Sunday, July 25, 2021 07:42 AM

हमाम के बाहर सब...

सरकार ने छोटे उद्योगों को सरल ऋण उपलब्ध कराने पर जोर दिया है जो कि सामान्य परिस्थितियों में सही बैठता। लेकिन जिस समय छोटे उद्योगों द्वारा बनाया गया माल बाजार में बिक ही नहीं रहा है, उस समय उनके द्वारा ऋण लेकर कठिन समय पार करने के बाद उनके ऊपर ऋण का अतिरिक्त बोझ आ पड़ेगा और वे ऋण के बोझ से उबर ही नहीं पाएंगे। यूं ही मरने के स्थान पर वे ऋण के बोझ से दब कर मरेंगे। इसलिए ऋण पर सबसिडी देने के स्थान पर उसी रकम को सीधे नगद सबसिडी के रूप में देना चाहिए। सरकार को अपनी नीतियों का पुनरावलोकन करके छोटे उद्योगों को राहत देनी चाहिए...

वैश्विक सलाहकारी कंपनी मैकेंजी ने अक्तूबर 2020 के एक अध्ययन में कहा था कि यूरोप के छोटे उद्योगों का स्वयं का अनुमान है कि आधे आने वाले 12 माह में बंद हो जाएंगे। भारत की परिस्थिति ज्यादा दुष्कर है क्योंकि हमारे छोटे उद्योगों ने लॉकडाउन के साथ-साथ नोटबंदी और जीएसटी की मार भी खाई है। ई-कॉमर्स और बड़ी कंपनियों ने छोटे उद्योगों के बाजार पर कब्ज़ा कर लिया है। अतः प्रश्न उठता है कि छोटे उद्योगों को जीवित रखा ही क्यों जाए? उन्हें मर क्यों न जाने दिया जाए? यदि बड़े उद्योग माल का कम कीमत में उत्पादन कर सकते हैं तो उसे छोटे उद्योगों से उत्पादन करने से लाभ क्या है? विषय यह है कि छोटे उद्योग यद्यपि माल महंगा बनाते हैं, परंतु वे हमारे भविष्य के उद्यमियों के इनक्यूबेटर अथवा लेबोरेटरी भी हैं। आज का छोटा उद्यमी कल बड़ा हो सकता है। धीरुभाई अंबानी किसी समय छोटे उद्यमी थे। यदि उनके छोटे उद्योग को पनपने का अवसर नहीं मिलता तो वे कभी बड़े भी नहीं होते। साथ ही ये भारी संख्या में रोजगार सृजित करते हैं। रोजगार उत्पन्न होने से जनता की सृजनात्मक क्षमता उत्पादक कार्यों में समाहित हो जाती है। यदि हमारे युवाओं को रोजगार नहीं मिला तो वे अंततः आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होंगे जो हो भी रहा है। औरंगाबाद (महाराष्ट्र) के विश्वविद्यालय के प्रोफेसर की मानें तो उनके एमए पढ़े छात्र भी अब एटीएम तोड़ने जैसे कार्यों में लिप्त हो गए हैं, चूंकि वे बेरोजगार हैं। बड़ी संख्या में लोगों के अपराध में लिप्त होने से सुरक्षा का खर्च बढ़ता है, देश पर पुलिस का खर्च बढ़ता है, नागरिकों में असुरक्षा की भावना विकसित होती है और सामाजिक तथा पारिवारिक ढांचा विघटित होता है।

