Sunday, July 25, 2021 09:25 AM

कोरोना काल में बढ़ती पर्यावरण की गरिमा

इस समस्या का उत्तम विकल्प यह है कि हम स्वतंत्र पंप स्टोरेज परियोजना बनाएं जैसा ऊपर बताया गया है। इन परियोजनाओं को नदी के पाट से अलग बनाया जा सकता है। किसी भी पहाड़ के ऊपर और नीचे उपयुक्त स्थान देख कर दो तालाब बनाए जा सकते हैं। ऐसा करने से नदी के बहाव में व्यवधान पैदा नहीं होगा। ऐसी स्वतंत्र पंप स्टोरेज परियोजना से दिन की बिजली को रात की बिजली में परिवर्तित करने में मेरे अनुमान से तीन रुपए प्रति यूनिट का खर्चा आएगा। अतः यदि हम सौर ऊर्जा के साथ स्वतंत्र पंप स्टोरेज परियोजनाएं लगाएं तो हम छह रुपए में रात की बिजली उपलब्ध करा सकते हैं...

आज संपूर्ण विश्व बाढ़, तूफान, सूखा और कोविड जैसी समस्याओं से ग्रसित है। ये समस्याएं कहीं न कहीं मनुष्य द्वारा पर्यावरण में अत्यधिक दखल करने के कारण उत्पन्न हुई दिखती हैं। इस दखल का एक प्रमुख कारण बिजली का उत्पादन है। थर्मल पावर को बनाने के लिए बड़े क्षेत्रों में जंगलों को काट कर कोयले का खनन किया जा रहा है। इससे वनस्पति और पशु प्रभावित हो रहे हैं। जल विद्युत के उत्पादन के लिए नदियों को अवरोधित किया जा रहा है और मछलियों की जीविका दूभर हो रही है। लेकिन मनुष्य को बिजली की आवश्यकता भी है। अक्सर किसी देश के नागरिकों के जीवन स्तर को प्रति व्यक्ति बिजली की खपत से आंका जाता है। अतएव ऐसा रास्ता निकालना है कि हम बिजली का उत्पादन कर सकें और पर्यावरण के दुष्प्रभावों को भी सीमित कर सकें। अपने देश में बिजली उत्पादन के तीन प्रमुख स्रोत हैं। पहला है थर्मल यानी कोयले से निर्मित बिजली। इसमें प्रमुख समस्या यह है कि अपने देश में कोयला सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है। हमें दूसरे देशों से कोयला भारी मात्रा में आयात करना पड़ रहा है। यदि कोयला आयात करके हम अपने जंगलों को बचा भी लें तो आस्ट्रेलिया जैसे निर्यातक देशों में जंगलों के कटने और कोयले के खनन से जो पर्यावरणीय दुष्प्रभाव होंगे वे हमें भी प्रभावित करेंगे ही।

 कोयले को जलाने में कार्बन का उत्सर्जन भारी मात्रा में होता है जिसके कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है और तूफान, सूखा एवं बाढ़ जैसी आपदाएं उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही हैं। बिजली उत्पादन का दूसरा स्रोत जल विद्युत अथवा हाइड्रो पावर है। इस विधि को एक साफ सुथरी तकनीक कहा जाता है चूंकि इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है। थर्मल पावर में एक यूनिट बिजली बनाने में लगभग 900 ग्राम कार्बन का उत्सर्जन होता है जबकि जल विद्युत परियोजनाओं को स्थापित करने में जो सीमेंट और लोहा आदि का उपयोग होता है उसको बनाने में लगभग 300 ग्राम कार्बन प्रति यूनिट का उत्सर्जन होता है। जल विद्युत् में कार्बन उत्सर्जन में शुद्ध कमी 600 ग्राम प्रति यूनिट आती है जो कि महत्त्वपूर्ण है। लेकिन जल विद्युत बनाने में दूसरे तमाम पर्यावरणीय दुष्प्रभाव पड़ते हैं। जैसे सुरंग को बनाने में विस्फोट किए जाते हैं जिससे जलस्रोत सूखते हैं और भूस्खलन होता है। बैराज बनाने से मछलियों का आवागमन बाधित होता है और जलीय जैव विविधता नष्ट होती है। बड़े बांधों में सेडीमेंट जमा हो जाता है और सेडीमेंट के न पहुंचने के कारण गंगासागर जैसे हमारे तटीय क्षेत्र समुद्र की गोद में समाने की दिशा में हैं। पानी को टर्बाइन में मथे जाने से उसकी गुणवत्ता में कमी आती है। इस प्रकार थर्मल और हाइड्रो दोनों ही स्रोतों की पर्यावरणीय समस्या है। सौर ऊर्जा को आगे बढ़ाने से इन दोनों के बीच रास्ता निकल सकता है। भारत सरकार ने इस दिशा में सराहनीय कदम उठाए हैं। अपने देश में सौर ऊर्जा का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है।

