Saturday, August 15, 2020 10:10 PM

हिमाचली भाषा के लिए पंजाबी जरूरी-2

-गतांक से आगे…

हिमाचली भाषायी संसार के मिलन के बजाय सरकार की जल्दबाजी ने कहीं न कहीं प्रदेश की आत्मीयता के बोध को दूसरी राजभाषा की आवश्यकता में खोज लिया। अगर संस्कृत के रास्ते हिमाचली भाषा का उदय हो जाए, तो यह ख्याल अच्छा है वरना व्यक्ति, समाज, संस्कृति या क्षेत्रीय पहचान में मातृभाषा में ही भावनाएं, विचार और सदियों-सदियों से चली आ रही जीवन पद्धति का शृंगार व संरक्षण निश्चित है। अब तक हम हिमाचली बोलियों में भाषा ढूंढते रहे, जबकि पंजाबी के सेतु पर चलते हुए जैसे डोगरी आठवीं अनुसूची में शामिल हुई, एक दिन हिमाचली भाषा भी स्थापित होगी। दरअसल हमें सर्वप्रथम यह सोचना होगा कि पहाड़ी बोलियों के कितना नजदीक पंजाबी या डोगरी जैसी भाषाएं कैसे आगे बढ़ी हैं। प्रदेश की 73 फीसदी आबादी की बोलियां अगर भाषायी दर्पण के आगे खड़ी हों, तो वहां पंजाबी भाषा की ही आकृति नजर आएगी। अगर ऐसा न होता तो क्यों हिमाचली युवा अपने ईयर फोन पर पंजाबी गायकी को तवज्जो देते या प्रदेश हर सांस्कृतिक समारोह की सफलता के लिए किसी न किसी पंजाबी गायक को बुलाना पड़ता। हिमाचली गायकों का ही सर्वेक्षण करें, तो हर किसी ने कभी न कभी या लगातार पंजाबी भाषा के तराने में खुद को ढूंढा है। पंजाबी मात्र भाषा नहीं, बल्कि उन पांच दरियाओं की खुशबू है, जिनमें से चार (चिनाब, रावी, सतलुज व ब्यास) हिमाचल से निकलती हैं। हमारे आसपास घूमता इतिहास और हिमाचल निर्माण से पुनर्गठन तक के भाषायी समीकरणों में उभरती भौगोलिक, सांस्कृतिक व मानवजातीय समीपता ने बार-बार मातृभाषा में अस्तित्व को अहमियत दी है। आप चाहें तो भी सिख इतिहास के पन्नों से हिमाचल के एक बड़े भू-भाग को अछूता नहीं रख सकते, फिर उन नगरियों पर गौर करें जो नए हिमाचल में पांवटा साहिब, ऊना साहिब, मणिकरण, नादौन या रिवालसर के नाम से हमारी विरासत का सिर ऊंचा करती हैं। इतना ही नहीं, आनंदपुर साहिब के बिल्कुल नजदीक नयनादेवी का रिश्ता मात्र हिंदू-सिख परंपराओं का दस्तावेज नहीं, बल्कि भाषायी संगम का स्थापित प्रमाण भी है। जिन्हें शक है कि हिमाचली भाषा का सबसे बड़ा ऊर्जा स्रोत पंजाबी नहीं हो सकती, वे आनंदपुर साहिब और नयनादेवी के बीच पंजाब और हिमाचल के बीच भाषा और संस्कृति को अलग करके दिखाएं। ऊना, कांगड़ा, बिलासपुर, सोलन, मंडी व हमीरपुर के कुछ भागों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक व भाषायी विरासत से पंजाबी को अलग करना नामुमकिन है। इसीलिए पंजाब विश्वविद्यालय ने भाषायी वर्गीकरण में डोगरी और कांगड़ी को पंजाबी भाषा की बोलियां माना है, जबकि मंडी, चंबा, बिलासपुर, ऊना व सोलन की बोलियों को इसके नजदीकी सांस्कृतिक जुबान से जोड़ा है। हिमाचल के इन्हीं इलाकों के बाशिंदे आसानी से पंजाबी से जुड़ जाते हैं, जबकि कोई भी पंजाबी भाषी हिमाचल में आकर इन क्षेत्रों की बोलियों में अपनी मातृभाषा की मिठास महसूस करता है। डोगरी व पहाड़ी गीत-संगीत तथा सिख धर्म के प्रभाव के कारण हिमाचल के भाषायी संस्कार अपनी पैरवी करते हैं। भाषायी स्रोतों की तलाश में पूर्वी-पश्चिम इंडो-आर्यन प्रभाव का रेखांकन अगर पाकिस्तान तक समझा जाए, तो वहां भी पहाड़ी, डोगरी व पोथवारी में हिमाचली भाषा के स्वतंत्र उदय की वजह व शाखाएं जुड़ती हैं। जिस तरह पूर्वोत्तर के सात राज्यों ने लगभग दो सौ बोलियों व सांस्कृतिक विविधता के बावजूद अपने आसपास की बंगाली भाषा से अपनी भाषायी अस्मिता को विकसित किया, ठीक उसी तरह हिमाचल को पंजाबी भाषा के रास्ते बिखरे भाषायी अस्तित्व को जोड़ना चाहिए। हिमाचली भाषा के जरिए अगर बोलियों की क्षमता का मूल्यांकन नहीं होगा, तो यह दायरा सिमटता जाएगा। फिलवक्त हिमाचल की सात बोलियां खत्म होने के कगार पर हैं और अगर मानव विकास व मातृभाषा से परंपरा की धरोहर को संरक्षण नहीं मिला, तो भविष्य में न स्थानीय भाषा और न ही संस्कृति बचेगी। हिमाचल को दूसरी भाषा के रूप में संस्कृत को थोपना बचपन से आत्मविश्वास व योग्यता को छीनने जैसा है। क्या हिमाचली भाषा के प्रश्न पर हिमाचल के लेखक-साहित्यकार ईमानदार रहे या किसी में इतनी हिम्मत है कि मातृभाषा के लिए संस्कृत के दर्जे पर अंगुली उठाए। अंत में बस इतना ही:

अपनी जुबान पर फख्र कर,

जाहिलों की कतार है सब्र कर।

लेखकों से

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-फीचर प्रभारी

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