Saturday, September 26, 2020 07:25 AM

हिमालयी नदियां और जल नीति : कुलभूषण उपमन्यु, अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान

कुलभूषण उपमन्यु

अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान

भारतवर्ष में अधिकांश बड़ी नदियां हिमालय से ही निकलती हैं। हर नदी घाटी की समस्याएं और नदी का व्यवहार अलग-अलग है, हर नदी घाटी पर आबादी का दबाव भी अलग-अलग है। इसलिए राष्ट्रीय नीति के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर भी नदी घाटी, जलागम, उप और सूक्ष्म जलागम तक योजना बनाने की जरूरत है। वर्तमान में परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के प्रावधानों को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। इस तरह की आशंकाओं के निराकरण के प्रावधान नीति प्रारूप में ही डाले जाने चाहिए…

आजकल नई जल नीति के निर्माण का काम चल रहा है। 1987 में नई जल नीति बनाई गई थी। 2002 और 2012 में इसकी पुनर्समीक्षा करके इसमें समय की जरूरतों के अनुसार सुधार किए गए। नीति आयोग के अनुसार वर्तमान में 2012 के मुकाबले पानी की मांग के आकार-प्रकार में बहुत बदलाव आ चुका है, इसलिए वर्तमान नीति में बदलाव की जरूरत आ गई है। पेयजल की मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर आ चुका है। 2030 तक समस्या विकराल रूप धारण कर सकती है, इसलिए आज जरूरी कदम उठाने होंगे। 1987 की जलनीति राष्ट्रीय दृष्टिकोण से बनी थी, 2012 में स्थानीय, क्षेत्रीय, राज्यीय और राष्ट्रीय दृष्टिकोण को समन्वित करने के प्रयास हुए। सभी जल संसाधन संबंधी परियोजनाओं को बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं के रूप में विकसित किया गया। 2002 में पारिस्थितिकीय दृष्टि से न्यूनतम प्रवाह नदियों में छोड़ने को सुनिश्चित करने के प्रावधान किए गए। इसी तरह भूजल दोहन को भूजल भरण की सीमा के अंदर नियमित करने का प्रावधान 1987 में किया गया, 2002 में इसमें समता की बात जोड़ी गई। 2012 तक भूजल स्तर में गिरावट के लक्षण प्रकट होने लग पड़े, इसलिए अति दोहन से भूजल स्तर में भारी गिरावट वाले क्षेत्रों में इस क्रम को काबू करने के लिए सुधरी तकनीकों के प्रयोग, कुशल जल प्रयोग और भूजल भंडारों के सामुदायिक प्रबंधन की बात जोड़ी गई। पेयजल को प्राथमिकता दी गई। एक नदी घाटी से दूसरी  नदी घाटी में पानी ले जाने का प्रावधान हुआ।

