Monday, September 28, 2020 09:44 PM

गोकुल ग्राम तक हिमाचल

केंद्रीय योजनाओं के फलक पर दस्तक देते हुए हिमाचल ने गोकुल ग्राम के सपने को पूरा करने का संकल्प लिया है। ऊना के थानाकलां में प्रदेश में अपनी तरह की यह परियोजना देशी नस्ल की गउओं को फिर से दूध उत्पादन व इसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहेगी। गउओं के आवारा होते झुंड में से यह चुनना अति कठिन हो चुका है कि दूध उत्पादन को व्यावसायिक ढंग से कैसे पुनर्स्थापित किया जाए। जिस प्रदेश में पशुधन से हर घर और खेत की शान का पता चलता था,वहां पचास हजार के करीब दुग्ध पशुओं का आवारा होकर घूमना अब सामाजिक व आर्थिक विषमताओं सरीखा है।

पशुधन के आंकड़ों में कभी ग्रामीण आर्थिकी का पता चलता था या यूं कहें कि 2012 तक हिमाचल की आबादी के साथ-साथ करीब साढ़े अड़तालीस लाख पशुओं की शुमारी अब तेजी से अपना आधार खो रही है। प्रदेश में कुल पशुधन में से करीब आधी संख्या गोवंश की रही है, तो गोकुल ग्राम के माध्यम से पशुपालन की परंपराओं से निकली रेड सिंघी, साहीवाल तथा थारपारकर जैसी नस्लों में सुधार तथा प्रसार की संभावना बढ़ जाती है। यह दीगर है कि इससे पहले भी पशुपालन विभाग की तरफ से कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परियोजनाएं चलीं,लेकिन आज की स्थिति में हिमाचली उपभोक्ता के लिए दूध की आपूर्ति के  नाम पर बाहरी राज्यों के उत्पादों पर अधिकतम निर्भर रहना पड़ता है।

कुछ वर्ष पूर्व दूध गंगा परियोजना शुरू हुई,लेकिन सरकारी योजनाओं के अनंत सागर में डूब गई। बहरहाल केंद्र सरकार की छह साल पहले शुरू योजना के चरण अगर हिमाचल तक पहुंचे हैं,तो इसके लिए पशुपालन मंत्री वीरेंद्र कंवर की विशेष रुचि रही है। देश में देशी नस्ल के करीब नौ करोड़ दुधारू पशु हैं। हिमाचल में गाय के अलावा भैंस,भेड़ व बकरी पर भी बहुत कुछ करने की जरूरत है,क्योंकि सामाजिक दृष्टि से एक बड़ा वर्ग दुधारू व ऊन उत्पादक के रूप में अपनी खासी पहचान रखता है। विडंबना यह है कि वनीकरण की दिशा में बढ़ते हुए सत्तर के दशक से ही सार्वजनिक चरागाहें सिमट गईं और उपयुक्त चारे का प्रबंध न होने के कारण पशुपालन अपनी व्यावसायिक उपयोगिता में कमजोर पड़ गया।

इस दौरान राज्य ने अपने विकास की गाथा लिखते हुए भले ही कई मंजिलें लिख दीं या राज्य को अति ग्रामीण साबित करके केंद्रीय मदद हासिल की गई, लेकिन कृषि से युवाओं का मोहभंग होता गया। गोकुल ग्राम परियोजना इस लिहाज से जो आदर्श खड़े कर रही है,उससे गाय के इर्द-गिर्द आर्थिकी की दीवारें हट सकती हैं,बशर्ते समाज का नजरिया भी बदले। जिस तरह शिक्षण संस्थान बांटने की प्रतियोगिता में राजनीतिक इतिहास बनता रहा है,उससे आम युवा को रोजगार के मायने केवल सरकारी नौकरी में ही दिखाई देने लगे। दूसरी ओर आवारा पशु और विशेषकर बंदरों से निजात पाने को जो प्राथमिक कार्य होने चाहिए थे,उनके विपरीत वन विभाग केवल इनसानी फितरत से फिरौती मांगता ही दिखाई दिया। लगातार हिमाचल की कमोबेश हर सरकार अपनी वन नीति के कारण किसानों के तबाह होते खेत को नहीं देख सकी।

आश्चर्य यह कि कभी हिमाचल के पशुधन की विरासत में नलवाड़ मेलों के खूंटे बताते थे कि समाज ने ऐसी संस्कृति को अपनी परंपराओं के आवरण से ढांप रखा है,लेकिन अब तो औपचारिक पूजा के लिए भी पशुओं की व्यवस्था करनी पड़ रही है। गाय के अस्तित्व को कभी सामाजिक सामंजस्य कबूल करता था। अब कट्टरता के बीच निगरानी के वीभत्स दृश्य उत्पन्न होते हैं,लेकिन जो नारों को आवाज देते हैं वे सड़क पर आवारा होती गाय पर शर्म महसूस नहीं करते। गाय से जुड़ी आर्थिकी बढ़ाने के लिए कृषि-बागबानी के साथ-साथ पशुओं की उपयोगिता का संतुलन भी पुख्ता करना होगा।

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