देश में असुरक्षित वातावरण के कारण विदेशी कंपनियां भी निवेश करने से कतराती हैं। इसलिए यदि हम छोटे उद्योगों से बने माल के ऊंचे दाम को सहन करें तो इस भार के बावजूद आर्थिक विकास हासिल होता है चूंकि अपराध कम होते हैं और सामाजिक वातावरण आर्थिक गतिविधियों के विस्तार और निवेश के अनुकूल स्थापित हो जाता है। इसके विपरीत यदि हम बड़े उद्योगों से उत्पादन कराएं, तो बेरोजगारी और अपराध दोनों बढ़ते हैं। यद्यपि बाजार में सस्ता माल उपलब्ध होता है, परंतु अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है क्योंकि अपराध बढ़ते हैं। इसके अतिरिक्त बेरोजगारों को न्यूनतम सुरक्षा देने को मनरेगा जैसे कार्यक्रमों पर सरकार को खर्च भी अधिक करना पड़ता है। मेरा आकलन है कि मनरेगा पर खर्च की गई रकम मूल रूप से अनुत्पादक कार्यों में लगती है। वही रकम यदि छोटे उद्योगों को समर्थन देने में लगाई जाए तो उत्पादन बढे़गा। अतएव केवल बड़े उद्योगों के सहारे आर्थिक विकास की नीति विफल होने की संभावना ज्यादा है। पिछले 6 वर्षों में हमारी आर्थिक विकास दर गिरने का यह एक बड़ा कारण दिखता है। छोटे उद्योगों को जीवित रखने के लिए हमें पहला कार्य यह करना होगा कि उनकी उत्पादन लागत कम आए। इसके लिए ऋण देने के अतिरिक्त ठोस कदम उठाने होंगे। यूरोपीय यूनियन की छोटे उद्योगों की गाइड बुक में सुझाव दिया गया है कि छोटे उद्योगों को ट्रेनिंग, रिसर्च एवं सूचना उपलब्ध कराने के लिए उनके गुट अथवा क्लस्टर बनाने चाहिए और इन क्लस्टरों का संचालन छोटे उद्योगों के अपने संगठनों के हाथ में दे देना चाहिए। जैसे वाराणसी में यदि बुनकरों को समर्थन देना है तो वाराणसी के बुनकरों के संगठन के माध्यम से उन्हें ट्रेनिंग, रिसर्च और सूचना उपलब्ध कराई जाए।

 उनके संगठन को सही ज्ञान होता है कि किस प्रकार की तकनीक की जरूरत है और किस प्रकार की ट्रेनिंग कामयाब होगी। यदि यही कार्य किसी एनजीओ अथवा किसी सरकारी तंत्र के माध्यम से कराया जाता है तो उन्हें जमीनी स्थिति का ज्ञान नहीं होता है और उनके द्वारा चलाए गए कार्यक्रम वैसे होते हैं जैसे तेल पर पानी के रंग बिखरते हैं। तमाम एनजीओ ऐसी योजनाओं में अपनी रोटी सेंक रहे हैं। चिकने पन्नों पर रपटें लिखी जाती हैं, लेकिन छोटे उद्योग मरते ही जाते हैं। इस दिशा में भारत सरकार की नीति विपरीत दिशा में दिख रही है। छोटे उद्योगों के परिसंघ के सचिव अनिल भरद्वाज के अनुसार सरकार द्वारा छोटे उद्योगों की समस्याओं के निवारण के लिए जो बोर्ड बनाया गया है, उसमें पूर्व में छोटे उद्योगों के संगठनों के प्रतिनिधियों को पर्याप्त स्थान दिया जाता था। बीते दिनों में सरकार ने इस बोर्ड में केवल अधिकारी और नेताओं की नियुक्ति की है और छोटे उद्योगों के संगठनों की सदस्यता पूर्णतया समाप्त कर दी है। यानी जिसके हित के लिए ये बोर्ड बनाए गए हैं, वे ही इन बोर्डों में अनुपस्थित हैं। इस नीति को बदलना चाहिए। दूसरा काम सरकार को छोटे उद्योगों को इस कठिन समय में वित्तीय सहायता देने पर विचार करना चाहिए। भारत सरकार के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ  पब्लिक फाइनेंस एंड पालिसी के अप्रैल 2020 के एक अध्ययन में बताया गया है कि ब्राजील, कनाडा और न्यूजीलैंड में छोटे उद्योगों द्वारा अपने श्रमिकों को दिए जाने वाले वेतन का एक अंश कुछ समय के लिए सबसिडी के रूप में दिया गया है जिससे कि छोटे उद्योग भी जीवित रहें और और उनमें कार्यरत श्रमिक भी अपना जीवन निर्वाह कर सकें। यहां भी भारत सरकार की नीति विपरीत दिशा में है।

