Tuesday, August 11, 2020 12:32 AM

हिमाचल की साहित्य से निकटता व विरक्तता

साहित्य के कितना करीब हिमाचल-9

अतिथि संपादक: डा. हेमराज कौशिक

मो.- 9418010646

हिमाचल साहित्य के कितना करीब है, इस विषय की पड़ताल हमने अपनी इस नई साहित्यिक सीरीज में की है। साहित्य से हिमाचल की नजदीकियां इस सीरीज में देखी जा सकती हैं। पेश है इस विषय पर सीरीज की नौवीं किस्त…

विमर्श के बिंदु

* हिमाचल के भाषायी सरोकार और जनता के बीच लेखक समुदाय

* हिमाचल का साहित्यिक माहौल और उत्प्रेरणा, साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और आयोजन

* साहित्यिक अवलोकन से मूल्यांकन तक, मुख्यधारा में हिमाचली साहित्यकारों की उपस्थिति

* हिमाचल में पुस्तक मेलों से लिट फेस्ट तक भाषा विभाग या निजी प्रयास के बीच रिक्तता

* क्या हिमाचल में साहित्य का उद्देश्य सिकुड़ रहा है?

* हिमाचल में हिंदी, अंग्रेजी और लोक साहित्य में अध्ययन से अध्यापन तक की विरक्तता

* हिमाचल के बौद्धिक विकास से साहित्यिक दूरियां

* साहित्यिक समाज की हिमाचल में घटती प्रासंगिकता तथा मौलिक चिंतन का अभाव

* साहित्य से किनारा करते हिमाचली युवा, कारण-समाधान

* लेखन का हिमाचली अभिप्राय व प्रासंगिकता, पाठ्यक्रम में साहित्य की मात्रा अनुचित/उचित

* साहित्यिक आयोजनों में बदलाव की गुंजाइश, सरकारी प्रकाशनों में हिमाचली साहित्य

डा. गौतम शर्मा ‘व्यथित’

 मो.-9418130860

मनुष्य और साहित्य का नैसर्गिक संबंध है। उसकी प्रथम किलकारी में ही भाषा, संगीत और साहित्य का संकेत रहा है। मां की लोरियां, दादा-दादी व अन्य संबंधों की कहानियां, गांव की चौपाल-अट्यालों पर गप्प-शप व सहज संवाद कथन-श्रवण साहित्य परंपरा के बोधक रहे हैं, आज भी हैं। इसी परंपरा में दृश्य-श्रवण के विभिन्न माध्यम मानवीय सृजन समर्थ के द्योतक रहे हैं, आज भी प्रचलन में हैं। जहां तक प्रकाशित साहित्य की परंपरा का संबंध है, उसका मूल पांडुलिपि साहित्य में उपलब्ध होता है। मुद्रणालय या मुद्रण-यंत्र तो वेंकटेश्वर प्रेस बम्बई के साथ ही अस्तित्व में आया। इससे पूर्व तो साहित्य की परंपरा मौखिक व हस्तलिखित ही रही जिसे कर्मकांडी या आयुर्वेद शास्त्री नकल उतारते अपना-अपना काम चलाते और इस प्रकार एक हस्तलिखित पुस्तक अनेक हाथों से लेखन परंपरा में गुजरती प्रसार पाती रही।आजादी के संघर्षकाल में हिमाचल भारतीय साहित्य परंपरा के गेय-गीत रूप में प्रभावित हुआ और उससे निकटता पाकर उस धारा से जुड़ता, लोक रूप में भी प्रसारित हुआ, जनजागरण का माध्यम बना जिसके उद्वरण-प्रमाण इस प्रदेश के हर क्षेत्र में परंपरित हैं। पहाड़ी गांधी बाबा कांशीराम का साहित्य इस दिशा में प्रमाण है। उस समय इसका मुद्रित रूप भी प्रखर हुआ, भले ही लघु समाचार आकार में रहा। आजादी के बाद संभवतया हर क्षेत्र के नगरों में साहित्य अनुरागियों द्वारा साहित्य सभाओं, इकाइयों का गठन हुआ और साहित्य की चौपाल उत्तरोत्तर गर्माती चली गई। नाहन, मंडी, शिमला, सोलन, कुल्लू, चंबा, कांगड़ा, ऊना, बिलासपुर आदि स्थानों पर सर्वत्र साहित्य सृजन, वाचन, श्रवण, प्रकाशन की चेतना विकसित होने लगी।आजादी से पूर्व इस क्षेत्र के छात्र अध्ययन हेतु लाहौर, होशियापुर, बनारस आदि विद्या और साहित्य के केंद्र नगरों में जाया करते थे। वहां से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं में वे अपनी रचनाएं प्रकाशित होने का अवसर पाते जो स्थानीय साहित्य अनुरागियों के लिए प्रेरक बने। इसी काल खंड में अमर कहानीकार चंद्रधर शर्मा गुलेरी तथा उपन्यासकार यशपाल महानगरों में प्रवास करने पर जीवकोपार्जन व अन्य अभिरुचियों से राष्ट्रीय साहित्य मंडलों के संपर्क में आने पर पहचान पाने व श्रेष्ठ युग-युगीन साहित्य सृजन करने में समर्थ हुए, जो आज हिमाचल की धरोहर है। कहने का अभिप्राय साहित्य से निकटता, पहचान, प्रोत्साहन तथा प्रकाशन माध्यमों से जुड़ने या संपर्क में आने से ही संभव है। निःसंदेह पूर्वकाल में ऐसे और भी सशक्त हस्ताक्षर रहे होंगे, परंतु वे हिमाचल से बाहर न निकल पाए होंगे, अतः संपर्क, प्रोत्साहन, पहचान तथा मीडिया से वंचित रहे, काल-कलवित हो गए, क्योंकि यहां न तो मीडिया उपलब्ध था, न आलोचक मंडल की सहृदयता।आज साहित्य सृजन निकटता उत्तरोत्तर बढ़ रही है निःसंदेह। कारण यहां साहित्य सृजक तथा पाठक दोनों न केवल भारतीय या राष्ट्रीय लेखन के संपर्क और प्रेरणा से जुड़े हैं, बल्कि यहां का पाठक वर्ग भी उसी समकालीनता से प्रभावित है। प्रादेशिक भाषाओं का साहित्य सृजन भी साहित्यिक सम्मेलनों, विचार गोष्ठियों, साहित्य आलोचना, साहित्यिक पत्रिकाओं तथा दृश्य-श्रव्य माध्यमों के प्रभाव से उत्तरोत्तर विकसित हो रहा है।

