Saturday, January 23, 2021 07:03 PM

गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे सरकार: प्रताप सिंह पटियाल, लेखक बिलासपुर से हैं

गौधन के बिना प्राकृतिक कृषि का समीकरण अधूरा रहेगा। यदि देश में सिंथेटिक दूध यानी सफेद दूध के काले कारोबार पर लगाम लगानी है या रासायनिक खादों व कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके वीरानगी की जद में जा चुके कृषि क्षेत्र की उर्वरा ताकत बढ़ाकर उसे प्राकृतिक खाद्यान्न उत्पादन से आबाद करके किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है तो सरकारों को स्वदेशी गौपालन व्यवसाय को प्राथमिकता देने वाली योजनाओं पर पूरी शिद्दत से फोकस करना होगा…

पुरातन काल से ही गाय भारतीय संस्कृति में एक मुकद्दस प्राणी तथा कृषि, आस्था और अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ रहा है। भारत में हजारों वर्षों से हलधर भगवान बलराम को कृषक समाज तथा श्री कृष्ण को गौपालन का अराध्य देव माना जाता है। अनादिकाल से भारतीय संस्कृति में गाय के सम्मान में ‘गोवत्स द्वादशी’, ‘गोवर्धन पूजा’, ‘बहुला चौथ पूजा’, ‘गोत्रि रात्र व्रत’ तथा ‘गोपाष्टमी’ जैसे पावन पर्व मनाए जाते हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथों के अनुसार द्वापरयुग में कार्तिक मास की शुक्लपक्ष की अष्टमी के दिन श्री कृष्ण ने अपने बाल्यकाल से गौचारण कार्य प्रारंभ किया था जिसका शुभ मुहूर्त ‘शांडिल्य ऋषि’ ने निकाला था। तब से ‘गोपाष्टमी पर्व’ मनाने की परंपरा चलती आ रही है। हमारा पड़ोसी देश नेपाल गाय को अपना राष्ट्रीय पशु घोषित कर चुका है तथा वहां के ‘गाई तिहार’ का संबंध भी गौपूजन से ही है। श्री कृष्ण का गोपालक रूप गोवंश की महता तथा प्राचीन भारत की समृद्धि व विकास को खूब दर्शाता है।

उस दौर में भारतवर्ष का समूचा कृषक समाज गौपालक था तथा गौवंश हर गांव व घर की शान हुआ करता था। भारत में श्री कृष्ण ने जहां गोपालन का आदर्श स्थापित किया, वहीं महर्षि वशिष्ठ को गाय के कुल के विस्तार का श्रेय जाता है। ‘महर्षि जमदग्नि’ तथा जैसलमेर के राजपूत योद्धा ‘डूंगर सिंह भाटी’ व ‘अमर सिंह राठौर’ ने गौरक्षा के लिए ही अपना बलिदान दिया था। देश में 1857 के संग्राम की चिंगारी, 1872 की कूका बगावत, 1893 में मऊ में विद्रोह व 7 नवंबर 1966 को करपात्री जी के नेतृत्व में देश की राजधानी में प्रचंड आंदोलन तथा अप्रैल 1979 में विनोबा भावे का अनशन, इन सब आंदोलनों के पीछे का मुद्दा गौरक्षा ही था। इससे पूर्व महर्षि दयानंद सरस्वती ने 1879 में रेवाड़ी में गोशाला की स्थापना की थी तथा 1882 में गोरक्षिणी सभा का गठन भी किया था। ये तमाम संघर्ष तस्दीक करते हैं कि भारतीय सनातन संस्कृति से लेकर देश के अर्थतंत्र को मजबूत करने में गोवंश का किरदार कितना सुजात व दमदार रहा है।

 मगर अंग्रेज हुकूमत के दौर से गौवंश पर अत्याचार का सिलसिला शुरू हुआ जो बदस्तूर जारी है। देश में विदेशी गौवंश का आयात हुआ, कृत्रिम गर्भाधान से विदेशी मूल के टीकों से स्वदेशी गौधन का स्वरूप बिगड़ा, श्वेत क्रांति के नाम पर दूध वृद्धि के लिए प्रचुर मात्रा में दुग्ध उत्पादन वाली भारतीय शुद्ध देशी नस्ल की गऊओं का संकरीकरण हुआ, पशुधन के नाम की गौचर भूमि पर विकास का पहिया चला तथा हजारों एकड़ चरांद भूमि को अतिक्रमण जज्ब कर गया जिससे चरागाह व्यवस्था गायब हुई। जंगलों में चीड़ के पेड़ों की भारी तादाद ने वनों से पशुचारा रुखसत कर दिया। इसके अलावा मुफ्तखोरी की कुछ सियासी नीतियों तथा आधुनिकता की चकाचौंध में युवावर्ग के  पशुपालन से मोहभंग ने गोवंश को लावारिस करके सड़कों पर पहुंचा दिया। यदि आज बेसहारा गोवंश फसलों को उजाड़ कर किसानों की परेशानी का सबब बना है तो इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने क्रोध का इजहार कर रहे गोवंश के लावारिस होने के कारणों पर मंथन होना चाहिए तथा देश के कृषि अर्थशास्त्र का अध्याय लिखने में भूमिका निभाने वाले बेजुबान गौवंश के हकूक पर सियासी रायशुमारी की जरूरत है।

