Saturday, September 26, 2020 12:55 PM

घर में आयुर्वेद

– डा. जगीर सिंह पठानिया

सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक,

आयुर्वेद, बनखंडी

वृद्धावस्था में स्वास्थ्य समस्याएं

भारतीय प्राचीन संस्कृति अपने प्रगाढ़ पारिवारिक संबंधों के लिए जानी जाती है। इस संस्कृति में वृद्धावस्था को सम्मान के साथ अपनाया जाता है, लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में एक और जहां जनसंख्या वृद्धि में नियंत्रण लाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर चिकित्सीय सुविधा व संतुलित आहार विहार की वजह से व्यक्ति की औसत आयु बढ़ रही है तथा वरिष्ठ नागरिकों को अपनी संतान व अन्य समाज द्वारा उपेक्षित व तिरस्कृत किया जा रहा है।

 आयुर्वेद मतानुसार वृद्धावस्था को जरा कहा गया है तथा इस अवस्था में जो रोग पैदा होते हैं, उन्हें जरा रोग कहा जाता है। आयु व अवस्था के अनुसार हमारे शरीर के विभिन्न संस्थानों व अंगों में बदलाव आना शुरू हो जाता है तथा विभिन्न बीमारियां शरीर को घेरना शुरू कर देती हैं। आयु के अनुसार शरीर के विभिन्न संस्थानों में निम्न बदलाव आते हैं।

नाड़ी संस्थान

इस की वजह से हमारी याददाश्त में कमी आना शुरू हो जाती है, देखने और सुनने की शक्ति में भी कमी आना शुरू हो जाता है तथा चलने में भी फर्क पड़ना शुरू हो जाता है।

श्वसन संस्थान

फेफड़ों में लचीलापन कम हो जाता है तथा शरीर को आक्सीजन का आदान-प्रदान ठीक नहीं हो पाता, परिणाम स्वरूप कास तथा श्वास हो जाता है तथा शरीर में संक्रमण ज्यादा हो जाता है।

रक्तवह संस्थान

हृदय को उसकी धमनियों द्वारा पूरा रक्त नहीं मिल पाता तथा हृत मांस पेशी के आरोग्य हो जाने के कारण कई प्रकार के हृदय रोग होने का भय हो जाता है।

पाचन संस्थान

पाचन संस्थान के अंगों में शिथिलता आना शुरू हो जाती है तथा गतिशीलता कम हो जाती है। जिसकी वजह से पाचन क्रिया में विकृति आना शुरू हो जाती है, परिणाम स्वरूप जीर्ण कब्ज, अम्लपित, भोजन का न पचना शुरू हो जाता है।

मूत्रवह संस्थान

गुर्दे में विकार आना शुरू हो जाता है, पेशाब का बनना कम हो जाता है, क्रिएटिनिन, ब्लड यूरिया व यूरिक एसिड बनना शुरू हो जाता है। इसके अतिरिक्त हमारे शरीर में विद्यमान विभिन्न ग्रंथियों के स्राव या होर्मोंस में न्यूनाधिकता हो जाती है। परिणाम स्वरूप इन्सुलिन की कमी से डायबिटीज व अन्य ग्रंथि रोग होना भी शुरू हो जाते हैं।

कुछ औषधियों का रसायन रूप में प्रयोग करने से रोगों व विकृतियों से बचा जा सकता है। बला व अश्वगंधा का प्रयोग शरीर के ऊतकों व अंगों को शक्ति पहुंचाता है। पिप्पली व मग खास श्वास रोगों में प्रयोग की जा सकती है । लहसुन पेट व ऊतकों के एंजाइम में वृद्धि करता है। ब्राह्मी वचा, शंखपुष्पी व मंडूकपर्णी को याददाश्त बढ़ाने व दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए प्रयोग किया जाता है। गुग्गुल हमारे पेट व रक्त में आमपाचन को ठीक करता है।  आमलकी व गुडुची के लगातार सेवन से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

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