सरकार ने छोटे उद्योगों को सरल ऋण उपलब्ध कराने पर जोर दिया है जो कि सामान्य परिस्थितियों में सही बैठता। लेकिन जिस समय छोटे उद्योगों द्वारा बनाया गया माल बाजार में बिक ही नहीं रहा है, उस समय उनके द्वारा ऋण लेकर कठिन समय पार करने के बाद उनके ऊपर ऋण का अतिरिक्त बोझ आ पड़ेगा और वे ऋण के बोझ से उबर ही नहीं पाएंगे। यूं ही मरने के स्थान पर वे ऋण के बोझ से दब कर मरेंगे। इसलिए ऋण पर सबसिडी देने के स्थान पर उसी रकम को सीधे नगद सबसिडी के रूप में देना चाहिए। छोटे उद्योगों द्वारा अकसर आयातित कच्चे माल का उपयोग करके माल तैयार किया जाता है और फिर उसको बाजार में बेचा जाता है अथवा निर्यात किया जाता है। इनमें से एक कच्चा माल प्लास्टिक है। सरकार ने प्लास्टिक पर आयात कर बढ़ा दिए हैं जिसके कारण कच्ची प्लास्टिक का दाम अपने देश में बढ़ गया है और विशेषज्ञों के अनुसार प्लास्टिक का माल बनाने वाले छोटे उद्योग बंद प्रायः हो गए हैं। यही परिस्थिति अन्य कच्चे माल की हो सकती है। ऐसे कच्चे माल पर आयात कर घटाना चाहिए। सरकार को अपनी नीतियों का पुनरावलोकन करके छोटे उद्योगों को राहत पहुंचाना चाहिए अन्यथा न तो भविष्य में धीरुभाई जैसे उद्यमी बनेंगे, न ही आर्थिक विकास हासिल होगा।

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

ई-मेलः [email protected]

हमारे देश की जनसंख्या अमरीका और ब्राज़ील से कई गुणा अधिक है। केंद्र सरकार ने टीकाकरण के लिए 35000 करोड़ रुपए बज़ट में निर्धारित किए हैं। अब देश में वैक्सीन का निर्माण हो गया है और दवा कंपनियों द्वारा देश में और टीके तैयार करने पर बातचीत चल रही है। आगामी जुलाई-अगस्त तक देश में ही एक और स्वदेशी टीका उपलब्ध होगा। सरकार ने एक कंपनी को इसकी 30 करोड़  खुराकें बनाने के लिए 1500 करोड़ रुपए का अग्रिम भुगतान किया है। यह खुराकें अगस्त-दिसंबर मास में उपलब्ध होंगी। कोविशील्ड बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ने भी  रूस का टीका स्पूतनिक-वी बनाने की अनुमति मांगी है। हिमाचल की एक फार्मा कंपनी को भी कोविक्सीन टीका बनाने की अनुमति मिली है...

कोविड का कहर पिछले कुछ दिनों में कम हुआ है। गत अप्रैल मास में जो तबाही सारे देश में हुई, उसके ज़ख्म बरसों तक समाज भुला नहीं पाएगा। समूचे परिवार कोरोना की भेंट चढ़ गए। शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिस पर कोविड महामारी का असर न पड़ा हो। सरकार ने कोरोना की पहली लहर का डट कर  मुकाबला किया और इस चुनौती पर विजय हासिल की। अभी देश संभला भी नहीं था कि कोरोना की दूसरी लहर ने समस्त देश को अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया।  दूसरी बार के कोरोना-आक्रमण ने देश की स्वास्थ्य-सेवाओं पर सर्वाधिक दबाव डाला। इसके कारण कोविड संक्रमितों को बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा। अस्पतालों में  ऑक्सीजन की कमी से बहुत से संक्रमित लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। एक आकलन के अनुसार देश में 2.76 करोड़ कोरोना के मामले थे और कोरोना से मृत्यु का आंकड़ा 3.19 लाख तक पहुंच गया था। इस चुनौती और संकट भरे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं मोर्चा संभाल कर स्थिति पर निगरानी रखी और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी स्वयं स्थिति पर निगरानी रखने का निर्देश दिया। परिणामतः स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सका। वास्तव में अभी हम पूरी तरह से इस विपदा से उबरे नहीं हैं। मास्क लगाने सहित सामाजिक दूरी के अलावा जो भी निर्देश स्वास्थ्य मंत्रालय ने समय-समय पर ज़ारी किए हैं, उनका पालन करना तो हरेक के लिए जरूरी है। इसके साथ ही कोविड महामारी से बचने के लिए टीका लगवाना भी आवश्यक है। सरकार हर व्यक्ति को टीकाकरण अभियान के अंतर्गत टीके की सुविधा प्रदान करने के लिए प्रयासरत है। दुख तो तब होता है जब मानवीय संवेदनाओं और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर भी सत्ता-लोलुप राजनीतिक दल  राजनीति करते हैं। ये वही राजनीतिक दल हैं जो पहले इस टीके का विरोध कर रहे थे, अब इसे शीघ्र देश की जनता तक पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री पर   राजनीतिक छींटाकशी कर रहे हैं।

