Sunday, July 25, 2021 07:56 AM

खाद्य सुरक्षा पर भी रार!

फैसलों की अहमियत में इंतजार के लक्षण कब तक रहेंगे, इससे पहले यह गौर करना होगा कि हिमाचल मंत्रिमंडल ने बिना किसी हील हुज्जत के बंदिशों को कर्फ्यू के साये में 14 जून तक बढ़ा दिया है। यानी बाजार का गौण पक्ष ही हमारी हिफाजत करेगा या हमें यह कबूल कर लेना होगा कि जब तक वैक्सीन की आपूर्ति नहीं हो पाती, सरकार के पास अंतिम उपाय यही है कि बढ़ते मामलों के सामने लगातार कर्फ्यू या लॉकडाउन की दीवारें खड़ी कर दे। इसी तरह शिक्षा के विकल्प या नवाचार के बजाय बारहवीं जैसी परीक्षा  भी कोविड काल के ढक्कन में बंद हो गई। आश्चर्य यह कि बिना परीक्षा मूल्यांकन पद्धति सुनिश्चित किए बारहवीं के छात्रों को पास होने का मौका दे दिया। यह विमर्श का विषय है कि बारहवीं कक्षा में करियर ढूंढने, हासिल करने और प्रतिस्पर्धा में सबसे आगे होने का अवसर एक बार ही आता है। जाहिर है इसके लिए तैयारी का एक बड़ा तंत्र और पद्धति का कठिन मार्ग विकसित हुआ है। अतः मूल्यांकन के नए गठजोड़ में ऐसा चक्रव्यूह पैदा हुआ है, जिसे हर संजीदा छात्र नहीं तोड़ सकता। आशंकाओं का एक समाधान भले ही परीक्षाओं के वैकल्पिक मार्ग पर खड़ा है, लेकिन करियर की तलाश में वर्षों से तैयारियों का सबब इतना सरल नहीं कि हर तरह से दो जमा कर दिए जाएं या ऐसी औसत निकल आए, जो सभी को संतुष्ट कर दे। इसलिए स्कूल प्रवक्ता संघ का सुझाव भी हलचल पैदा करता है। मैट्रिक के अंकों से बारहवीं का परीक्षा परिणाम निकाला जा सकता है या स्कूलों में बच्चों का मूल्यांकन करती विविध परीक्षाओं में प्री बोर्ड एग्जामिनेश को आधार मान लिया जाए। बहरहाल शिक्षा के नए तराजू में फंसे छात्र अपने भविष्य की सबसे बड़ी आपदा का सामना तो कर ही रहे हैं। मंत्रिमंडल का यह फैसला पूरी तरह प्रधानमंत्री की छांव में सूरज उगाने का प्रयास हो सकता है, लेकिन भविष्य के अर्श पर इसे चिन्हित करना, हर छात्र की तपस्या, मेहनत और निरंतरता का प्रतिफल नहीं हो सकता। कुछ इसी तरह बाजार में कर्फ्यू का बढ़ता दखल उपचार के बजाय महामारी को रोकने का एक तरीका हो सकता है।

 बेशक हिमाचल ने इसी तरीके से कोरोना की पहली लहर का दम तोड़ा था और अब भी दूसरी लहर के खंजर टूट रहे हैं, लेकिन इस तरह तो कोरोना की बरसात आती रहेगी और हम कर्फ्यू की छतरी के नीचे बंदिशों की पहरेदार को ही समाधान मानते रहेंगे। कर्फ्यू का एक मार्मिक पक्ष और इसकी शर्तों का उत्पीड़न भी तो दिखाई देता है। प्रदेश में कर्फ्यू के बीच भवन निर्माण क्षेत्र को मिली छूट प्रवासी मजदूरों की मददगार तो है, लेकिन कितने ही हिमाचलियों की दिहाड़ी सड़क या बाजार में बिखर गई है। प्रदेश में करीब पच्चीस हजार रेहड़ी-फड़ी वालों के लिए कर्फ्यू सिर्फ एक डंडा है, जबकि सवा लाख के करीब छोटे दुकानदारों के लिए अपने व्यवसाय के दरवाजे खोलना भी मुनासिब नहीं। ऐसे में कर्फ्यू ने एक ओर रेहड़ी-फड़ी या छोटे दुकानदार को तो जकड़ लिया, लेकिन प्रवासी मजदूर की दिहाड़ी में छूट वीआइीपी बन गई। कर्फ्यू या लॉकडाउन के सन्नाटों में भले ही हम कोरोना को पछाड़ने का भ्रम पाल लें, लेकिन असली उपलब्धि वैक्सीन हासिल करने तथा अधिक से अधिक जनसंख्या को इसका लाभ देने में है। इसलिए समाज की अपेक्षाएं किसी इम्युनिटी किट के सौहार्द में पूरी नहीं होंगी, बल्कि वैक्सीन की एक डोज भी किसी बड़े से बड़े परीक्षा के सफल परिणाम की तरह साबित होगी। सीधे कहें तो कर्फ्यू एक ऐसा चक्रव्यूह है जो शैतान कोरोना के कारनामों को कुछ देर तक रोक सकता है, लेकिन फैसलों की असली जमीन तो वैक्सीन आपूर्ति ही पूरा करेगी।

