Saturday, September 26, 2020 03:32 PM

गीता रहस्य

स्वामी  रामस्वरूप

श्रीकृष्ण महाराज ने श्लोक 9/32 में प्रत्येक वर्ण एवं स्त्री आदि को विद्वानों की शरण में जाकर वैदिक शुभ कर्म करते हुए सुखी जीवन व्यतीत करने सहित मोक्ष सुख को प्राप्त करने का वैदिक उपदेश दिया है। वेद-शास्त्र, उपनिषद, भगवदगीता, मनुस्मृति आदि किसी भी सद्ग्रंथ में जातिवाद का नामों निशान भी नहीं है…

गतांक से आगे…

श्लोक 9/32 में श्रीकृष्ण महाराज अर्जुन से कह रहे हैं कि क्योंकि हे पृथा पुत्र अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शूद्र और पाप योनि वाले अर्थात पाप-युक्त जन्म लेने वाले भी जो वे हैं, वे भी मेरी शरण में आकर परम गति को प्राप्त होते हैं। भाव- श्रीकृष्ण महाराज ने श्लोक 9/32 में प्रत्येक वर्ण एवं स्त्री आदि को विद्वानों की शरण में जाकर वैदिक शुभ कर्म करते हुए सुखी जीवन व्यतीत करने सहित मोक्ष सुख को प्राप्त करने का वैदिक उपदेश दिया है। वेद-शास्त्र, उपनिषद, भगवदगीता, मनुस्मृति आदि किसी भी सद्ग्रंथ में जातिवाद का नामों निशान भी नहीं है।

 स्वयं के बनाए जातिवाद ने देश को अत्यधिक हानि पहुंचाई है। हम वेदों के अध्ययन द्वारा इस रोग का नाश करें। उदाहरणार्थ- यजुर्वेद मंत्र 31/11 का भाव है कि जो मनुष्य वेद एवं ईश्वर का ज्ञाता है, इंद्रियों को संयम में रखकर शुभ कर्म करने वाला, धर्म पर चलने वाला, पुरुषार्थी एवं उत्तम गुणों की खान है उसे ही ईश्वर ने ‘ ब्राह्मण’ का पद दिया है। जो गुणवान भुजाओं से बलयुक्त कार्य करने, धर्म और देश की रक्षा करने आदि गुणों को धारण करने वाला है, उसे ‘क्षत्रिय’ कहा है और खेती, व्यापार, पशु-पालन आदि कर्मों को सिद्ध करने वाला और जहां कहीं भी व्यापार आदि के लिए यात्रा करने में कुशल है वह इन गुणों के कारण ‘वैश्य’ कहलाता है और जो भी विद्या न पढ़ने वाला, मूर्खता आदि अवगुणों से युक्त हो, वह शूद्र वर्ण में आता है। अतः वर्ण का निर्धारण जन्म से नहीं होता अपितु गुण एवं कर्मों के अनुसार होता है। इसी प्रकार वेदों में सब स्त्रियों को वेद सुनने, पढ़ने, योगाभ्यास करने एवं भक्ति आदि करने का अधिकार दिया गया है।

अथर्ववेद 11/5/18 में कहा ‘ब्रह्मचर्येण कन्या युवानम् विंदते पतिम’ अर्थात कन्या ब्रह्मचर्य आदि गुणों को धारण करके वेद शास्त्रों आदि का ज्ञान प्राप्त करके पूर्ण विद्या और उत्तम शिक्षा को प्राप्त कर अपने समान युवा विद्वान पुरुष को प्राप्त होए। यजुर्वेद मंत्र 26/2 में परमेश्वर कहता है कि हे मनुष्य (यथा) जैसे मैं(जनेभ्यः) सब मनुष्यों अर्थात सब नर-नारी के लिए (इमाम) इस (कल्याणीय) कल्याण करने वाली(वाचम) चारों वेदों की वाणी का (आवदानि) उपदेश करता हूं, वैसा तुम भी करो। इन सब वेद मंत्रों से सिद्ध है कि स्त्री को भी पूर्ण रूप से भक्ति करने का अधिकार है और पिछले तीनों युगों में इस अधिकार का उपयोग किया गया था। फलस्वरूप ही बाल-ब्रह्मचारिणी, गार्गी, जनक की प्रधानचार्या थीं और इसी प्रकार सभी विदुषी नारियां पूजनीय हुई है। आज वेदाध्ययन में आई कमी के कारण मनुष्य ने नारी एवं शूद्रों पर अत्याचार करने के लिए अपने स्वयं के नियम बना लिए हैं।

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