 विशेष यह कि सौर ऊर्जा से उत्पादित बिजली का दाम लगभग तीन रुपए प्रति यूनिट आता है जबकि थर्मल बिजली का छह रुपए और जल विद्युत का आठ रुपए प्रति यूनिट। इसलिए सौर ऊर्जा हमारे लिए हर तरह से उपयुक्त है। यह सस्ती भी है और इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी तुलना में कम हैं। लेकिन सौर ऊर्जा में समस्या यह है कि यह केवल दिन के समय में बनती है। रात में और बरसात के समय बादलों के आने-जाने के कारण इसका उत्पादन अनिश्चित रहता है। ऐसे में हम सौर ऊर्जा से अपनी सुबह, शाम और रात की बिजली की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते हैं। इसका उत्तम उपाय है कि ‘स्टैंड अलोन’ यानी कि ‘स्वतंत्र’ पंप स्टोरेज विद्युत परियोजनाएं बनाई जाएं। इन परियोजनाओं में दो बड़े तालाब बनाए जाते हैं। एक तालाब ऊंचाई पर और दूसरा नीचे बनाया जाता है। दिन के समय जब सौर ऊर्जा उपलब्ध होती है तब नीचे के तालाब से पानी को ऊपर के तालाब में पंप करके रख लिया जाता है। इसके बाद सायंकाल और रात में जब बिजली की जरूरत होती है तब ऊपर से पानी को छोड़ कर बिजली बनाते हुए नीचे के तालाब में लाया जाता है। अगले दिन उस पानी को पुनः ऊपर पंप कर दिया जाता है। वही पानी बार-बार ऊपर-नीचे होता रहता है। इस प्रकार दिन की सौर ऊर्जा को सुबह, शाम और रात की बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है। विद्यमान जल विद्युत परियोजनाओं को ही पंप स्टोरेज में तब्दील कर दिया जा सकता है। जैसे टिहरी बांध के नीचे कोटेश्वर जल विद्युत परियोजनाओं को पंप स्टोरेज में परिवर्तित कर दिया गया है। दिन के समय इस परियोजना से पानी को नीचे से ऊपर टिहरी झील में वापस डाला जाता है और रात के समय उसी टिहरी झील से पानी को निकाल कर पुनः बिजली बनाई जाती है। विद्यमान जल विद्युत परियोजनाओं को पंप स्टोरेज में परिवर्तित करके दिन की बिजली को रात की बिजली में बदलने का खर्च मात्र 40 पैसे प्रति यूनिट आता है।

 इसलिए तीन रुपए की सौर ऊर्जा को हम 40 पैसे के अतिरिक्त खर्च से सुबह-शाम की बिजली में परिवर्तित कर सकते हैं। लेकिन इसमें समस्या यह है कि टिहरी और कोटेश्वर जल विद्युत परियोजनाओं से जो पर्यावरणीय दुष्प्रभाव होते हैं, वे तो होते ही रहते हैं। कुएं से निकले और खाई में गिरे। सौर ऊर्जा को बनाया, लेकिन उसे रात की बिजले बनाने में पुनः नदियों को नष्ट किया। इस समस्या का उत्तम विकल्प यह है कि हम स्वतंत्र पंप स्टोरेज परियोजना बनाएं जैसा ऊपर बताया गया है। इन परियोजनाओं को नदी के पाट से अलग बनाया जा सकता है। किसी भी पहाड़ के ऊपर और नीचे उपयुक्त स्थान देख कर दो तालाब बनाए जा सकते हैं। ऐसा करने से नदी के बहाव में व्यवधान पैदा नहीं होगा। ऐसी स्वतंत्र पंप स्टोरेज परियोजना से दिन की बिजली को रात की बिजली में परिवर्तित करने में मेरे अनुमान से तीन रुपए प्रति यूनिट का खर्चा आएगा। अतः यदि हम सौर ऊर्जा के साथ स्वतंत्र पंप स्टोरेज परियोजनाएं लगाएं तो हम छह रुपए में रात की बिजली उपलब्ध करा सकते हैं जो कि थर्मल बिजली के मूल्य के बराबर होगा। इसके अतिरिक्त जब कभी-कभी अकस्मात ग्रिड पर लोड कम-जादा होता है, उस समय भी पंप स्टोरेज परियोजनाओं से बिजली को बनाकर या बंद करके ग्रिड की स्थिरता को संभाला जा सकता है। इसलिए हमें थर्मल और जल विद्युत के मोह को त्यागकर सौर एवं स्वतंत्र पंप स्टोरेज के युगल को अपनाना चाहिए। जंगल और नदियां देश की धरोहर और प्रकृति एवं पर्यावरण की संवाहक हैं। इन्हें बचाते हुए बिजली के अन्य विकल्पों को अपनाना चाहिए।

