गीता रहस्य

स्वामी  रामस्वरूप

यह स्पष्ट ही है कि सत्य से भटका हुआ प्राणी इस जन्म में पशु-पक्षी आदि की योनियों में आकर घोर दुःखों को भोगता है। इन्हीं मंत्रों के भाव को श्रीकृष्ण महाराज जी यहां कह रहे हैं कि हे अर्जुन! जो मेरा भक्त मेरी सेवा, श्रद्धा और आज्ञा का पालन करता है, वह शीघ्र ही ‘धर्मात्मा’ हो जाता है, उसे ही परमशक्ति प्राप्त होती है, अन्य को नहीं…

गतांक से आगे…

अतः यह तो सिद्ध है कि त्रिगुणी माया में फंसा प्रत्येक मनुष्य सत्य की खोज में अग्रसर नहीं हो पाता। यही कारण है कि आज भक्ति तो घर-घर में दिखाई पड़ती है परंतु श्रीकृष्ण महाराज द्वारा ऊपर के श्लोकों में कहे भक्तों में दो गुण साधु स्वभाव एवं धर्मात्मा बनना, ये बिरला ही कहीं दिखाई देगा। और तो और कई भक्ति करने वाले साधु संत ही आज दुराचार के कारण अखबारों में बदनाम हैं। इस विषय में ऋग्वेद मंत्र 1/44/5 एवं 6 दोनों पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है। मंत्र 5 में कहा अमृत अविनाशी स्वरूप परमात्मा भोजन, जो हमारा पालन-पोषण करता है, निराकार है, सबका रक्षक है, ऐसे परमेश्वर को छोड़कर जब हम ईश्वरीय वाणी जो वेद हैं, उसके विरुद्ध हो जाते हैं, तो कदापि सुख प्राप्त नहीं करते। दूसरा मंत्र 6 में कहा ‘यविष्ठय’ जाक अत्यंत बलवान, ‘नमस्य’ पूजने योग्य विद्वान हैं,‘प्रस्कण्वस्य’ उत्तम, मेधावी विद्वान/ योगेश्वर हैं, जो ‘आयुः’ हमारे जीवन को ‘प्रतिरन’ उत्तम शिक्षा देकर दुःखों से पार करते हैं, वह ‘दैव्यम जन्म’ विद्वानों में उत्पन्न हुए मनुष्य की रक्षा करते हैं।

इससे व सेवा, सत्कार के योग्य हैं। अगले मंत्र 7 का भाव है कि ऐसे वेद-विद्या के ज्ञाता, विद्वानों की सहायता के बिना कोई भी दिव्य-गुणों को अथवा सुख को अथवा शत्रुओं पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। अतः ऐसे विद्वानों की सेवा करें। इन मंत्रों का भाव है कि जो वेद विद्या के ज्ञाता योगेश्वर की सेवा करता है, उनसे विद्या प्राप्त करता है और इसके अतिरिक्त वेद विरुद्ध व्यक्तियों से दूर ही रहता है तो एक दिन वह जिज्ञासु ही ‘साधु’ अथवा ‘धर्मात्मा’ कहलाने योग्य हो जाता है। श्रीकृष्ण महाराज श्लोक 9/31 में कह रहे हैं कि हे अर्जुन! ऐसे सेवा भाव रखने वाले मेरे भक्त का कभी भी नाश नहीं होता अर्थात वह पुर्नजन्म पाकर दुःखों के सागर में गोते नहीं लगाता। यह स्पष्ट ही है कि सत्य से भटका हुआ प्राणी इस जन्म में पशु-पक्षी आदि की योनियों में आकर घोर दुःखों को भोगता है।

इन्हीं मंत्रों के भाव को श्रीकृष्ण महाराज जी यहां कह रहे हैं कि हे अर्जुन! जो मेरा भक्त मेरी सेवा, श्रद्धा और आज्ञा का पालन करता है, वह शीघ्र ही ‘धर्मात्मा’ हो जाता है, उसे ही परमशक्ति प्राप्त होती है, अन्य को नहीं। यह जगत विदित है कि श्रीकृष्ण महाराज पांच हजार तीन सौ वर्ष पहले वेद एवं योग विद्या में पारंगत हुए हैं और उन्होेंने आज के मजहबों के अनुसार भक्ति नहीं की थी। क्योंकि आज के मजहब उस समय उदय नहीं हुए थे। अतः हमें गीता के श्लोकों का अर्थ एवं भाव आज से पांच हजार तीन सौ वर्ष पहले वैदिक काल के वातावरण के अनुसार ही करना होगा।

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