इस प्रकार यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हिमाचल की साहित्य से निकटता मौखिक परंपरा से विकसित होती सृजन, प्रकाशन, पाठन व आदान-प्रदान पथ पर निरंतर अग्रसर है। इसमें प्रदेश के भाषा संस्कृति विभाग, भाषा संस्कृति अकादमी, विश्वविद्यालयों तथा प्रचार-प्रसार माध्यमों दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक पत्र-पत्रिकाओं की भी विशेष भूमिका है।मुझे स्मरण है हमारे गांव में कभी डाक से वीर प्रताप या मिलाप, पंजाब केसरी या हिमप्रस्थ या कल्याण पत्रिका डाक से आया करती, पाठक भी गिनती के होते। परंतु आज दिव्य हिमाचल, पंजाब केसरी, अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिमाचल दस्तक आदि समाचार पत्र दर्जनों की संख्या में हर गांव, दुकान, कार्यालय में दस्तक दे रहे हैं। जहां तक साहित्यिक अभिरुचि बढ़ाने का प्रश्न है, उस दिशा में हिमाचल में हिमप्रस्थ मासिक पत्रिका की विशेष भूमिका है।वर्तमान में इसके साथ सोमसी, हिमभारती, विपाशा, गिरिराज, शिखर, इरावती, सेतु, रचना, शैल संवाद, बाणेश्वरी, सृजन सरिता, सर्जक आदि अनेक पत्रिकाएं हैं जो साहित्य सृजन और पाठक को निकटतर ला रही हैं। समीक्षा में भी अनेक नाम उभर रहे हैं।

यह अलग है कि उनमें से अधिकतर पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पा रहे। यहां यह भी दर्ज करना आवश्यक है कि हम पुस्तक मेलों, पुस्तक भंडारों से साहित्य की पुस्तकों की खरीद से ही साहित्य को पाठकों के निकट होने का अनुमान लगाते हैं। परंतु यह तर्क प्रस्तुत विषय से इतना संबंध नहीं रखता। यह जरूरी नहीं है कि जो पुस्तक नहीं खरीदता उसमें साहित्यिक अभिरुचि नहीं है क्योंकि आज इसके कई विकल्प हैं। मैं गांव के ही अनेक लोगों के संपर्क में आया हूं जो अक्षर ज्ञान से अछूते होने पर भी साहित्य के विभिन्न रूपों कथा-कहानी, गीत, कविता, नाटक सुनने-देखने की पठित समाज से अधिक गहन रुचि और निकटता रखते हैं।

हां यह भी उल्लेखनीय है कि बौद्धिक साहित्य की अपेक्षा जन साहित्य पाठकों में अधिक निकटता पाता है  निःसंदेह। अतः हिमाचल साहित्य से सदैव निकट रहा है, आज भी है, विरक्तता कहीं दिखती नहीं। हां नागरी मंचों पर जब कभी कवि सम्मेलन होते हैं तो उनमें ऐसा आभास अवश्य होता है। उसका कारण साहित्य अभिरुचि से विरक्तता न होकर प्रस्तोताओं के अभिव्यक्ति कौशल या अदायगी कौशल में कमी होना माना जा सकता है जिसके लिए प्रस्तोताओं का अपनी कला में कुशलता, प्रभाव, आकर्षण लाने के गुणों का निरंतर अभ्यास का न होना माना जा सकता है, जिससे श्रोता समूह में ऊबन, उदासी या नीरसता का आना स्वभाविक है। क्योंकि नागरी श्रोता के भीतर समीक्षक भी विद्यमान रहता है। इस सब के बावजूद हिमाचल में साहित्य के प्रति निकटता का विकास निरंतर रहे, ऐसी संभावनाएं एवं शुभकामनाएं हैं।

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