Friday, September 24, 2021 09:35 AM

किसान ‘गाली’ नहीं हैं

भारत सरकार आंदोलनकारी किसानों से बातचीत करे या न करे, उनकी मांगों पर सहमति जताए अथवा उन्हें खारिज कर दे, लंबे समय तक किसानों को धरने पर बिठाए रखकर थका दे अथवा मानसिक तौर पर प्रताडि़त करे, लेकिन किसी भी सूरत में सरकार का बड़ा या छोटा मंत्री किसानों को गाली नहीं दे सकता। अपशब्द असंसदीय हैं और आंदोलन करने के संवैधानिक अधिकार को भी कोसते हैं। यह बात दोनों पक्षों पर लागू होती है, क्योंकि गाली देना वैचारिक और आचरण के स्तर पर भदेसपन का प्रतीक है। किसान नेता टिकैत द्वारा ‘लट्ठ बजांगे’ कहना और किसानों की महिला प्रतिनिधियों द्वारा ‘मर जा मोदी’ कहकर प्रधानमंत्री के पुतले जलाना भी घोर आपत्तिजनक है। बहरहाल गाली देकर सफाई देना और तोड़-मरोड़ कर बयान पेश करने के आरोप और भी असभ्य हैं। प्रधानमंत्री मोदी किसानों को बार-बार ‘अन्नदाता’ कहते रहे हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी उन्हें ‘भगवान’ मानते रहे हैं। इन अतिशयोक्ति शब्दों पर हमारी असहमति है, लेकिन हाल ही में विदेश राज्यमंत्री बनीं मीनाक्षी लेखी ने आंदोलनकारी किसानों को ‘मवाली’ और षड्यंत्रकारी कहा है। उन्होंने यह बयान संसद के परिसर में टीवी चैनलों के प्रतिनिधियों से संवाद के दौरान दिया। दुनिया ने उसे सुना और देखा होगा! राज्यमंत्री ने किसान आंदोलन का एजेंडा ‘राजनीतिक’ करार दिया।

 आश्चर्य है कि उसी संसदीय परिसर में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों के साथ बातचीत शुरू करने की पेशकश की और दूसरी तरफ प्रदर्शनकारी किसानों को ‘मवाली’ कहा गया। यदि भारत सरकार के नुमांइदे की भाषा यही है, तो दिल्ली पुलिस ने संसद भवन से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी, जंतर-मंतर पर, मेहमानों की तरह किसान-संसद के आयोजन की अनुमति क्यों और कैसे दी? यदि कोई मवाली है, तो उसकी जगह जेल में है। यदि किसान किसी भी आचरण के मद्देनजर मवाली हैं, तो उन पर अपराध की धाराएं चस्पा कर मुकदमा चलाना चाहिए। उनके साथ संवाद का औचित्य ही क्या है? दरअसल ऐसी भाषा नफरत का भाव बयां करती है और मंत्री या नेता नफरत पाल कर राजनीति नहीं कर सकते। बेशक बीते 8 माह से किसान आंदोलन जारी है। राजधानी दिल्ली की तीन सीमाओं पर किसान अड़े और डटे हुए हैं। उनकी कुछ मांगों, खासकर तीन कानून रद्द करने की जिद, से किसी की भी असहमति हो सकती है। सीमाओं से उठकर किसान संसद के पड़ोस में आ गए हैं। वे संसद के मॉनसून सत्र तक अपनी समानांतर और सांकेतिक किसान-संसद का आयोजन करते रहेंगे। पहले ही दिन किसान-संसद ने तीनों विवादास्पद कानूनों को खारिज करने का निर्णय लिया है। बेशक उस फैसले की संवैधानिक वैधता नहीं है, लेकिन राजनीतिक और सामयिक संदेश दूर तलक जाएंगे। यदि किसान भी राजनीति में शिरकत करते हैं, तो वह असंवैधानिक हरकत नहीं है। आंदोलन बहुआयामी और बहुअर्थी हो सकता है। वे अब उप्र, उत्तराखंड और पंजाब के विधानसभा चुनावों में भाजपा का विरोध कर सकते हैं। यह उनका मौलिक अधिकार है। इन तमाम गतिविधियों के मद्देनजर उन्हें ‘मवाली’ करार नहीं दिया जा सकता।

 देश की अर्थव्यवस्था में किसानों का बहुत बड़ा योगदान है। जीडीपी में 17 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। करीब 50 फीसदी कार्यबल कृषि और उससे जुड़े पेशे में कार्यरत है। किसान परिवार 9 करोड़ से ज्यादा हैं। उनमें करीब 52 फीसदी, अर्थात 4.69 करोड़, कर्ज़दार हैं। प्रत्येक परिवार पर औसतन 47,000 रुपए का कर्ज़ है। आज भी किसान की औसत माहवार आमदनी 7-8 हजार रुपए है। सहज सवाल है कि 2022 में किसान की आय दुगुनी करने का वायदा मोदी सरकार कैसे पूरा करेगी? सवाल यह भी है कि ‘मवाली’ कह देने या किसान-संसद आयोजित करने से सरकार और किसानों के बीच का गतिरोध क्या समाप्त होगा? दोनों पक्षों को अपनी-अपनी जिद छोड़ कर संवाद करना होगा। दुनिया के तमाम बड़े, उलझे हुए मसले बातचीत की मेज पर ही हल हुए हैं। कमोबेश ऐसे मुद्दे पर बातचीत शुरू की जाए, तो बेहद महत्त्वपूर्ण भी हो और उसका समाधान भी पेचीदा न हो। वह न्यूनतम समर्थन मूल्य का विषय हो सकता है। तीन विवादास्पद कानूनों पर तो सर्वोच्च न्यायालय ने 12 जनवरी, 2021 से रोक लगा रखी है, लिहाजा मंडियों और अन्य विषयों पर भी बिंदुवार संवाद संभव है। यह सरकार किसानों की भी है। देश के ज्यादातर किसान आराम से खेती कर रहे हैं। उन्हें इन कानूनों पर कोई आपत्ति नहीं। पंजाब, हरियाणा और उप्र के भी सभी किसान एकमत नहीं हैं। किसान इन गतिरोधों को समझें और ‘मवाली’ शब्द की गांठ न बांध लें। अलबत्ता समस्या और भी उलझ जाएगी।