Monday, October 18, 2021 04:13 PM

जीवन में अहंकार

बाबा हरदेव गतांक से आगे... तू निरलेप कहां हुआ है। वास्तव में महानता उसी की है, जो सभी कर्मों को निभाता हुआ, निरलेप अवस्था में रहता है। जैसे कमल का फूल जल में रहता है। जल में रहकर भी जल से न्यारा रहता है, उसकी निरलेप अवस्था रहती है। कोई समझाने के लिए कहे कि कमल के फूल को अगर निरलेप रहना है, तो उसे उठाकर किसी कमरे में बंद कर दीजिए, किसी स्थान पर रख दीजिए। तब वह खुद पानी से निरलेप हो जाएगा। अगर पानी ही नहीं है, तो निरलेप किससे होगा? उसके निरलेप रहने की परख तो तभी होगी, जब वह पानी में रहकर निरलेप रहकर दिखाएगा। वह पानी में मौजूद रहे, तभी तो मालूम पड़े कि वह कितना निरलेप रह सकता है? इसी तरह भक्तों की, महापुरषांे की भावना रही है। भक्त इसी समाज में रहे और अपने फर्जों को निरलेप रहकर निभाते रहे हैं। वह चाहे किसी युग में संसार में आए, उन्होंने कर्मों से मुख नहीं मोड़ा। वे अपने परिवार में रहे और हर प्रकार के कर्त्तव्यों की पालना की और यह सब कुछ करते हुए भी उनकी निरलेप अवस्था बनी रही। एक राजा और रानी थे। दोनों को ध्यान आया कि माया को छोड़कर कहीं जाएं। दोनों चल दिए, तो रास्ते में राजा की नजर सोने के एक टुकड़े पर पड़ी। ज्यों ही उसने सोने का टुकड़ा देखा, फटाफट मिट्टी उठाकर उसके ऊपर डाल दी, ताकि वह सोने का टुकड़ा दिखाई न दे। रानी ने उसे मिट्टी डालते हुए देख लिया। उसने पूछा कि यहां आप क्या कर रहे थे? राजा बोला,यहां पर एक सोने का टुकड़ा पड़ा हुआ था, मैंने सोचा कि अगर आपकी नजर सोने के टुकड़े पर पड़ गई तो ये सोना देखकर आपको लालच आ जाएगा, इसलिए मैंने ऊपर मिट्टी डाल दी। रानी ने कहा कि आपको यह सोना देखकर अभी भी ध्यान है कि ये सोना है, मैं तो इसे पहले ही मिट्टी मान चुकी हूं। इसी तरह भक्त महापुरुष सभी पदार्थों का इस्तेमाल भले ही करते हैं, लेकिन मिथ्या मानते हुए उनमें गलतान नहीं हो जाते। निरलेप जीवन में अहंकार बड़ी बाधा पैदा करता है, क्योंकि अकसर इनसान को भ्रम हो जाता है कि शायद मैं खुद ही अपना तथा अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहा हूं। अकसर कह भी दिया जाता है कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम, लेकिन दास तो ऐसा मानता है कि दाने-दाने पर लिखा है देने वाले का नाम। दान देने वाला जो प्रभु दातार है, अगर इसकी कृपा न हो तो इनसान के सामने भले ही अनेक पदार्थ पड़े रहें, उनमें से एक छोटा सा कौर भी उठाकर मुंह में नहीं डाल सकता। भक्त हमेशा दातार की कृपा को ही मानते हैं। अगर कोई व्यापार करता है, तो भी ऐसा ही मानता है कि दातार अगर दिन में बीस-पच्चीस ग्राहक भी आ गए हैं, तो ये मेरे यतन के कारण नहीं, बल्कि तू मुझे रोजी-रोटी देना चाहता है। - क्रमशः