क्षेत्रीय जरूरतों को ध्यान में रख कर ऐसा करने की बात की गई। 2012 में बुनियादी मानवीय जरूरतों, समता, सामाजिक न्याय की बात जोड़ी गई। एक नदी घाटी से दूसरी नदी घाटी में पानी की तबदीली के हर मामले में पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक प्रभावों के मूल्यांकन की बात जोड़ी गई। जल उपलब्धता व बकाया जल का अध्ययन करने, पानी के कौशलपूर्ण प्रयोग को बढ़ाने, नियमबद्ध करने, विकसित करने के लिए संस्थागत व्यवस्थाएं खड़ी करने के प्रावधान हुए। बाढ़-सूखा प्रबंधन, राहत व्यवस्थाओं के अतिरिक्त प्राकृतिक निकासों को पुनर्वासित करने की बात की गई। अब उसके सात वर्षों के बाद कई स्थितियां बदल गई हैं। अतः नई जल नीति प्रारूप में कई नई बातें जोड़ी गई हैं, जिनमें हिमालय में चश्मों का प्रबंधन, नदियों को पुनर्जीवित करना, तकनीकी नवाचारों का प्रयोग, नदी जलागम से उपजलागम तक बजट प्रबंधन, वर्तमान जल प्रबंधन की कमियों को दूर करते हुए कुशल प्रबंधन पर जोर (वर्तमान सिंचाई कुशलता 30.38 फीसदी है), प्राकृतिक और मानव निर्मित चुनौतियों पर पार पाना, जैसे कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, नदियों का सूखना, नदी प्रदूषण व गिरती जल गुणवत्ता आदि प्रमुख हैं। कमांड एरिया विकास, हर घर को नल जैसे कार्यक्रम भी चलने वाले हैं। कृषि संबंधी जलवायु विषयक जोन के आधार पर पानी उपलब्ध करवाना और उपदान पुनर्गठन आदि चिंतनीय विषय हैं। नदी घाटी और उप घाटी को प्रशासनिक या राजनीतिक इकाई के रूप में न देख कर जल-विज्ञान इकाई के रूप में नए परिप्रेक्ष्य में देखने की बात हो रही है। इसके लिए रिवर बेसिन मैनेजमेंट बिल पेश किया जाएगा। दो स्तरीय प्रबंधन ढांचा बनेगा ः गवर्निंग कौंसिल और एग्जीक्यूटिव बोर्ड। जल बंटवारे और प्राथमिकता निर्धारण संबंधी फैसले गवर्निंग कौंसिल में होंगे। सारी व्यवस्था की दिशा नदी घाटी  से उप नदी घाटी, जलागम और सूक्ष्म जलागम के आधार पर तय होगी। भूजल के मापन की व्यवस्था करके भूजल पुनर्भरण की जांच रखनी होगी। 85 से 90 फीसदी भूजल का उपयोग कृषि के लिए होता है। पुनर्भरण क्षमता से ज्यादा भूजल दोहन हो रहा है।

शहरों में भी यही स्थिति है। जल की कमी वाले और जल की अधिकता वाले इलाकों में संतुलन बनाने के लिए नदियों को जोड़ने की योजना है। इस तरह एक नदी घाटी से दूसरी नदी घाटी में पानी परिवर्तित किया जा सकेगा। बहुत से अच्छे प्रावधानों के साथ यह मामला काफी उलझा हुआ है। छोटी-मोटी नदी जोड़ योजनाएं तो पहले भी बनी  हैं, उनकी समस्याएं आज तक निपट नहीं पाई हैं, बड़े पैमाने पर नदी जोड़ कार्यक्रम कई परेशानियां भी लाएगा। इस दिशा पर संभल कर ही चलना होगा। सबसे बड़ी समस्या तो बड़े पैमाने पर विस्थापन की होगी। विस्थापन के दंश से देश अभी जूझ रहा है। भाखड़ा-पौंग के मामले ही अभी तक अनसुलझे पड़े हैं। अंतरराज्यीय टकराव और मुकद्दमेबाजियां चल रही हैं। हिमाचल का भाखड़ा और पौंग बांधों में आर्थिक हिस्से का भुगतान पंजाब ने उच्चत्तम न्यायालय के हिमाचल के हक में फैसला होने के बावजूद नहीं किया है। भारतवर्ष में अधिकांश बड़ी नदियां हिमालय से ही निकलती हैं। हर नदी घाटी की समस्याएं और नदी का व्यवहार अलग-अलग है, हर नदी घाटी पर आबादी का दबाव भी अलग-अलग है। इसलिए राष्ट्रीय नीति के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर भी नदी घाटी, जलागम, उप और सूक्ष्म जलागम तक योजना बनाने की जरूरत है। वर्तमान में परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के प्रावधानों को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। इस तरह की आशंकाओं के निराकरण के प्रावधान नीति प्रारूप में ही  डाले जाने चाहिए। देश और समाजहित के अच्छे सुझाव लेने-देने के क्रम को मजबूत करना चाहिए।

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