Tuesday, April 13, 2021 09:29 AM

यत्र तत्र सर्वत्र गर्दभ

वैचारिक मतभेद होना आवश्यक है, लेकिन मनभेद घातक होता है। रेडियो और सोशल मीडिया के माध्यम से जिस भी व्यक्ति ने यह देखा-सुना, उसे बहुत पीड़ा हुई कि आज संवैधानिक व्यक्ति के ऊपर किस तरह से लोकतंत्र का हनन हो रहा है। भारतीय संविधान में महामहिम राष्ट्रपति और महामहिम राज्यपाल का पद संवैधानिक पद है और संवैधानिक व्यक्ति के ऊपर अगर ऐसी घिनौनी हरकतें की जाए तो लोकतंत्र का यह बहुत बड़ा मजाक है। ऐसी घटनाओं पर अति शीघ्र रोक लगानी होगी ताकि देश-प्रदेश की कार्यप्रणाली में भी सुधार हो और लोकतंत्र में संवैधानिक व्यक्ति की गरिमा का भी सम्मान हो। विधानसभा में जो कुछ हुआ, वो घटनाएं अपनी दास्तां स्वयं बयां करती हैं...

हिमाचल प्रदेश में विधानसभा का बजट सत्र शुरू हुआ। शुरू होते ही इस सत्र ने अपने साथ कई सवालो-निशान खडे़ कर दिए। संविधान की ली गई शपथों की मर्यादाओं को लांघ दिया गया। जिस तरह से शिक्षा के मंदिर शिक्षा संस्थाओं को पवित्र संस्था माना जाता है, उसी प्रकार भारत की संसद और राज्य विधानसभाओं को कानून तय करने वाली पवित्र संस्था और आत्मा माना जाता है। लेकिन हिमाचल विधानसभा का बजट सत्र शुरू होते ही जो ड्रामा हुआ, उससे आम जनमानस को तो ठेस पहुंची ही है, साथ ही संवैधानिक पद की गरिमा को भी तार-तार कर दिया गया। आम जनता जिन नुमाइंदों को चुनकर भेजती है और उनसे बहुत सी अपेक्षाएं रखती हैं ताकि वे जनता के हितों की रक्षा व उनको पूरा कर सकें। लेकिन उस समय प्रत्येक मतदाता को शर्मिंदगी महसूस हुई, जब विधानसभा के अंदर और बाहर माननीय राज्यपाल के साथ सदन के सदस्यों यानी नेताओं ने अपनी व्यावहारिकता का परिचय दिया। वो सब मर्यादाओं से परे था। जिस तरह से देश का प्रथम व्यक्ति भारत का महामहिम राष्ट्रपति होते हैं, वहीं राज्य में प्रथम व्यक्ति महामहिम राज्यपाल होते हैं, लेकिन जो कुछ भी हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है और ऐसा भविष्य में कभी भी नहीं होना चाहिए।

