Sunday, July 25, 2021 08:40 AM

मूल्यांकन का चक्रव्यूह

फैसलों की अहमियत में इंतजार के लक्षण कब तक रहेंगे, इससे पहले यह गौर करना होगा कि हिमाचल मंत्रिमंडल ने बिना किसी हील हुज्जत के बंदिशों को कर्फ्यू के साये में 14 जून तक बढ़ा दिया है। यानी बाजार का गौण पक्ष ही हमारी हिफाजत करेगा या हमें यह कबूल कर लेना होगा कि जब तक वैक्सीन की आपूर्ति नहीं हो पाती, सरकार के पास अंतिम उपाय यही है कि बढ़ते मामलों के सामने लगातार कर्फ्यू या लॉकडाउन की दीवारें खड़ी कर दे। इसी तरह शिक्षा के विकल्प या नवाचार के बजाय बारहवीं जैसी परीक्षा  भी कोविड काल के ढक्कन में बंद हो गई। आश्चर्य यह कि बिना परीक्षा मूल्यांकन पद्धति सुनिश्चित किए बारहवीं के छात्रों को पास होने का मौका दे दिया। यह विमर्श का विषय है कि बारहवीं कक्षा में करियर ढूंढने, हासिल करने और प्रतिस्पर्धा में सबसे आगे होने का अवसर एक बार ही आता है। जाहिर है इसके लिए तैयारी का एक बड़ा तंत्र और पद्धति का कठिन मार्ग विकसित हुआ है। अतः मूल्यांकन के नए गठजोड़ में ऐसा चक्रव्यूह पैदा हुआ है, जिसे हर संजीदा छात्र नहीं तोड़ सकता। आशंकाओं का एक समाधान भले ही परीक्षाओं के वैकल्पिक मार्ग पर खड़ा है, लेकिन करियर की तलाश में वर्षों से तैयारियों का सबब इतना सरल नहीं कि हर तरह से दो जमा कर दिए जाएं या ऐसी औसत निकल आए, जो सभी को संतुष्ट कर दे। इसलिए स्कूल प्रवक्ता संघ का सुझाव भी हलचल पैदा करता है। मैट्रिक के अंकों से बारहवीं का परीक्षा परिणाम निकाला जा सकता है या स्कूलों में बच्चों का मूल्यांकन करती विविध परीक्षाओं में प्री बोर्ड एग्जामिनेश को आधार मान लिया जाए। बहरहाल शिक्षा के नए तराजू में फंसे छात्र अपने भविष्य की सबसे बड़ी आपदा का सामना तो कर ही रहे हैं। मंत्रिमंडल का यह फैसला पूरी तरह प्रधानमंत्री की छांव में सूरज उगाने का प्रयास हो सकता है, लेकिन भविष्य के अर्श पर इसे चिन्हित करना, हर छात्र की तपस्या, मेहनत और निरंतरता का प्रतिफल नहीं हो सकता। कुछ इसी तरह बाजार में कर्फ्यू का बढ़ता दखल उपचार के बजाय महामारी को रोकने का एक तरीका हो सकता है।

 बेशक हिमाचल ने इसी तरीके से कोरोना की पहली लहर का दम तोड़ा था और अब भी दूसरी लहर के खंजर टूट रहे हैं, लेकिन इस तरह तो कोरोना की बरसात आती रहेगी और हम कर्फ्यू की छतरी के नीचे बंदिशों की पहरेदार को ही समाधान मानते रहेंगे। कर्फ्यू का एक मार्मिक पक्ष और इसकी शर्तों का उत्पीड़न भी तो दिखाई देता है। प्रदेश में कर्फ्यू के बीच भवन निर्माण क्षेत्र को मिली छूट प्रवासी मजदूरों की मददगार तो है, लेकिन कितने ही हिमाचलियों की दिहाड़ी सड़क या बाजार में बिखर गई है। प्रदेश में करीब पच्चीस हजार रेहड़ी-फड़ी वालों के लिए कर्फ्यू सिर्फ एक डंडा है, जबकि सवा लाख के करीब छोटे दुकानदारों के लिए अपने व्यवसाय के दरवाजे खोलना भी मुनासिब नहीं। ऐसे में कर्फ्यू ने एक ओर रेहड़ी-फड़ी या छोटे दुकानदार को तो जकड़ लिया, लेकिन प्रवासी मजदूर की दिहाड़ी में छूट वीआइीपी बन गई। कर्फ्यू या लॉकडाउन के सन्नाटों में भले ही हम कोरोना को पछाड़ने का भ्रम पाल लें, लेकिन असली उपलब्धि वैक्सीन हासिल करने तथा अधिक से अधिक जनसंख्या को इसका लाभ देने में है। इसलिए समाज की अपेक्षाएं किसी इम्युनिटी किट के सौहार्द में पूरी नहीं होंगी, बल्कि वैक्सीन की एक डोज भी किसी बड़े से बड़े परीक्षा के सफल परिणाम की तरह साबित होगी। सीधे कहें तो कर्फ्यू एक ऐसा चक्रव्यूह है जो शैतान कोरोना के कारनामों को कुछ देर तक रोक सकता है, लेकिन फैसलों की असली जमीन तो वैक्सीन आपूर्ति ही पूरा करेगी।