज इतिहास के रूप में याद रखा जाएगा, पर भविष्य की पीढ़ी जब भी बीते सप्ताह के इतिहास के बारे में जानकारी हासिल करेगी तो इसी सप्ताह आज से 21 वर्ष पूर्व कारगिल युद्ध के दौरान शहादत हासिल करने वाले परमवीर चक्र विजेता हिमाचली सपूत विक्रम बत्तरा का इतिहास सर्वोपरि तथा स्वर्णिम पन्नों में उकेरित पाया जाएगा। विकास दुबे के बारे में जब भी भविष्य की पीढ़ी जानेगी तो उससे नफरत करेगी और विक्रम बत्तरा को हमेशा गौरवमयी तथा प्रेम स्वरूप श्रद्धांजलि के साथ याद किया जाएगा। मुझे मालूम है कि महान विक्रम बत्तरा और गुंडे विकास दुबे की तुलना करना बिल्कुल सही नहीं है, पर आज  की नई पीढ़ी को यह बताना जरूरी है कि भविष्य में विकास दुबे नहीं, विक्रम बत्तरा बनने की कोशिश करें। अगर सही ढंग से विश्लेषण किया जाए तो हमारे हिमाचली युवाओं का सेना में सेवा देना पहला लक्ष्य रहता है। फौजियों की वीरता और जिंदगी पर बने अलग-अलग तरह के गाने और कहानियां हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। बचपन से हम इन्हें सुन-सुन कर जवान होते हैं। इसी संस्कृति से प्रेरित होकर शायद विक्रम बत्तरा भी कई तरह की नौकरियों के ऑफर मिलने के बावजूद सेना में शामिल हुए। कारगिल युद्ध के दौरान द्रास सेक्टर में पॉइंट 5108 को कैप्चर करने के मुश्किल काम को विक्रम बत्तरा ने बिना किसी नुकसान के हासिल किया। इनकी वीरता, साहस और कुशल रणनीति से प्रभावित होकर पाकिस्तानी सेना ने इन्हें शेरशाह सूरी का नाम दिया। इस आपरेशन के बाद विक्रम बत्तरा का नाम महावीर परम चक्र के लिए प्रस्तावित किया गया, पर अपनी इस विजय से संतुष्ट न होने वाले कैप्टन विक्रम ने ‘दिल मांगे मोर’ का नारा दिया और घायल होते हुए भी दूसरे ऑपरेशन में जाने के लिए फिर तैयार हो गए। ‘दिल मांगे मोर’ का स्लोगन पेप्सी के लिए अनुजा चौहान ने 1998 में बनाया था, जिसे कैप्टन विक्रम बत्तरा ने अपना वार क्राई या युद्ध घोष बना लिया और जब उनको दूसरे आपरेशन में कारगिल हिल टॉप को हासिल करने की जिम्मेदारी दी गई तो उनका कहना था कि या तो मैं तिरंगा उस पहाड़ी पर गाड़ कर लहराऊंगा या तिरंगे में लिपट कर आऊंगा। आज जरूरत है कि हम ऐसी संस्कृति और समाज तैयार करें जो नई पीढ़ी को सही रास्ता दिखाए। मेरा मानना है कि बड़े पर्दे पर माफिया, गुंडों, चोरों और गैंगस्टर को हीरो बनाकर दिखाने की कवायद बंद करके हर मंच जैसे सोशल मीडिया, अखबार तथा न्यूज चैनल पर इनकी निखेदी हो ताकि युवा पीढ़ी विकास दुबे बनने की न सोच कर विक्रम बत्तरा बनने का लक्ष्य रखे और देश का नाम रोशन करे।

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