Saturday, November 28, 2020 01:45 AM

गुस्से में नितिन गडकरी

पत्रकारिता के लंबे दौर में हमने किसी भी केंद्रीय कैबिनेट मंत्री की जुबान से ऐसे शब्द नहीं सुने। राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर सार्वजनिक रूप से ऐसे शब्दों का प्रयोग न तो संसदीय माना जाता है और न ही सरकार के सामूहिक कार्यबल को इस तरह कोसने का दुस्साहस कोई मंत्री कर पाया है। सामूहिक हड़ताल और विरोध-प्रदर्शनों की संभावनाएं बनी रहती हैं, लेकिन केंद्रीय सड़क, राजमार्ग एवं जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी को अप्रत्याशित और अभूतपूर्व गुस्सा आया है। वह भीतर गहरे तक मर्माहत हुए हैं। उन्होंने देश के सार्वजनिक धन और संसाधनों का दुरुपयोग करार दिया है। उन्होंने मंत्री होने के बावजूद, किसी का भी नाम लिए बिना, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के सरकारी बाबुओं, अर्द्ध-अफसरों और महाप्रबंधक तक के वरिष्ठ अधिकारियों को निकम्मा, नकारा, नालायक, भ्रष्ट, गधा, अक्षम और विषकन्या आदि करार दिया है। नौकरशाही और फाइलचलाऊ बाबुओं के सामने एक कैबिनेट मंत्री ने खुद को असहाय और अधूरा माना है।

 गडकरी इतने सख्त और गालीनुमा मंत्री नहीं हैं। उनकी छवि समयबद्ध और चरणबद्ध तरीके से सार्वजनिक कार्यों को सम्पन्न करने की रही है। उनके अभी तक के कार्यकाल के दौरान सड़क और राजमार्ग निर्माण ने तीव्र गति पकड़ी है और रिकॉर्ड स्थापित किए हैं। मंत्री के तौर पर गडकरी देर रात तक बैठकें करने और फैसले लेने के अभ्यस्त हैं। वह मिलनसार और लचीली प्रकृति की शख्सियत हैं, लिहाजा घोर आश्चर्य होता है कि ऐसा क्या हुआ कि उन्हें इस हद तक गुस्सा आया और उनकी जुबान से अपशब्द निकले। उन्होंने साफ  कहा कि कई बाबुओं और अफसरों को निलंबित किया, उनकी सालाना गोपनीय रपट खराब कराई, लेकिन वे काम करने के बजाय उलझनें पैदा करते रहे, अपनी नकारात्मक और विकृत मानसिकता के साथ काम करते रहे और इस तरह उन्होंने सरकार और देश के 12 लंबे साल बर्बाद कर दिए। मंत्री गडकरी ने स्वीकार किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में गधे-घोडे़ बराबर काम करते रहे हैं। वे ‘विषकन्या’ की भांति हैं। अब लगता है कि उन्हें ठोके-पीटे बिना काम नहीं चलेगा। गडकरी ने खुलेआम, स्पष्ट कहा-‘अब मैं इनका बैंड बजाऊंगा।’ केंद्रीय मंत्री ने गुरुवार को एक सरकारी इमारत का, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए, वर्चुअल उद्घाटन किया और सार्वजनिक मंच से संबोधन में ऐसे अपशब्दों का प्रयोग कर पूरे देश को चौंका दिया। दिल्ली के द्वारका क्षेत्र में करीब 65,500 वर्ग फुट का भवन बनाने का फैसला 2008 में लिया गया और 2011 में टेंडर निकले। उन दोनों ही अवसरों पर केंद्र में यूपीए सरकार थी। मौजूदा मोदी सरकार को भी सवा छह साल बीत चुके हैं। उस परियोजना का शुरुआती खर्च 135 करोड़ रुपए आंका गया था, लेकिन टेंडर के बाद भी इमारत बनने में नौ साल लग गए और खर्च करीब 250 करोड़ रुपए तक बढ़ने का अनुमान है। केंद्रीय मंत्री गडकरी को इस तरह करदाताओं का सार्वजनिक पैसा और समय बर्बाद करने पर गुस्सा आता है।

 सवाल है कि इस सरकारी, कछुआ प्रवृत्ति को क्या गडकरी बदल पाएंगे? क्या सरकारी कायदे-कानून से बाहर जाकर एक मंत्री अफसरों और बाबुओं, कर्मचारियों के खिलाफ  दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है? यकीनन नहीं….लिहाजा एक बार फिर व्यापक स्तर पर प्रशासनिक सुधार करने की जरूरत है। यूपीए सरकार के दौरान एक ऐसा प्रयोग किया गया था और वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था। उसकी सिफारिशें क्या रहीं, उनका विश्लेषण अभी संभव नहीं है, लेकिन मोदी सरकार भी तब के पन्नों को खोल कर कुछ ग्रहण कर सकती है। गडकरी ने ऐसी व्यवस्था पर अफसोस जताया कि ऐसे नालायक और नकारा बाबू ही प्रोन्नत होकर मुख्य महाप्रबंधक और महाप्रबंधक के पदों तक पहुंच जाते हैं और कुछ प्राधिकरण में ही सदस्य के पद तक पहुंचने में सफल हो जाते हैं। विवादित इमारत बनने तक प्राधिकरण के आठ चेयरमैन बदल गए और दो सरकारें बदल गईं। दूसरी सरकार का भी दूसरा कार्यकाल शुरू हुए सवा साल बीत चुका है। गडकरी ने मीडिया से आग्रह किया है कि उन्हें और ऐसे निकम्मे बाबुओं को बेनकाब करें और उनके फोटो चैनल पर दिखाएं और अखबार में छापें कि ये कितने भ्रष्ट और नकारात्मक चेहरे हैं। क्या ऐसा करने से उनका सरकारी मानस बदलेगा, उनकी प्रवृत्तियां भी बदल सकेंगी? यह बेहद गंभीर सवाल है, जो एक मंत्री की सक्रियता और आक्रामकता के कारण देश के सामने है। जरा सोचिए…!

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