 मोदी सरकार ने टीकाकरण के संबंध में केंद्र के रोडमैप को प्रदर्शित कर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। सरकार दिसंबर के अंत तक 118 करोड़ लोगों तक वैक्सीन पहुंचाने का लक्ष्य रखती है। केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि टीकाकरण  अभियान में अगस्त मास से तेज़ी आएगी  और देश में दिसंबर मास तक 118 करोड़ लोगों को टीका लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। सीरम इंस्टीट्यूट मासिक उत्पादन 6.5 करोड़ डोज़ से बढ़ा कर 11 करोड़ कर रहा है। हमारे देश की जनसंख्या अमरीका और ब्राज़ील से कई गुणा अधिक है। केंद्र सरकार ने टीकाकरण के लिए 35000 करोड़ रुपए बज़ट में निर्धारित किए हैं। अब देश में वैक्सीन का निर्माण हो गया है और दवा कंपनियों द्वारा देश में और टीके तैयार करने पर बातचीत चल रही है। आगामी जुलाई-अगस्त तक देश में ही एक और स्वदेशी टीका उपलब्ध होगा। सरकार ने एक कंपनी को इसकी 30 करोड़  खुराकें बनाने के लिए 1500 करोड़ रुपए का अग्रिम भुगतान किया है। यह खुराकें अगस्त-दिसंबर मास में उपलब्ध होंगी। कोविशील्ड बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ने भी  रूस का टीका स्पूतनिक-वी बनाने की अनुमति मांगी है। हमारे लिए यह गर्व का विषय है कि हिमाचल की एक फार्मा कंपनी को भी कोविक्सीन टीका बनाने की अनुमति मिली है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोविड महामारी से भविष्य में निपटने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य हो रहा है। हमारा देश भी इस दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। इन सब प्रयासों से भारत में कोविड की दूसरी लहर पर पूरी तरह से नियंत्रण पा सकने में हम  एकजुट होकर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। यह बात समझी जानी चाहिए कि जनसहभागिता के बिना सरकार अकेले इस महामारी पर नियंत्रण नहीं पा सकती है।

 आम जनता की सक्रिय भागीदारी इसके लिए जरूरी है। सरकार को जो काम करने हैं, वे काम वह कर रही है, लेकिन आम जनता को भी अपने दायित्व बखूबी निभाने होंगे, तभी कोरोना जैसी महामारी को नियंत्रित किया जा सकता है। उपाय के रूप में जो दिशा-निर्देश सरकार ने जारी किए हैं, उनका पालन करना अति आवश्यक है। हाथों को समय-समय पर साबुन से धोएं अथवा सेनेटाइज करें। दो गज की सामाजिक दूरी बनाए रखें। जब भी घरों से बाहर निकलें, तो फेस मास्क अवश्य पहनें। भीड़-भाड़ से दूर रहने की जरूरत है। अनावश्यक रूप से घरों से बाहर न निकलें। टीकाकरण को लेकर किसी तरह के दुष्प्रचार में न आएं और टीका जरूर लगाएं। विपक्षी दलों को भी संकट के इस समय में नुक्ताचीनी करने के बजाय सकारात्मक माहौल बनाने में सहयोग करना चाहिए तथा अपने रचनात्मक सुझाव देने चाहिए। समाज के हर वर्ग के सहयोग से हम इस महामारी को रोकने में कामयाब होंगे। केंद्र तथा विभिन्न राज्यों की सरकारें इस दिशा में प्रयासरत हैं। कोविड के कारण लगे लॉकडाउन से जिन लोगों के रोजगार छिन गए हैं, उन लोगों के पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार कई योजनाओं पर काम कर रही है। लोगों को उनके गांवों में ही रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रयास हो रहे हैं। आशा है यह महामारी जल्द दूर होगी और हालात फिर से सुधर जाएंगे।