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

ई-मेलः [email protected]

पर्यावरण दिवस के दिन सोशल मीडिया पर पर्यावरण के प्रति जागरूक करने वाले अनेक संदेश मिल जाते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में यह सब कुछ ईद का चांद हो जाता है...

वर्ष 2020 कोरोना महामारी की बलि चढ़ चुका है। 2021 में 70 फीसदी उसी दिशा में अग्रसर है। एक आम आदमी से लेकर विशेष आदमी भी इस महामारी के काल में अपने जीवन को बचाने के लिए संघर्षरत है। ऐसे में पर्यावरण की गरिमा मानव जीवन में नित नए पाठ पढ़ा रही है। यह दूसरा वर्ष है जब हमने पर्यावरण दिवस कोरोना महामारी के दौरान मनाया। इस समय पूरी दुनिया वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से ग्रस्त है। विश्व के बड़े शक्तिशाली व विकसित देश भी इस महामारी के आगे नतमस्तक हो चुके हैं। ऐसे में मानव जीवन चारदीवारी में कैद है। सरकार द्वारा भी यही दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं कि यदि अति आवश्यक हो तभी अपने घर से बाहर निकलें अन्यथा अपने आप तथा अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए कुछ समय तक सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क, सेनेटाइजर तथा स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहकर अपनी रक्षा स्वयं करने की आदत विकसित करें। ऐसे कठिन समय में मानव को उसके गांव की याद आ रही है। ऐसा भी कहा जाता है कि असली भारत, भारत के गांव में ही बसता है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में लीन मानव गांव की ओर आने के लिए लालायित है। शायद इस जानलेवा महामारी के बीच में मानव को ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यदि वह अपने गांव में पहुंच गया तो वह इस वैश्विक महामारी से अपने आप को बचा पाएगा। ऐसे में ग्रामीण परिवेश की सुख-सुविधाओं, पर्यावरण, वन्यजीव, पक्षियों इत्यादि का स्मरण स्वतः ही हो आता है। इस महामारी के बीच में ही 5 जून 2021 का दिन आया जिसे अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया गया। मानव जीवन के ऊपर आए इस संकट की उपज के कारणों तथा भविष्य के लिए उत्पन्न हुए संकट पर वार्तालाप करना समय की मांग बन चुका है। कोरोना वायरस से देश की जनता को बचाने के लिए लॉकडाउन, कर्फ्यू जैसे कारगर तरीके को अपनाना पड़ा, जिसके कारण मानव-जीवन की विभिन्न गतिविधियां प्रभावित हुईं। लेकिन प्रकृति को बड़ी राहत मिली। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे दृश्य देखने को मिले जो कि इतिहास के पन्नों में ही समा चुके थे। गत वर्ष पंजाब के जालंधर क्षेत्र से हिमाचल प्रदेश के धौलाधार की तस्वीरें साफ  दिखी थीं। देश के विभिन्न भागों में वन्य प्राणियों, पक्षियों के अद्भुत झुंड सड़कों पर चलते दिखे। वहीं देश की राजधानी दिल्ली जैसे अत्यधिक जनसंख्या घनत्व वाले प्रदेश में भी स्वच्छता का दीदार संभव हो पाया। वहीं गंगा नदी जिस पर सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही थी, लॉकडाउन के दौरान उसकी जलधारा भी स्वच्छ दिखी। इस परिप्रेक्ष्य में  पिछले 2 वर्षों के पर्यावरण दिवस को सेलिब्रेट करने का औचित्य अपने आप में विशेष है।

