Tuesday, December 07, 2021 04:45 AM

मजदूर को मत मारो

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों द्वारा ‘लक्षित हत्याओं’ के मौजूदा मंजर में प्रवासी मज़दूरों का पलायन जारी है। ये मज़दूर उप्र और बिहार से कश्मीर में बीते कई सालों से आ रहे हैं। घाटी में कुछ स्थानों को तो ‘प्रवासियों का घर’ कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर का ज्यादातर श्रम इन्हीं मज़दूरों के सहारे है। सेब के बागीचों, खेतों, कोल्ड स्टोरेज से लेकर निर्माण-कार्यों और फर्नीचर के उद्योग में वे ही श्रम की बुनियाद हैं। ईंट, सीमेंट ढोने से लेकर सेब की पेटियों की पैकिंग और लोडिंग प्रवासी मज़दूर ही करते रहे हैं। वे कश्मीर ही नहीं, देश की मौजूदा और भावी अर्थव्यवस्था को आकार और आधार देने वाले हैं। उन्हें गोलियों से मत मारो! उन्हें तुम्हारे जेहाद से कोई सरोकार नहीं है!! वे किसी के भी दुश्मन नहीं हैं! उन्हें तो गले से लगाओ, नहीं तो पूरा कश्मीर थम जाएगा। अर्थव्यवस्था स्थिर और विकासहीन हो जाएगी। आर्थिक गतिविधियां ठिठक जाएंगी। यदि पलायन के बाद मज़दूर लौट कर घाटी में नहीं आए, तो समूचे जम्मू-कश्मीर की आर्थिक हालत क्या होगी, कल्पना भी नहीं की जा सकती। मज़दूर का काम मज़दूर ही कर सकता है, कोई आतंकी, अलगाववादी, अमीर या उद्योगपति नहीं कर सकता।

 अंततः देश की अर्थव्यवस्था को लाखों-करोड़ों डॉलर का नुकसान झेलना पड़ेगा। कोरोना-काल में लॉकडाउन की तालाबंदी के बाद बड़े उद्योग इन प्रवासी मज़दूरों की कमी झेल चुके हैं। इन्हें हिंदू-मुसलमान के दायरे में रखकर मत मारो। कुछ भी हासिल नहीं होगा। कश्मीर पर जेहादियों का कब्जा नहीं होगा। पाकिस्तान तुम्हें बरगला रहा है। मुट्ठी भर पैसों की खातिर अर्थव्यवस्था को नीलाम मत करो। मज़दूरों को बाद में ज्यादा भुगतान के लालच देने पड़ेंगे। लॉकडाउन के बाद व्यापारियों को यही करना पड़ा था। मज़दूरों को अग्रिम तौर पर पैसा देना पड़ा। उन्हें विमान के टिकट भेजे गए। उसके बावजूद पूरा श्रम लौट कर नहीं आया। 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में 45.6 करोड़ प्रवासी मज़दूर हैं।

तब की आबादी का 40 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा....! अब 2021 में उनकी संख्या बढ़ चुकी होगी। संसद के पटल पर रखी जाने वाली ‘आर्थिक सर्वेक्षण’ की रपटों में भी अंतरराज्यीय प्रवासी मज़दूरों के महत्त्व को आंका जाता रहा है। देश के 10 राज्यों-हरियाणा, झारखंड, मप्र, आंध्र, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक आदि-में स्थानीय नागरिकों के, निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी, आरक्षण के प्रस्ताव पारित किए गए। कानून भी बने, लेकिन जब राष्ट्रीय लॉकडाउन उठाया गया, तो फैक्ट्रियों में मज़दूर नहीं थे। सरकारों और कंपनियों ने उन्हें मनाकर वापस लाने की कोशिशें कीं। आधी-अधूरी कामयाबी ही हासिल हुई। शहरी और कृषि के कामों में हाड़तोड़ मेहनत और वह भी सस्ती मज़दूरी पर ये प्रवासी मज़दूर ही करते रहे हैं। वक़्त, मेहनत और लगातार अनुभव ने उन्हें हुनरमंद भी बना दिया है। उनके विकल्प कहां से मिलेंगे? मज़दूरों के भी घर, रिश्तेदार, परिजन हैं, उनके भी पारिवारिक और आर्थिक दायित्व हैं, वे भी देश भर में कहीं भी काम करके जीवन जीने को स्वतंत्र हैं, उन्हें भी मौलिक, संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, फिर उन्हें कैसे कहा जा सकता है-तुम यहां से चले जाओ। चूंकि अब तालाबंदी के बाद अर्थव्यवस्था करवट ले रही है, आर्थिक और उत्पादन संबंधी गतिविधियां गति पकड़ रही हैं, तो मज़दूर को मारने की बजाय उसका स्वागत करना चाहिए। उसे आलिंगनबद्ध करना चाहिए। वह ही मौजूदा अर्थव्यवस्था को आकार दे सकता है। उसके बिना उद्योगपति और पूंजीपति अधूरे हैं।