Sunday, July 25, 2021 07:31 AM

हिमाचल के हरिद्वार

कोरोना काल ने समाज की मूल भावना को फिर से उकेरते हुए सामुदायिक व्यवहार को, नई परिस्थितियों के सांचे में परोसना शुरू किया है। सारे सरकारी तामझाम के पीछे कहीं समाज खुद के नजरिए को परखते हुए नए तर्क गढ़ रहा है। मानवीय व्यथा के नए अक्षर अपनी ही परंपराओं से हटकर नए अर्थ खोज रहे हैं, तो सामुदायिक जरूरतें अपने नजदीक जीने-मरने के विकल्प खड़ा कर रही हैं। मौतों के आंकड़ों में पुरातन कर्मकांड या मान्यताओं के पुण्य-पाप से हटकर एक ऐसा समाज विकसित हो रहा है, जो भविष्य का पुनर्लेखन कर सकता है। हमारे समीप यानी हिमाचल में भी अगर अस्थि विसर्जन के नए समाधान को देखें, तो एक साथ कई हरिद्वार फिर से खुद को स्थापित कर रहे हैं। हमीरपुर-कांगड़ा की सीमा से बहती ब्यास नदी पर स्थित कालेश्वर महादेव इसी परिवर्तन को लिखते हुए कोरोना प्रभावित परिवारों के आंसू पोंछ रहा है। वर्षों से अस्थि विसर्जन के विकल्प में कालेश्वर ने खुद को परिभाषित और परिमार्जित किया है, लेकिन कोरोना काल ने महाकाल को इस बार पूरी तरह रेखांकित कर दिया है। हर दिन करीब चालीस अस्थि विसर्जन हालांकि मानवीय पीड़ा का अति कठिन दौर है, लेकिन हमारी मान्यताएं कम से कम खुद से सवाल पूछ कर हल भी दे रही हैं।

 जाहिर है प्रत्येक अस्थि विसर्जन, एक मार्मिक पहलू में लिपटी पारिवारिक व्यथा है, लेकिन जीवन की अंतिम मर्यादा में अगर परंपरापएं कालेश्वर में कबूल होने लगीं, तो यह सामाजिक सुधार का अनिवार्य अंग बन सकती हैं। इसी तरह कांगड़ा के खीर गंगा, गंगभैरो व चामुंडा, पांवटा साहिब और तांदी सहित कई अन्य संगम स्थल इस दौर में अपनी शिनाख्त कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों पहले चंद्रभागा तांदी संगम स्थल पर अस्थि विसर्जन की मान्यता को उस समय ज्यादा बल मिला जब 2016 में विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल और बाद में अटल बिहारी की अस्थियों का यहां विसर्जन हुआ। दिवंगत सांसद रामस्वरूप, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर व केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री महेश शर्मा की उपस्थिति में देश के पूर्व प्रधानमंत्री का अस्थि विसर्जन, इस स्थल को अपनी आस्था से चिन्हित कर देता है। अस्थियों और नदी को वैज्ञानिक रूप से जोड़ने की वजह न केवल गंगा बल्कि हर हिमालयी नदी के अस्तित्व से प्रश्न पूछ रही है। स्वयं गंगा अपने तट पर प्रदूषण की विकरालता को ढोते-ढोते इतनी मैली हो रही है और कई परंपराएं उन्हीं घाटों पर हार रही हैं, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी यह हस्ताक्षरित होता आया कि अपने सगे-संबंधियों की याद में यह स्थान हमेशा एक स्तंभ है। अब स्थिति भिन्न और कर्म कांड के व्यवसाय में धन की संलिप्तता ने सारे परिदृश्य को आस्था के बजाय, सामाजिक अभिप्राय की मजबूरी बना दिया।

 इसी कोरोना काल में पवित्र गंगा के तट अपनी मजबूरियों में रो रहे हैं और जिन्होंने लाशों के बीच परंपराओं की खिल्ली उड़ती देखी होगी, उनके लिए कौनसी गंगा का सवाल पैदा होता है। सवाल यह कि गंगा में ही अस्थि विसर्जन क्यों और अगर पौराणिक कथाएं इस नदी को वैदिक आस्था से जोड़ती हैं, तो हिमाचल में बहती हर नदी या तमाम सहायक नदियां भी अपनी स्तुति को अंगीकार कराती हैं। गंगा में बहती लाशों के कारण मानव का चरित्र अगर नहीं पिघलता या इस काल खंड की फकीरी में हमें प्रायश्चित करने के लिए साफ गंगा जल भी नहीं मिलता, तो वे तमाम हिमाचली हमारे आदर्श होने चाहिएं जो कालेश्वर-तांदी सहित, अलग-अलग नदियों के संगम पर अपने प्रियजनों का अस्थि विसर्जन करके अपना ऋण उतार रहे हैं। अगर परंपराएं आगे बढ़कर अस्थि विसर्जन के नए विकल्पों को पूर्ण मान्यता देती हैं, तो यह वैदिक अध्ययन को ठिकाना देंगी। कालेश्वर के साथ गरली में स्थित राष्ट्रयि संस्कृत विश्वविद्यालय के वैदिक अध्ययन, शोध व ज्ञान की ऊर्जा से यह स्थान धर्म की उच्च परंपराएं स्थापित कर सकता है और इस तरह अपने प्रियजनों की याद में यह स्थान नया अवतार लेकर, हिमाचली आर्थिकी का हरिद्वार भी बन सकता है, जरा सोचिए।