देश में खाद्य सुरक्षा कानून यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार के दौरान बनाया गया था। कानून अब भी प्रभावी और जारी है। खाद्य सुरक्षा का मकसद था कि कोई भी देशवासी भूखा नहीं सोना चाहिए। हर पेट और परिवार को समुचित अनाज उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इस मानवीय योजना पर भारत सरकार 47,000 करोड़ रुपए से अधिक की सबसिडी देती है, लिहाजा नीति आयोग ने सुझाव दिया था कि खाद्य सुरक्षा के दायरे में शहरी और ग्रामीण लाभार्थियों की संख्या कम की जाए, ताकि सबसिडी के बोझ को कम किया जा सके। नीति आयोग का सुझाव था कि 75 फीसदी ग्रामीण आबादी को 50 फीसदी और शहरी आबादी को 60 फीसदी से घटाकर 40 फीसदी किया जाए। यानी खाद्य सुरक्षा कानून के तहत खाद्यान्न प्राप्त करने वालों की संख्या घटाने का इरादा है नीति आयोग का। वैसे गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों को सरकार 2 रुपए किलो गेहूं और 3 रुपए किलो चावल के हिसाब से खाद्यान्न उपलब्ध कराती रही है। प्रत्येक परिवार को 35 किलो अनाज प्रति माह लगभग निःशुल्क ही मिलता है।

 चूंकि बीते डेढ़ साल से देश पर कोरोना महामारी की घातक कालिमा छाई है, लिहाजा लंबी तालाबंदी भी करनी पड़ी है। अब भी अधिकतर राज्यों में लॉकडाउन लागू है, बेशक कुछ बंदिशों और ढील के साथ ताले खोलने की शुरुआत की गई है। तालाबंदी के कारण करोड़ों लोग और खासकर दिहाड़ीदार मजदूर बेरोज़गार हुए हैं, लिहाजा भारत सरकार ‘गरीब कल्याण योजना’ के तहत करीब 80 करोड़ देशवासियों को अनाज मुहैया करा रही है। इस योजना पर करीब 26,000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। कितने गरीबों को निःशुल्क अनाज नसीब हो रहा है और कितने खाद्यान्न की कालाबाज़ारी, जमाखोरी और मुनाफाखोरी राशन माफिया कर रहा है, इसका कोई पुष्ट और सत्यापित डाटा उपलब्ध नहीं है और न ही भारत सरकार के संबद्ध मंत्रालय ने डाटा उपलब्ध कराने की कोशिश की है। इसी कड़ी में दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ‘घर-घर राशन’ योजना का आगाज़ करना चाहते थे, जिस पर उपराज्यपाल के जरिए केंद्र सरकार ने रोक लगवा दी है और पुनर्विचार की दलील दी जा रही है। योजना में 4 किलो आटा, एक किलो चावल, एक किलो चीनी प्रति व्यक्ति, प्रति माह देने की व्यवस्था तय की गई थी। अनाज पैकेट में अच्छी तरह सीलबंद करके घर-घर मुहैया कराया जाना था। उससे करीब 73 लाख दिल्लीवासी लाभान्वित होते! गौरतलब यह है कि राज्यों में राशन डिपुओं के जरिए जो अनाज वितरित किया जाता है, उसकी सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर राज्य सरकार का विशेषाधिकार होता है। डिपुओं के अनाज को दिल्ली सरकार अपनी निगरानी में, सीलबंद करके, बांटना चाहती है। यह कोई खैरात नहीं है। केंद्र के अनाज में दिल्ली का भी अपना हिस्सा है।

 उसे घर-घर प्रत्येक राशनकार्ड धारक तक अनाज सुनिश्चित कराना था। इसमें गलत क्या था? यदि दिल्ली को मिलने वाला खाद्यान्न का कोटा कम पड़ता, तो राज्य सरकार केंद्र से खरीद सकती थी। योजना को एकदम ‘घोटाला’ करार देना तो नैतिक, प्रशासनिक और सियासी रूप से गलत है। आखिर भारत की मोदी सरकार ने राज्य सरकारों के साथ रार के मोर्चे क्यों खोल रखे हैं? केंद्र सरकार की ‘गरीब कल्याण योजना’ के तहत भी अनाज राशनवाले ही बांटते हैं। जिस परिवार को खाद्यान्न नहीं मिलता अथवा कम मिलता है, क्या वह प्रधानमंत्री मोदी को शिकायत कर सकता है? संभव ही नहीं है। दरअसल खाद्य सुरक्षा कानून के तहत प्रत्येक राज्य सरकार में खाद्य आयोग गठित करने और अनाज के सोशल ऑडिट की व्यवस्था करने की हिदायत दी गई थी। वह व्यवस्था ही किसी ने नहीं की और न ही केंद्र सरकार ने किसी राज्य सरकार को बाध्य किया। यह भी तय नहीं है कि उच्च न्यायालय में जो केस विचाराधीन है, उसमें भी इन व्यवस्थाओं का जि़क्र है अथवा नहीं है। आगामी 20 अगस्त को सुनवाई की तारीख है, लेकिन अदालत में मामला होने के कारण किसी भी योजना को लागू करने से नहीं रोका जा सकता। भाजपा का ऐसा तर्क बेमानी है। अनाज न तो मोदी का है और न ही केजरीवाल का है। वह देश का है, जो करदाताओं के दिए गए पैसों से खरीदा जाता रहा है, लिहाजा आम नागरिक को खाद्यान्न मिलना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।