Friday, September 25, 2020 08:35 AM

हिमाचल के बाल साहित्यकारऔर उनका लेखन

पवन चौहान, मो.-9418582242

बाल साहित्य वह साहित्य है जो बच्चों में संस्कारों, उम्मीदों, सपनों, जज्बातों, जीवन मूल्यों की बुनियाद को पक्का करता है। बाल साहित्य का जन्म तब हुआ जब कोई बच्चा इस दुनिया में आया। आते ही उसने अपने तोतलेपन में कुछ कहा होगा। फिर कुछ बोलना, समझना सीखा होगा। उसके कई प्रश्न रहे होंगे और जिनका जवाब देने के लिए बड़े-बुजुर्ग जैसे तैयार बैठे थे। दुनिया के किसी भी कोने में, किसी भी भाषा को लिपिबद्ध होने में निश्चय ही काफी अरसा बीता है। तो यह तय है कि बाल साहित्य सबसे पहले मौखिक रूप में ही आया जिसने बच्चे को दुनिया के कई अनुभवों को उसके बालमन की तसल्ली के अनुसार समझाने में बेहतर भूमिका अदा की है।

उस समय की सामाजिक स्थिति, वातावरण, माहौल, उद्देश्य के अनुसार कई कहानियां, कविताएं, गीत, किस्से आदि बने होंगे। जब बच्चा एक ही तरह की बात को सुन-सुनकर थक गया होगा तो उसकी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए बड़ों ने नए से नए किस्से, कहानियों, गीतों को ईजाद किया होगा। यह निरंतर प्रक्रिया रही जो अपने-अपने समयानुसार बच्चों के मनोरंजन के लिए तय होती रही। यह आज भी बदस्तूर जारी है। यदि हम विश्व से भारत, और भारत से एक पहाड़ी प्रदेश हिमाचल की बात करें तो यहां भी संभवतः उसी समय से बाल साहित्य मौखिक या लिखित रूप में रचता और बनता आया है। यहां पर भी हर समय अंतराल में बाल साहित्य लेखन बराबर हुआ है। बेशक, हिमाचल के बाल साहित्य व बाल साहित्यकारों की जानकारी को समग्र रूप से कभी किसी पुस्तक या अन्य किसी तरीके से आज तक संजोकर नहीं रखा गया है जिस कारण जब भी इस विषय पर बात होती है तो कई नाम ऐसे छूट जाते हैं जिन्होंने चुपचाप रहकर अपना बाल साहित्य सृजन किया है और काफी पहले उनकी पुस्तकें तक प्रकाशित हो चुकी हैं।

इस आलेख में हिमाचल के सभी बाल साहित्यकारों और उनका बाल साहित्य के प्रति समर्पण को हर प्रकार से प्रस्तुत करने की पूरी कोशिश की गई है। बाकी, यदि कोई जानकारी बाल साहित्यकार की अनजाने में छूट गई हो तो उसे भविष्य में जोड़ने का हमेशा स्वागत रहेगा। इस आलेख में साहित्यकारों को तीन श्रेणियों- वरिष्ठ बाल साहित्यकार, महिला बाल साहित्यकार और युवा बाल साहित्यकार में विभक्त कर हिमाचल के बाल साहित्य पर बात करने की कोशिश की है।

वरिष्ठ बाल साहित्यकार

हिमाचल के लिखित बाल साहित्य की नींव रखने वाले दो नामों पंडित संतराम वत्स्य और मस्तराम कपूर का विशेष उल्लेख करना जरूरी है। इन दोनों साहित्यकारों ने प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य रचकर हिमाचल में बाल साहित्य की जड़ें स्थापित की हैं। संतराम वत्स्य जी का लेखन क्षेत्र मुख्यतः बाल साहित्य रहा है।

‘बालमित्र’, ‘ज्ञान-विज्ञान माला’ के अंतर्गत 15 पुस्तकें तथा ‘अच्छी कहानियां’, ‘बचपन की कहानियां’, ‘बड़ों का बचपन’, ‘बालकथा सरोवर-3’, बालकथा सरोवर-4’, ‘बंदर और मगरमच्छ’, ‘भिखारी राजकुमार’, ‘उड़ने वाला गलीचा’, ‘चिडि़या के मोती’, ‘चरित्र निर्माण की कहानियां’ आदि के साथ बोध कथाएं, पौराणिक कथाएं, निबंध, मानव धर्म की कहानियां, चरित्र निर्माण की कहानियां, हिमाचल की लोक कथाएं, राजा भोज, सामाजिक ज्ञान, जीवन माला आदि सभी विधाओं की लगभग 150 पुस्तकें हैं।

अपनी रचनाओं के जरिए वत्स्य जी पशु-पक्षी, पर्यावरण, हमारे लोक के साथ परी कथाओं, देवता-राक्षस व कल्पनाओं से भरी कहानियां की बात बहुत ही आसान और रोचक भाषा में करते हैं। हिमाचल के बाल साहित्य के दूसरे नींवकार हैं डा. मस्तराम कपूर। 1951 में लेखन की शुरुआत करने वाले डा. मस्तराम कपूर जी ने लेखन की शुरुआत बाल साहित्य लेखन से की और प्रचुर मात्रा में बाल लेखन किया।

इनकी बाल कहानी की 13 पुस्तकें (‘मुंह मांगा ईनाम’, ‘निर्भयता का वरदान’, ‘दंड का पुरस्कार’, ‘बेजुबान साथी’ से लेकर ‘एक थी चिडि़या’ (चित्रकथा) आदि), 4 बाल उपन्यास (‘नीरु और हीरु’, ‘सपेरे की लड़की’, ‘भूतनाथ’, ‘सुनहरा मेमना’), 5 बाल नाटक संग्रह (‘स्पर्द्धा, संपूर्ण नाटक)’, ‘बच्चों के नाटक’, ‘पांच बाल एकांकी’, ‘पांच बाल नाटक’, ‘पांच उपन्यास पंद्रह नाटक’) के साथ प्रौढ़ साहित्य में कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, अनुवाद (चिडि़या घर, एशिया के बाल नाटक (नाटकों के देश में)), पत्रकारिता, संपादन, राजनीतिक-सामाजिक विमर्श आदि विधाओं में 100 से अधिक पुस्तकें  प्रकाशित हुईं।

अपनी रचनाओं में बाल मनोविज्ञान को मस्तराम जी ने बड़ी गहराई से पकड़ा है। इन्होंने बाल पत्रिकाओं यथा ‘दिल्ली’, ‘बच्चे और हम’ आदि का संपादन भी किया। इसके अलावा डा. कपूर जी ने बाल साहित्य में उस समय पीएचडी की, जब इस ओर किसी का ज्यादा ध्यान नहीं था। उन्होंने इसे सरदार पटेल विश्वविद्यालय गुजरात से पूर्ण किया जिसका विषय था ‘बाल साहित्य का विवेचनात्मक अध्ययन’। इसका प्रकाशन इनकी मृत्यु के पश्चात वर्ष 2015 में हुआ।

-क्रमशः

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