किशन कपूर

लोकसभा सांसद

हमाम के भीतर दा़िखल होने के बाद उन्होंने देखा कि उनके जैसे तमाम लोग प्राकृतिक अवस्था में अर्थात् बिना वस्त्रों के नज़र आ रहे हैं। यूं तो दुनिया का ऊसूल है कि हमाम के भीतर भी इतनी लोक-लाज तो होनी ही चाहिए कि सभी अंगवस्त्रों में रहें। लेकिन सियासी हमाम इसकी इजाज़त नहीं देता। सियासी हमाम का ड्रेस कोड ही प्राकृतिक अवस्था है। गए तो भीतर वह पूरे ढके हुए ही थे, लेकिन जब उन्होंने दूसरे माननीयों को बिना किसी शर्म के प्राकृतिक अवस्था में घूमते हुए देखा तो उन्होंने भी नैतिकता के चोले को उसी तरह उतार फैंका जैसे कोई भक्त बिना किसी भय के मंदिर में प्रवेश से पहले अपने जूते बाहर उतार देता है। हो सकता है देवता दर्शन के बाद बाहर आने पर भक्त को नंगे पांव घर लौटना पड़े; लेकिन सियासी हमाम में एक बार प्रवेश करने के बाद इतना तो तय है कि आदमी सोने के जूते पहन कर घर लौटता है। एक बार सदन में प्रवेश करने के बाद उसकी वतनपरस्ती इतनी प्रगाढ़ हो जाती है कि उसके मरने तक और मरने के बाद भी दशकों तक देश उसकी ़कीमत उसी प्रकार चुकाता रहता है; मानो स्वतंत्रता सेनानियों और आपातकालीन पीडि़तों के दर्द की ़कीमत चुका रहा हो।

कोई बड़ी बात नहीं कि किसी दिन हमाम में कुछ नंगों के दिमा़ग में कीड़ा कुलबुलाने लगे कि सभी नंगों के आश्रितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। ऐसे विधेयक बिना किसी बहस के ध्वनि मत से पास हो जाते हैं। हमाम के अंदर माननीय अगर प्राकृतिक अवस्था में घूमते तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी? लेकिन उन्होंने सदन में सर्वसम्मति से पारित विधेयक में ़फैसला लिया कि चूंकि माननीय देश सेवा के काम में दिन-रात व्यस्त रहते हैं और उनके कपड़े पहनने-बदलने से देश का व़क्त ज़ाया होता है। इसीलिए उन्हें प्राकृतिक अवस्था में घूमने का विशेषाधिकार प्रदान किया जाए। जो व्यक्ति उनके इस विशेषाधिकार पर सवाल उठाएगा उसे राष्ट्रविरोधी ़करार देकर, उस पर देश के सुरक्षा अधिनियमों के तहत मु़कद्दमा चलाया जाएगा। अगर यह संभव न हो तो कम से कम उसे इतने दिन हिरासत में रखा जाएगा कि वह अपने कपड़े पहनना भूल जाए। इस तरह जब देश में सभी बिना कपड़ों के घूमेंगे तो कोई उनकी नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकेगा।

 यह माननीयों के अथक परिश्रम का ही नतीजा है कि अब देश में आम आदमी जब और जहां चाहे वस्त्र उतार सकता है। इससे आम आदमी को माननीय होने की नैसर्गिक पात्रता हासिल हो गई है। बशर्ते उसमें इतनी हिम्मत हो कि वह नैतिकता की चादर को अपनी सुविधानुसार ओढ़-बिछा सके। अब किसी देश की सरकार अपने नागरिकों में हिम्मत पैदा करने का विधेयक तो पारित कर नहीं सकती। यह क्या कम है कि आज़ाद देश के नागरिकों को सुविधानुसार हमाम के भीतर और बाहर प्राकृतिक अवस्था में घूमने की पूरी आज़ादी हासिल है। वास्तव में इस विधेयक के पास होने के बाद माननीयों को यह आसानी हो गई है कि वे जब चाहे किसी भी पक्षी या जानवर की खाल ओढ़ सकते हैं। अपनी सहूलियत के अनुसार जब चाहे कौए या गिद्ध बन सकते हैं और जब चाहे भेडि़ए, मगरमच्छ या घडि़याल। अगर सरकार ने देश में गिद्धों की संख्या बढ़ाने के लिए विभिन्न परियोजनाएं आरंभ नहीं की होतीं और सि़र्फ हमाम के अंदर और बाहर झांक कर देखा होता तो उसे गिद्ध ही गिद्ध नज़र आते। इससे इन परियोजनाओं पर ़खर्च होने वाले धन को माननीय अपनी सात पीढि़यों को मह़फूज़ बनाने के लिए सदुपयोग में ला सकते थे। रही बात घडि़यालों की तो उन्हें हर कहीं आंसू बहाते हुए देखा जा सकता है।

पी. ए. सिद्धार्थ

लेखक ऋषिकेश से हैं