 आजादी के कुछ दशक पूर्व तक देश में स्वदेशी गौधन की सत्तर से अधिक प्रजातियां करोड़ों की संख्या में मौजूद थीं, जो वर्तमान में तीस के लगभग शेष बची हैं। अतीत से अपनी दुग्ध गुणवत्ता का विश्व पटल पर लोहा मनवा चुके भारतीय गौरव का प्रतीक देशी गोवंश ब्राजील, मैक्सिको व दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में पशुपालकों की पहली पसंद है। हमारे स्वदेशी गौधन से प्राप्त गौमूत्र, गोबर तथा दुग्ध पदार्थों की गुणवत्ता के पैमानों पर ‘जेम्स मार्टिन’ जैसे अमरीकी वैज्ञानिक सफलतम शोध कर चुके हैं। आयुर्वेद में औषधीय गुणों वाले जिस ‘पंचगव्य’ का जिक्र है, यह देशी गाय के प्रदत पदार्थों से ही प्राप्त होता है। इसलिए वैदिक काल से हमारे मनीषियों द्वारा सनातन संस्कृति में लक्ष्मीस्वरूप गाय को दिया गया माता का दर्जा उन्नत व सकारात्मक सोच का परिचायक है। भारत में गौपालन आस्था का प्रतीक रहा है तथा आस्था का सीधा संबंध भावनाओं से जुड़ा होता है। देश में पशुओं पर अत्याचार रोकने के लिए पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 तथा गोवंशीय पशु अधिनियम 1995 का मकसद गौरक्षा से ही जुड़ा है। पशुपालन व्यवसाय के विकास तथा दुधारू पशु संरक्षण व गौहत्या को रोकने के लिए देश में 2019 से ‘राष्ट्रीय कामधेनू आयोग’ भी स्थापित हुआ है।

हिमाचल प्रदेश में गोवंश संरक्षण व संवर्धन अधिनियम 2018 लागू है तथा देशी गौसंरक्षण व सुरक्षा के लिए गौजात्या प्रजनन विधेयक 2019 भी वजूद में आ चुका है, लेकिन राज्य में गोवंश आश्रय के लिए बनाई गई तमाम योजनाएं धरातल पर धराशायी हुईं। एक तरफ  राज्य को प्राकृतिक कृषि मॉडल बनाने की कवायद जारी है, वहीं कृषि की बुनियाद अमूल्य गौधन का हुजूम हजारों की संख्या में बेआबरू होकर सड़कों की धूल फांक कर आशियाना तलाश रहा है। दशकों से संवेदनशील मुद्दा बने गोवंश की रक्षा कानून या सियासी तकरीरों से नहीं होगी। गौ संरक्षण का एकमात्र उपाय है कि गोपालन व्यवसाय को फिर से जीवनशैली का हिस्सा बनाना पडे़गा। गौधन के बिना प्राकृतिक कृषि का समीकरण अधूरा रहेगा।

 यदि देश में सिंथेटिक दूध यानी सफेद दूध के काले कारोबार पर लगाम लगानी है या रासायनिक खादों व कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके वीरानगी की जद में जा चुके कृषि क्षेत्र की उर्वरा ताकत बढ़ाकर उसे प्राकृतिक खाद्यान्न उत्पादन से आबाद करके किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है तो सरकारों को स्वदेशी गौपालन व्यवसाय को प्राथमिकता देने वाली योजनाओं पर पूरी शिद्दत से फोकस करना होगा, ताकि पशुपालकों की पुश्तैनी गौशालाएं ही गोवंश का बसेरा बनें। समस्त भारतवर्ष अपनी धरोहर गौधन के योगदान का ऋणी रहेगा। अतः गौपालन की तरफ ध्यान आकृष्ट कराने वाले महोत्सव ‘गोपाष्टमी’ के शुभ अवसर पर हुकूमतों को गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने पर विचार करना होगा। यही वर्तमान की महती जरूरत है।

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