आम जनता अपने नुमाइंदों को चुनकर भेजती है ताकि वे अच्छे कानून बनाकर और जनता की समस्याओं को सदन में रखकर उनका समाधान निकालने के प्रयास किए जा सकें और उन समस्याओं के लिए बजट का अच्छा प्रावधान भी हो। इसमें चाहे सत्तापक्ष हो या विपक्ष हो, दोनों की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वे इस पवित्र स्थान में हंगामा-नारेबाजी न करते हुए जनमानस की समस्याओं की ओर ध्यान दें। क्योंकि जनता अपने हितों के लिए सदन की गतिविधियों को सुनती भी है और देखती भी है, लेकिन जैसा हुआ वैसा शोरोगुल और हाथापाई अगर चुने हुए प्रतिनिधियों के बीच में हो तो लोकतंत्र के लिए यह एक बहुत ही बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के इतिहास में यह घटना शर्मसार करने वाली है। स्पष्ट है कि जब राज्यपाल राजभवन की ओर जा रहे थे, तभी सदन के विधायकों ने विधानसभा के काउंसिल चैंबर गेट पर राज्यपाल की गाड़ी को घेरकर जमकर नारेबाजी की। इस दौरान मामला इतना बढ़ गया कि विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति पनप उठी। एक ओर कुछ विधायकों ने हंगामा किया और मार्शल के साथ कहासुनी भी जमकर हुई, ऐसी घटनाएं सदन की गरिमा को तो धूल में मिलाती ही हैं, साथ में संवैधानिक पदों के सम्मान के प्रति भी सवालिया निशान खड़े कर देती हैं। जिन सत्ता पक्ष व विपक्ष में बैठे जनता के नुमाइंदों को अपने क्षेत्र व प्रदेश की महानुभव जनता की आवाज कहा जाता है, क्या यह वही आवाज है जिसका प्रदर्शन इन लोगों ने विधानसभा परिसर में किया। हंगामा कभी भी किसी मसले का हल नहीं हो सकता। चाहे फिर हंगामा करने वाला कोई भी हो, वो मायने नहीं रखता। देश-प्रदेश की जनता ने अपने नुमाइंदों को समस्याओं का समाधान करने सदन में भेजा है ताकि समस्त जनता के हितों की सुरक्षा हो, लेकिन ये नुमाइंदे तो संवैधानिक पदों व सदन की गरिमा तथा अपने कर्त्तव्यों व जिम्मेदारियों को ही नहीं समझते तो यह जन समस्याओं का निपटारा क्या करेंगे, यह सवाल मन में उठता है। गलत का विरोध जायज है, लेकिन विरोध के लिए संवैधानिक पदों का ही विरोध कर देना कदापि समाज हित व जनहित में नहीं हो सकता। लोकतंत्र में सर्वसम्मति का होना बेहद आवश्यक होता है।

वैचारिक मतभेद होना आवश्यक है, लेकिन मनभेद घातक होता है। रेडियो और सोशल मीडिया के माध्यम से जिस भी व्यक्ति ने यह देखा-सुना, उसे बहुत पीड़ा हुई कि आज संवैधानिक व्यक्ति के ऊपर किस तरह से लोकतंत्र का हनन हो रहा है। भारतीय संविधान में महामहिम राष्ट्रपति और महामहिम राज्यपाल का पद संवैधानिक पद है और संवैधानिक व्यक्ति के ऊपर अगर ऐसी घिनौनी हरकतें की जाए तो लोकतंत्र का यह बहुत बड़ा मजाक है। ऐसी घटनाओं पर अति शीघ्र रोक लगानी होगी ताकि देश-प्रदेश के कार्यप्रणाली में भी सुधार हो और लोकतंत्र में संवैधानिक व्यक्ति की गरिमा का भी सम्मान हो। विधानसभा में जो कुछ हुआ, वो घटनाएं अपनी दास्तां स्वयं बयां करती हैं। ऐसी घटनाओं को आधार बनाकर इनसे सबक लेकर अपनी गलतियां स्वीकार करके पुनः ऐसा न करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ना होगा अन्यथा आत्मनिर्भर भारत व एक बार पुनः विश्व गुरु बनने की राह में ये स्वयंजनित रोडे़ खुद को ही चोटिल करेंगे, यह स्पष्ट है। सत्ता पक्ष और विपक्ष को आपसी मतभेद बातचीत के जरिए दूर करने चाहिएं। दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठकर मतभेद दूर करने होंगे। लोकतंत्र में बातचीत और चर्चा ही मतभेद दूर करने के उत्तम उपाय हैं। दोनों पक्ष अगर ऐसा कर पाए तो जनता में भी अच्छा संदेश जाएगा। विधानसभा की हालिया घटना से जनता को जो मायूसी हुई है, उसे वार्ता के जरिए ही दूर किया जा सकता है। आशा है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से समझेंगे।