 इस दिवस को मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने हेतु वर्ष 1972 में की थी। इसे 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन में चर्चा के बाद शुरू किया गया था। 5 जून 1974 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। धरती पर लगातार बेकाबू होते जा रहे प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसे कारणों के चलते वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे की शुरुआत हुई थी। हर वर्ष एक नए थीम के साथ पर्यावरण दिवस को मनाया जाता है।  वर्ष 2021 का विषय है पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्बहाली। अर्थात पृथ्वी को एक बार फिर से अच्छी अवस्था में लाना। इसके लिए हमें स्थानीय स्तर से जमीनी प्रयास शुरू करने होंगे, तभी हम इस पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित कर पाएंगे। इसमें हर भारतीय को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। विश्व पर्यावरण दिवस 2020 की थीम जैव-विविधता है। इस थीम के  माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जैव विविधता संरक्षण एवं प्राकृतिक संतुलन होना मानव जीवन के अस्तित्व के लिए बेहद आवश्यक है। शायद कोरोना वायरस के समय काल में प्रकृति के साथ समय व्यतीत करने का मानव को काफी लंबे समय के बाद ऐसा सुअवसर प्राप्त हुआ है। लेकिन आज का मानव डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने आपको सजग व सुरक्षित महसूस पाता है। ऐसे में इस वर्ष का पर्यावरण दिवस भी डिजिटल दुनिया के माध्यम से ही देश व प्रदेश की अधिकतर जनता ने मनाया। कोई बुराई नहीं है कि मानव डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रकृति के उत्थान व मानव जीवन को सुगम बनाने के मार्ग को प्रशस्त करे। लेकिन कहीं न कहीं मानव ने अपने सुखों व लालच की पूर्ति के लिए प्रकृति के साथ अनेकों अन्याय किए हैं, जो कि मानव के अस्तित्व के लिए ही घातक साबित हो रहे हैं। आज का कोरोना वायरस भी मानव द्वारा प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़ का ही परिणाम है।

 जब मानव ने अपनी भूख को खत्म करने के लिए जंगली व वन्य प्राणियों को अपने भोजन में सम्मिलित करने का दुस्साहस किया तो वह यह भूल गया कि कहीं जाने-अनजाने में यही जंगली जानवर उसके जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभर सकते हैं। यही मानव की सबसे बड़ी भूल आज वैश्विक स्तर पर मानव के अस्तित्व को समाप्त करने को उतारू दिख रही है। कुछ ऐसा ही परिदृश्य कोरोना वायरस के उद्भव में भी देखने को मिलता है। कोरोना वायरस के उत्पन्न होने का सर्वमान्य तथ्य यह है कि यह वायरस चमगादड़ों तथा जंगली जानवरों के सेवन करने के कारण मानव में आया और काफी हद तक यह सत्य भी साबित हुआ है। तो ऐसे में मानव को यह सबक प्रकृति ने जरूर सिखाया है कि यदि प्रकृति के साथ अवैध छेड़छाड़, अप्राकृतिक चीजों का सेवन व दिनचर्या को अपनाएंगे तो स्वतः ही एक दिन नष्ट हो जाएंगे। भारत के मानचित्र पर कभी हिमाचल प्रदेश जैसा प्राकृतिक संपदा से समृद्ध राज्य स्वच्छ हवा, ऋषि-मुनियों की तपोभूमि तथा देवभूमि की उपमा से विश्वविख्यात था, लेकिन वर्तमान समय में यह पावन धरा भी प्रदूषण की चपेट में आ चुकी है। हिमाचल के छह शहर बुरी तरह से प्रदूषण की चपेट में आ चुके हैं। हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी क्षेत्र में भी प्रदूषण बेलगाम होता जा रहा है। पर्यावरण दिवस के दिन सोशल मीडिया तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पोस्टर, वॉलपेपर, स्लोगन्स, चुटकुले तथा कविताओं के माध्यम से पर्यावरण को जागरूक करने वाले अनेकों संदेश मिल जाते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में यह सब कुछ ईद का चांद हो जाता है। इस आदत को बदलना होगा। हमें निरंतर पर्यावरण को बचाने का प्रयास करना होगा। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी मानव अपना जीवन-यापन सुख-समृद्धि से कर पाएगा।

कर्म सिंह ठाकुर

लेखक सुंदरनगर से हैं