Friday, September 24, 2021 05:56 AM

पंढरपुर का मेला

पंढरपुर की यात्रा आजकल आषाढ़ में तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को होती है। देवशयनी और देवोत्थान एकादशी को वारकरी संप्रदाय के लोग यहां यात्रा करने के लिए आते हैं। यात्रा को ही 'वारी देना कहते हैं। प्रत्येक वर्ष देवशयनी एकादशी के मौके पर पंढरपुर में लाखों लोग भगवान और रुकमणि की महापूजा देखने के लिए एकत्रित होते हैं। कोरोना के चलते हुए सरकार ने इस यात्रा को लेकर कुछ नियम और फैसले लिए हैं। जिसका पालन सभी भक्तों के लिए जरूरी है।

भक्तराज पुंडलिक- 6वीं सदी में संत पुंडलिक हुए, जो माता-पिता के परम भक्त थे। उनके इष्टदेव श्रीकृष्ण थे। उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन श्रीकृष्ण रुकमणि के साथ प्रकट हो गए। तब प्रभु ने उन्हें स्नेह से पुकार कर कहा, 'पुंडलिक हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं। पुंडलिक ने जब उस तरफ देखा और कहा कि मेरे पिताजी शयन कर रहे हैं, इसलिए आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा कीजिए और वे पुन: पैर दबाने में लीन हो गए। भगवान ने अपने भक्त की आज्ञा का पालन किया और कमर पर दोनों हाथ धरकर और पैरों को जोड़कर ईंटों पर खड़े हो गए। ईंट पर खड़े होने के कारण श्री वि_ल के विग्रह रूप में भगवान की लोकप्रियता हो गई। यही स्थान पुंडलिकपुर या अपभ्रंश रूप में पंढरपुर कहलाया, जो महाराष्ट्र का सबसे प्रसिद्ध तीर्थ है। पुंडलिक को वारकरी संप्रदाय का ऐतिहासिक संस्थापक भी माना जाता है, जो भगवान वि_ल की पूजा करते हैं। यहां भक्तराज पुंडलिक का स्मारक बना हुआ है।

पंढरपुर मंदिर - महाराष्ट्र के पंढरपुर में स्थित यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। यहां श्रीकृष्ण को विठोबा कहते हैं। इसीलिए इसे विठोबा मंदिर भी कहा जाता है। यह हिंदू मंदिर विठ्ठल-रुकमणि मंदिर के रूप में जाना जाता है। यह भगवान विठोबा की पूजा का मुख्य केंद्र है, जिनकी पत्नी रखुमई है। यह महाराष्ट्र का सबसे लोकप्रिय मंदिर है। पंढरपुर का विठोबा मंदिर पश्चिमी भारत के दक्षिणी महाराष्ट्र राज्य में भीमा नदी के तट पर शोलापुर नगर के पश्चिम में स्थित है। माना जाता है कि यहां स्थित पवित्र नदी चंद्रभागा में स्नान करने से भक्तों के सभी पापों को धोने की शक्ति होती है।

सभी भक्तों को भगवान विठोबा की मूर्ति के पैर छूने की अनुमति है। इस मंदिर में महिलाओं और पिछड़े वर्गों के लोगों को पुजारी नियुक्त किया गया है। पंढरपुर तीर्थ की स्थापना 11वीं शताब्दी में हुई थी। मुख्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में देवगिरि के यादव शासकों द्वारा कराया गया था। श्री वि_ल मंदिर यहां का मुख्य मंदिर है। मंदिर में प्रवेश करते समय द्वार के समीप भक्त चोखामेला की समाधि है। प्रथम सीढ़ी पर ही नामदेवजी की समाधि है। द्वार के एक ओर अखा भक्ति की मूर्ति है। निज मंदिर के घेरे में ही रुकमणिजी, बलरामजी, सत्यभामा, जांबवती तथा श्रीराधा के मंदिर हैं। पंढरपुर के जो देवी मंदिर प्रसिद्ध हैं, उनमें पद्मावती, अंबाबाई और लखुबाई सबसे प्रसिद्ध हैं। चंद्रभागा के पार श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक है। 3 मील दूर एक गांव में जनाबाई का मंदिर है और वह चक्की है जिसे भगवान ने चलाया था। कहते हैं कि विजयनगर साम्राज्य के प्रसिद्ध नरेश कृष्णदेव विठोबा की मूर्ति को अपने राज्य में ले गए थे, किंतु बाद में एक बार फिर इसे एक महाराष्ट्रीय भक्त वापस ले आया और पुन:यहां स्थापित कर दिया।

मेला और यात्रा -यहां हर वर्ष आषाढ़ी मेला लगता है। लोग दूर-दूर से यात्रा करते हुए यहां आते हैं। भगवान विष्णु के अवतार विठोबा और उनकी पत्नी रुकमणि के सम्मान में इस शहर में वर्ष में 4 बार त्योहार मनाए जाते हैं। इनमें सबसे ज्यादा श्रद्धालु आषाढ़ के महीने में फिर क्रमश: कार्तिक, माघ और श्रावण महीने में एकत्रित होते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये यात्राएं पिछले 800 सालों से लगातार आयोजित की जाती रही हैं। भगवान वि_ल के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से पताका, डिंडी लेकर इस तीर्थस्थल पर लोग पैदल चलकर पहुंचते हैं। इस यात्रा क्रम में कुछ लोग अलंडि में जमा होते हैं और पुणे तथा जजूरी होते हुए पंढरपुर पहुंचते हैं। लोगों में इस यात्रा को लेकर बहुत उत्साह और श्रद्धा होती है।