Friday, October 30, 2020 03:31 PM

दोमुंहे लोगों की बरसात

सुरेश सेठ

sethsuresh25U@gmail.com

उन्होंने भय्या-भय्या कह कर मुझे गले से लगा लिया। हो सकता है वह मेरे चरण छूने का बहाना करते हुए मेरे घुटने ही हिला दें, जो पहले ही आर्थराइटस की पीड़ा झेलने लगे हैं। वह मुझे माया, मोह, ममता छोड़ कर एक रंग में रंग जाने का संदेश देने आए थे। मैं समझ नहीं पाया कि उन्होंने मुझे ही इस संदेश के लिए क्यों चुना, क्या मैं उन्हें बहुत मायावी लगने लगा हूं? जी नहीं, वह खुल जा सिम-सिम वाला मायावी नहीं, जिसके एक इशारे पर सपनों का संसार खुल जाता था, जहां इंद्र सभा जैसा माहौल होता था, षोढ़षियां नाच-नाच कर उनका दिल बहलाती थीं और उनके आंगन में सोमरस का दरिया बहता था। इसी दरिया में नहाने के बाद वह मुझे त्याग का महत्त्व समझा रहे थे। ऊपर वाले के साथ सूरत ध्यान लगाने की प्रेरणा दे रहे थे। मैं जानता हूं सूरत तो उनकी भी सदा एक ओर ही लगी रही, जैसे भी हो अपने लिए अधिक से अधिक नोट बटोर लेना। जब तिजोरी भर गई तो कुर्सियों की तलाश में निकले। रास्ता लंबा है।

 निगम की कुर्सी से होकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक जाता है। वह न भी मिले तो मंत्री जी की कुर्सी से ही संतोष  कर लेंगे। ‘भई, हम छोटे आदमी हैं। कभी अपनी क्रूर धरती का दामन नहीं छोड़ा। मंत्री की कुर्सी को ही गनीमत जान लिया। क्योंकि इसे अपने बेटे, नाती-पोतों के लिए सुरक्षित करके जाना अधिक सहज होता है।’ हमने देखा अपनी धरती का दामन न छोड़ने का अर्थ उनकी भाषा में अपनी कुर्सी का दामन न छोड़ना था। तब भी जब श्मशानघाट उन्हें आमंत्रण देने लगे, तो वे इसे अपने वंशजों के लिए सुरक्षित कर दे।  नेता का बेटा नेता होता है और घपलेबाज़ का बेटा घपलेबाज़। बचपन से ही उन्हें यह सब सीखने का अवसर मिला है। इसी से तो उन्हें एक साथ दो चेहरे रखने का प्रशिक्षण मिल गया। एक चेहरा गरीब हितैषी, उदारमना, दूसरों की जि़ंदगियां सुधार देने का आभास देने वाला। दूसरा, वह जो नशे में बदमस्त हो पंचतारा डिस्को के बाहर पिस्तौल निकाल ले या अपने स्वामी नेता को खुश करने के लिए सैकड़ों की भीड़ समेटने वाले मैदान में हज़ारों की भीड़ जुटा दे। बाद में भगदड़ के कारण चंद धूल मिट्टी जैसे लोग अपनी जान से चले जाएं, तो मीडिया के कैमरों के समक्ष आंसू बहाते हुए अपनी बदइंतज़ामी का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ने लगे।

हमने तो डिस्को के बाहर हथियार लहराने वाले नेता जी को भी कमीज़ बदल कर सज्जनता से हाथ जोड़ते हुए देखा है। बाद में वह कैमरामैन से पूछने लगे, ‘जनाब, मैं मासूम तो लगा रहा था न?’ हुजूर, यह मंच भी आदमी का कैसा कायाकल्प कर देता है। एक दुराचारी, मंच पर चढ़ते ही समाज सुधारक बन जाता है और लोगों को अपना आचार-व्यवहार बदलने की प्रेरणा देता है। हम तो कहते हैं कि मंच पर करिश्मा दिखाने की यह कला ही बंदे को एक साथ दो चेहरे रखने का प्रशिक्षण देती है। गरीब अपने खाते की दुर्दशा देखता है। यह पहले भी खाली था, आज भी खाली है। बैंक विशेषज्ञों ने कहा, ‘भई इन खातों की फालतू लागत ने ही हमारी व्यवस्था की कमर तोड़ दी। क्यों न इन्हें बंद कर दिया जाए?’ खाली खाते बंद कर दो लेकिन उन करोड़ों रुपए के खातों का क्या होगा जिनके खाताधारक इनका मर्सिया पढ़ कर आज विदेशों में चैन की बंसी बजा रहे हैं? सब कुछ ठीक होगा, यह कहकर उन्होंने फिर जुमलों का अलख जगाया।

The post दोमुंहे लोगों की बरसात appeared first on Divya Himachal.