गीता रहस्य

स्वामी  रामस्वरूप

जिस प्रकार बीमार को ही वैद्य की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अनादिकाल से चले आ रहे वैदिक ज्ञान से भटके हुए अज्ञान युक्त प्राणियों को ही विद्वान आचार्य की आवश्यकता होती है। यहां अर्जुन धर्मयुद्ध के रहस्य को वैदिक आधार पर समझने में विफल हो गए हैं। अर्जुन भाग्यशाली है कि  योगेश्वर श्रीकृष्ण महाराज जैसे दिव्य पुरुष उन्हें ज्ञान देने के लिए सुलभ हुए हैं…

श्लोक 9/30 में श्री कृष्ण महाराज अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन! यदि अत्यंत दुराचारी भी अनन्यभाव से भक्ति करने वाला जो मुझको भजता है, वह साधक साधु ही मानने योग्य है। क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।

भाव- वेद में ‘साधु’ शब्द के कई अर्थ हैं। परंतु श्लोक 9/30 में ऋग्वेद मंत्र 8/77/11 के अनुसार ‘साधु’ शब्द का अर्थ उत्तम प्रकार का साधक है। साधु सदा दूसरों  के दुःखों को हरने एवं उपकार करने वाला होता है। ‘अनन्यभाक्’ पद का अर्थ है वो किसी अन्य की भक्ति करने वाला न हो। श्रीकृष्ण महाराज का यहां भाव है कि जो कुछ श्रीकृष्ण महाराज परंपरागत वैदिक ज्ञान देते हैं, साधक केवल उसी ज्ञान को ग्रहण करे (यदि) किसी अन्य आचार्य से ज्ञान लेना भी हो, तो केवल श्री कृष्ण महाराज की तरह वैसे का वैसे ही वैदिक ज्ञान देने वाला आचार्य हो)। कर्म के विषय में श्रीकृष्ण महाराज ने श्लोक 3/15 में वेद ईश्वर से उत्पन्न और सभी शुभ कर्म वेदों से उत्पन्न कहे हैं और वेदों के आधार पर ही श्रीकृष्ण महाराज जी अर्जुन को धर्मयुद्ध रूपी युद्ध कर्म का ज्ञान दे रहे हैं। स्तुति के विषय में भी श्रीकृष्ण महाराज ने वेदों के अनुसार ही निराकार, ज्योतिस्वरूप ब्रह्म की स्तुति का ज्ञान दिया है और सभी ज्ञान प्राप्ति का स्थल वेद एवं योग विद्या के ज्ञाता,विद्वान का संग एवं यज्ञ करना कहा है। यह सभी वैदिक आदेश हैं। ऐसे ही वेद एवं योग-विद्या के ज्ञाता श्रीकृष्ण महाराज जो एक दिव्य पुरुष हैं, वह अर्जुन को ज्ञान दे रहे हैं जिसे आज हम वर्तमान के वेद एवं योग विद्या के ज्ञाता आचार्य से सुनकर दुःखों से छूटकर भवसागर पार कर सकते हैं। यह तो स्पष्ट ही है कि वेद ईश्वरीय वाणी है, इसे यदि कोइ दुराचारी पुरुष भी सुन लेगा, तो वह एक दिन अवश्य ही साधु हो जाएगा। उसके जीवन में परिर्वतन आ जाएगा। वस्तुतः जन्मों के कारण प्रथम लगभग सभी मनुष्य गुरु ज्ञान के अभाव में अज्ञानी ही होते हैं और अधिकतर पापयुक्त कर्म ही अनजाने में करते हैं। क्योंकि जन्म लेते ही श्रीराम, श्रीकृष्ण, सीता, मदालसा, व्यासमुनि जी की भांति किसी को भी बाल्यकाल में वेद एवं योग विद्या का ज्ञाता आचार्य सुलभ नहीं हो पाता। जिस प्रकार बीमार को ही वैद्य की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अनादिकाल से चले आ रहे वैदिक ज्ञान से भटके हुए अज्ञान युक्त प्राणियों को ही विद्वान आचार्य की आवश्यकता होती है। यहां अर्जुन धर्मयुद्ध के रहस्य को वैदिक आधार पर समझने में विफल हो गए हैं। अर्जुन भाग्यशाली है कि  योगेश्वर श्रीकृष्ण महाराज जैसे दिव्य पुरुष उन्हें ज्ञान देने के लिए सुलभ हुए हैं। अतः श्रीकृष्ण महाराज कह रहे हैं कि हे अर्जुन पथभ्रष्ट कोई दुराचारी, पापी पुरुष भी एक मात्र केवल मेरी ही शरण मे आकर मेरी भक्ति करता है।

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