अजय पाराशर

लेखक, धर्मशाला से हैं

सुबह की सैर के दौरान मैंने पंडित जॉन अली से पूछा, ‘‘क्या काबुल में सचमुच गधे नहीं होते?’’ तो प्रत्युत्तर में नेता प्रति पक्ष की तरह वह प्रति प्रश्न उछालते हुए बोले, ‘क्या रात में अंधेरा नहीं होता?’ उनके आशय को समझने के बावजूद मैं विशुद्ध भारतीय चरित्र की तरह अपने हाथ-पांव पसारते हुए बोला, ‘‘पंडित जी, बेहतर हो यदि आप मेरे ़खाते में जवाब की सबसिडी डाल दें। पहले, जब सबसिडी लेने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते थे तो हाथ-पांव हिल भी जाते थे। जब से ़खातों में सीधे सबसिडी आने और ऑनलाइन पेमेंट की सुविधा हो गई है; ज़रूरतें, आधी पूरी होने के बावजूद ऐसी हड्डहरामी हो गई है कि सरकार के ऊपर पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए हैं।’’ पंडित जी दहाड़ते हुए बोले, ‘‘आत्मसम्मान भी कोई चीज़ है कि नहीं?’’ मैं बोला, ‘‘पंडित जी, कम से कम आमों को भी अपने सीज़न में पूरा सम्मान मिलता है। आम आदमी तो साल भर चूसे को, की तरह ज़मीन पर गिरा रहता है और पांच साल में तभी फूटता है जब चुनावों का बोर आना शुरू होता है।’’ मेरी बात सुनकर, जॉन अली रुआंसे होकर बोले, ‘‘मियां, कहते तो तुम सही हो। इधर, सारी उम्र सरकारी नौकरी करने के बाद भी पेंशन की कोई आस नहीं और उधर, कलुआ को देखो। एक बार एमएलए होने के बाद काली राम क्या हुए, ताउम्र पेंशन के ह़कदार हो गए।

 ़खैर, तुमने पूछा है कि क्या काबुल में गधे नहीं होते? तुम्हें पूछना चाहिए था कि गधे कहां नहीं होते? हर आदमी पैदा ही गधा होता है और ताउम्र अपनी ़ख्वाहिशों और ज़रूरतों का बोझ ढोते-ढोते तब तक गधा बना रहता है, जब तक उसे अपने गधा होने की ़खबर नहीं हो जाती। आगे बढ़ने से पहले मुझे महात्मा बुद्ध की एक छोटी सी कहानी याद आ रही है। जब महात्मा बुद्ध से किसी ने पूछा कि आत्म साक्षात्कार से उन्हें क्या हासिल हुआ? तो उन्होंने कहा कि हासिल क्या होना था? जो था, वह पहले ही प्राप्त था। बस अपने वास्तविक स्वरूप का पता चल गया। बंधु, आत्म साक्षात्कार और चुनावी साक्षात्कार में इतना ही ़फ़र्क है कि आत्म साक्षात्कार के बाद आदमी अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। जबकि हर पांच साल बाद लोकतंत्र में आयोजित होने वाले चुनावी साक्षात्कार में उसे इतना ही पता चलता है कि अगर वह चाहे तो आदमी हो सकता है।

 लेकिन चूंकि जन्मों से उसे गर्दभ बना रहने में ही आनंद की अनुभूति होती है, वह हर बार चुनावी झांसे में आने के बाद पुनः गर्दभत्व को प्राप्त होना पसंद करता है और पुनः अगले पांच सालों के लिए ऐसे आदमियों को अपनी पीठ सौंप देता है, जो फिर एक बार उसकी सवारी करते हुए अपनी सात पीढि़यों का बोझ उस पर लाद देते हैं। वह जिन प्रतिनिधियों को चुनता है, वे उसे पहनाते तो आश्वासनों का हरा चश्मा हैं लेकिन खिलाते सूखी घास हैं। चूंकि लोकतंत्र संख्या बल से चलता है। ऐसे में अर्ध घोषित गर्दभों के मतदान में शामिल होने से उनकी सवारी आसान हो जाती है। जो मनुष्य गर्दभ नहीं होना चाहते, वे अपने यूटोपिया के मैदान में चरते रहते हुए कहीं दूर निकल जाते हैं और स्वयं को बुद्धिजीवी कहलाने में गर्व महसूस करते हैं। लेकिन उनकी पीठ पर बोझ ढोने के घाव सा़फ नज़र आते हैं। हाल ही में एक देश के गधों के निर्यात से मालामाल होने की ़खबर आई है। इससे साबित होता है कि यत्र तत्र सर्वत्र गर्दभ।’’ पंडित जी इतना कहने के बाद कहीं गहरे खो गए और मैं अपनी पीठ पर बढ़ते भार को प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए हांफने लगा था।