Tuesday, June 15, 2021 11:16 AM

डोज और डर

असल में मैंने भी खुराक लेने से पहले अस्पताल में सबकी उनके मोबाइल से फोटो लेने वाले कर्मचारी को अपना मोबाइल देते कहा था कि जैसे ही मैं वैक्सीन की खुराक लेने को कुर्ता खोलूं, मेरे फोन से मेरी फोटो खींच लेना, जानदार सी। फेसबुक पर मेरी फोटुएं अच्छी नहीं लगतीं। फेसबुक से बाहर बंदा मरा हुआ हो तो होता रहे। ...और उसने मुस्कुराते हुए वैसा ही किया। ज्यों ही नर्स ने वैक्सीन से भरी सीरिंज मेरी कुर्ता उतारी बाजू से टच भर ही की कि उधर अस्पताल के शायद उस इसी काम के लिए तैनात कर्मचारी ने मेरी फोटो खींची। मैंने फोटो चेक की। फोटो बेहतर आई थी। मन प्रसन्न हो गया। उसके बाद मैंने इतमिनान से वैक्सीन की खुराक ली उसके गुण दोषों की परवाह किए बिना। तब दरवाजे की ओर मुड़ा बड़बड़ाता हुआ, ‘यार! ये बंदे भी न! फेसबुक तक पर फोटो चैन से नहीं डालने देते। अब आपसे छिपाना क्या! मैं फेसबुक का इतना नशेड़ी हूं कि भांग चरस भी उसके आगे कुछ नहीं। जब तक अपना पल पल का किया कराया फेसबुक पर न डाल लूं, आत्माहीन की आत्मा को चैन नहीं मिलता। मित्रो! ये जो पेट न होता तो रोटी खाने के समय भी फेसबुक पर जुटा रहा करता।

 ये समय भी फेसबुक को ही डिवोट कर देता। फेसबुक से बढ़कर मेरे लिए कोई तप नहीं। फेसबुक से बढ़कर मेरे लिए कोई जप नहीं। फेसबुकम् चरणम् गच्छामि! फेसबुकम् शरणम् गच्छामि! जो शांति किसी सात्विक भक्त को अपने प्रभु के चरणों में जाकर मिलती है उससे कहीं अधिक मुझे फेसबुक के चरणों में लोटने से मिलती है। सच कहूं तो जो कोई मुझे फेसबुक और स्वर्ग में से किसी एक को चुनने को कहें तो मैं आंखें मूंद फेसबुक को ही चुनूंगा। दरवाजा खोला तो सामने प्रभु! मैंने अपना अधपहना कुर्ता पहनते पहनते उनको नमस्कार करते उनसे पूछा, ‘प्रभु आप! महामारी की दूसरी लहर में यहां ! कैसे हो?’ ‘मैं भी वैक्सीन की पहली खुराक लेने आया था। कोई दिक्कत तो नहीं होती? वैक्सीन को लेकर इतनी अफवाहें सुनीं तो सोचा पहले किसी खास अपने से इसके बारे में पता कर लूं, उसके बाद ही। पर जैसे ही मुझे फेसबुक से पता चला कि तुमने मुझ पर से अधिक विश्वास वैक्सीन पर करते डरते डरते वैक्सीन लगवा ली है तो सोचा तुमसे वैक्सीन के साइड इफेक्टों के बारे में पूछ कर ही...दूसरे मुझसे चाहे झूठ बोल लें, पर कम से कम तुम तो मुझसे झूठ नहीं बोलोगे, ऐसी मेरी तुम्हें लेकर उम्मीद है।’ ‘प्रभु! वैक्सीन और तुम? सरकार आपकी।

 सरकार वाले आपके और आप? ये क्या नया खेला है प्रभु? वैक्सीन तो हम मृत्युजीवियों के लिए है। तुम्हारे पास आधार उधूर, मेरा मतलब कोई आईडी वाईडी है क्या?’ ‘मुझे किसी तरह के आईडी प्रूफ की क्या जरूरत? मुझे अस्पताल का बेड बेड जानता है। अस्पताल के बेड पर बिन ऑक्सीजन के मरने वाला हर जीव से लेकर उसका अटेंडेंट तक जानता है।’ फिर कुछ देर रुक लंबी सांस लेने के बाद उन्होंने कहा, ‘क्या करें यार! समय ही कुछ ऐसा चला है कि...मेरे साथ रहते रहते तुम मेरी तरह तो नहीं हुए, पर मैं तुम्हारे साथ रहते रहते तुम्हारी तरह का जरूर हो गया।’ ‘मतलब?’ ‘मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये वे ही मेरे वाले ही प्रभु हैं जिनसे दिन में दस दस बार पता नहीं मैं क्या क्या मांग लेता था?’ ‘तो मेरे साथ चलोगे न तुम अस्पताल? अकेले मुझे डर सा लग रहा है यार! मेरे प्रभु न मेरे डरपोक पड़ोसी की तरह कहा तो मैं चुप! लगा, ज्यों मुझे बुखार आ रहा हो। अपना तो अपना, पड़ोसी तक का बदन दर्द से टूट रहा हो। मैंने अस्पताल से मिली आपातकालीन गोली मुंह में दबाई और प्रभु, देश दुनिया की ओर से बेखबर हो बिस्तर में दुबक गया।

अशोक गौतम

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