Tuesday, November 30, 2021 08:57 AM

एक साल के लिए जुदा हुए देवी-देवता

दशहरा उत्सव की परंपरा निभाने के बाद देवालय रवाना, 285 देवी-देवताओं के आगमन से आकर्षण बना रहा उत्सव

मोहर सिंह पुजारी — कुल्लू अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव का सातवें दिन देवभूमि कुल्लू के देवा-देवता भगवान रघुनाथ से एक वर्ष के लिए जुदा हो गए। जब ढालपुर से देवी-देवताओं की विदाई हुई तो हर कोई भावुक हो उठा। वहीं, अब अगले वर्ष ढालपुर में देवी-देवताओं का मिलन होगा और श्रद्धालुओं को भी अगले वर्ष ही सभी देवी-देवताओं के एक साथ दर्शन करने को मिलेंगे। 285 देवी-देवताओं के आगमन से देव समागम कुल्लू आर्षण का केंद्र बना रहा।

गुरुवार सुबह पूजा-अर्चना के बाद से कई देवी-देवताओं का देवालय लौटने का क्रम शुरू हुआ। धीरे-धीरे जब देवी-देवता अपने अस्थायी शिविर से निकलते गए तो मैदान खाली होते गए, जिससे एकदम से सन्नाटा पसरा। हालांकि कई देवी-देवता लंका दहन में शरीक होने के बाद अपने देवालय की ओर रवाना हुए। सात दिनों तक ऐतिहासिक ढालपुर में मैदान देवी-देवताओं की स्वर लहरियां गूंजीं। वहीं, पूजा-आरती के दौरान देव धड़च से निकला गूगल, बेंठर धूप की महक ने देवभूमि के लिए सुख-शांति छोड़ी। कारकूनों के मुताबिक सात दिनों में एक साथ बजी देवधुनें भी कई रोगों को भगा गई हैं, जब सात दिनों में अस्थायी शिविरों को हटाने में देवलु जुट गए तो वे खुद भी काफी भावुक हुए। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में जहां देवी-देवताओं का भव्य देवमिलन सात दिन होता है। वहीं, देवी-देवता अंतिम दिन भगवान रघुनाथ जी से शक्तियां अर्जित कर देवालय रवाना होते हैं। दशहरा उत्सव समिति के रजिस्टर में इस बार 285 देवी-देवताओं का पंजीकरण हुआ है, जिसमें 157 गैर माफीदार और 124 माफीदार देवता शामिल हुए है। 20 नए देवी-देवता ऐसे भी हैं, जिन्हें उत्सव समिति की ओर से निमंत्रण ही नहीं मिला था। यही नहीं, शिमला जिला के डोडरा क्वार से भी इस बार दशहरा उत्सव के इतिहास में पहली बार चामुंडा माता पहुंची। बता दें कि देवी-देवताओं के आगमन से अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव खास बना। लोग इस बार नजदीकी से देव परंपपराओं से रू-ब-रू हुए। अस्थायी शिविर में लगा रहा श्रद्धालुओं का तांता

बता दें कि गुरुवार को ढालपुर में मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा भगवान रघुनाथ के सुल्तानपुर अपने मंदिर पहुंचते ही संपन्न हो गया। इससे पहले ढालपुर स्थित अपने अस्थायी शिविर से लेकर पशु मैदान तक रथयात्रा निकाली गई और लंकाबेकर में देवकारज पूरा करने के बाद देवी-देवता और रथ ढालपुर के लिए वापस लाए गए। उसके बाद रघुनाथ अपने देवालय सुल्तानपुर पहुंचे और अन्य देवता-देवता अपने अपने देवालयों की ओर रवाना हुए।

उत्सव में पहुंचे देवी-देवता सात दिनों तक अपने हारियानों के साथ रहे और अब उत्सव संपन्न होने के बाद देवी-देवता एक साल भर के लिए से बिछड़ गए हैं। बता दें कि सात दिनों तक देवी-देवताओं के अस्थायी शिविरों ने दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। वहीं, देव धूनों से पूरा कुल्लू शहर गूंजता रहा। बहरहाल, ठारा करडू की सौह में अब अगले वर्ष ही देवी-देवताओं के दर्शन होंगे।