Saturday, August 15, 2020 09:29 PM

हिमाचल का साहित्यिक माहौल

हंसराज भारती, मो.-9816317554

हिमाचल के साहित्यिक मौहाल पर गौर करें तो पाएंगे कि वर्तमान में हिमाचल का साहित्यिक मौहाल उतना उत्साहवर्धक नहीं है जितना कि होना चाहिए। हालांकि प्रदेश सामाजिक स्तर पर अपेक्षाकृत शांत और राजनीतिक स्तर पर स्थिरता का प्रतीक है। अपने जन्म से आज तक हिमाचल ने विकास के कई आयाम स्थापित किए हैं। शुरुआती वर्षों को छोड़ दें तो बाद के दशकों में विषेशतया पिछली सदी के आठवें दशक के बाद यहां के साहित्यिक परिवेश में बड़ा परिवर्तन लक्षित होता है। प्रचुर मात्रा में साहित्य की सभी विधाओं में स्तरीय लेखन हुआ है। खास तौर से कविता और कहानी के क्षेत्र उल्लेखनीय हैं। साहित्य अभिव्यक्ति का माध्यम है और भाषा इसका औजार है। भाषायी दृष्टि से हिमाचल राजनीतिक, प्रशासनिक, भौगोलिक, आर्थिक, सांस्कृतिक इकाई की तरह स्वतंत्रचेता न होकर पराश्रित है।

हिंदी को यहां अपनाया गया है, पर असल में हिंदी यहां की आत्मा की भाषा नहीं है। इस भाषायी रिक्तता के कारण यहां के लेखन को बृहद हिंदी पट्टी में कभी उतनी तरजीह नहीं दी गई। अब भले ही स्थिति में थोड़ा सुधार जरूर आया है, पर वह भी उतना वांछित नहीं। लेकिन हमारे यहां दिक्कत यह है कि समग्र हिमाचली साहित्यिक लेखन एक कुंठा का शिकार है। जब तक हिंदी पट्टी के कोई महारथी संपादक या लेखक यहां के किसी रचनाकार को सर्टिफिकेट नहीं दे देते तब तक यहां का अदबी दायरा उसका कोई नोटिस नहीं लेता, भले ही वह रचनाकार अपने स्तर पर कितना ही प्रतिभावान क्यों न हो। हम उनके पीछे दौड़ते हैं कि देखिए हमने ये लिखा है। इस पर नजरे इनायत करें। इससे मौहाल विडंबना का शिकार होता है। अब वक्त आ गया है कि हमें अपने रचनाकारों की अपने स्तर पर पहचान करनी चाहिए। उनकी क्षमता पर भरोसा करना सीखना होगा। हां, यह जरूर है कि विस्तृत हिंदी पट्टी से यहां के लेखकों को विस्तृत क्षेत्र और पाठक वर्ग भी मिलता है। राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान भी मिलाती है। पर यह सब कोई मूल्य आधारित नहीं अपितु निरपेक्ष समदृष्टि से होना चाहिए जो कि आज तक नहीं हो पाया है। हां, कुछ अपवाद अवश्य होते हैं। यहां पर भी हैं। मौहाल में उत्प्रेरणा के बिंदु स्रोत कई होते हैं और होने भी चाहिए। हिमाचल एक छोटा राज्य है। यहां पर कोई बड़ा पाठक वर्ग उभर कर नहीं आया है। जो है वो  छुटपुट रूप में ही है। यूं भी यहां पठन-पाठन संस्कृति का अभाव है । साहित्यिक संवर्धन के लिए एक अच्छा पाठक वर्ग होना आवश्यक है। शायद इसी कारण यहां के किसी लेखक की पुस्तक का दूसरा संस्करण कभी प्रकाशित हुआ हो। पाठक वर्ग के अभाव में कितना ही सार्थक लेखन क्यों न हो, निरर्थक सा लगता है। साहित्यिक क्षेत्र में साहित्य पत्र-पत्रिकाओं का अपना विशेष योगदान होता है। प्रदेश में उत्कृष्ट पत्र-पत्रिकाओं का नितांत अभाव है। निजी क्षेत्र तो प्रायः रिक्त सा है। जो एक-आध छपती भी हैं, उनका प्रकाशन अनियमित और प्रसार संख्या कम है। सरकारी क्षेत्र में जरूर दो-तीन पत्रिकाएं अवश्य प्रकाशित होती हैं, परंतु उनकी प्रसार संख्या भी बहुत सीमित है। जब संप्रेषण के साधन ही इतने कम स्तर पर हों, फिर कुछ अच्छा लिखा हुआ पाठक वर्ग तक कैसे  पहुंचे। किसी समय समाचार पत्रों के साहित्यिक अंक या पन्ना पाठकों को आकर्षित करते थे और नवोदित लेखकों के लिए प्रोत्साहन का कार्य करते थे। इनके माध्यम से साहित्य आम पाठक तक सरलता से सुलभ था। आज अधिकांश समाचार पत्रों के साहित्यिक पृष्ठ गायब हैं। आज तक प्रदेश में अपना कोई पूर्णकालिक टीवी चैनल भी नहीं है। हां, आकाशवाणी ने साहित्यिक रचना प्रसारण में जरूर अपना मुकाम हासिल किया है। इसके अलावा प्रदेश में अच्छे प्रकाशन गृहों का भी नितांत अभाव है। इसके कारण बहुत से रचनाकारों को अपनी रचनाएं प्रकाशित करवाने में काफी कठिनाइयां आती हैं। बाहरी प्रकाशक यहां के लेखकों का शोषण करते हैं। प्रदेश में भाषा विभाग और भाषा अकादमी साहित्य गतिविधियों के लिए समय-समय पर कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं, जिनका उद्देश्य साहित्यिक मौहाल को बिना किसी पक्ष या विपक्ष के प्रोत्साहन देना और उसका मूल्यांकन करना है। पर इनका आलम यह है कि पांच-छह वर्षों तक पुरस्कारों की घोषणा तक नहीं हो पाती। इनके आयोजनों में पूरा तामझाम करने के बाद भी बहुत कम संख्या में साहित्य प्रेमी शिरकत करते हैं। कोई इका-दुक्का आयोजन सफल हो जाए तो अलग बात है। इसके अलावा प्रदेश में कुछ गैर सरकारी छोटी-बड़ी संस्थाएं भी अपने स्तर पर साहित्य संबंधी कार्यक्रम करती रहती हैं। उनके ये प्रयास सराहनीय हैं। इन बिंदुओं को मद्देनजर रखते हुए और अधिक सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है ताकि प्रदेश में स्वस्थ और समृद्ध साहित्यिक वातावरण का विकास हो।

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