हिमाचल को पहचान दिलाने वाले डा. परमार : जीवन धीमान लेखक, नालागढ़ से हैं

डा. यशवंत सिंह परमार ने प्रदेश का इतिहास ही नहीं, भूगोल भी बदल कर रख दिया था। उनकी जयंती चार अगस्त को मनाई जाती है। वह हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के गठन में उनका अहम योगदान रहा। उन्हें हिमाचल का निर्माता भी कहा जाता है। डा. यशवंत सिंह परमार का जन्म हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिला के एक छोटे से गांव चनालग में 4 अगस्त 1906 को हुआ था। डा. परमार के प्रयासों से ही 5 अप्रैल 1948 को 30 रियासतों के विलय के बाद हिमाचल प्रदेश बन पाया और 25 जनवरी 1971 को इस प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। \

वह 1952 से 1956 तक हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद 1963 से 24 जनवरी 1977 तक भी वह हिमाचल के मुख्यमंत्री पद पर कार्य करते रहे। पहाड़ों के प्रति डा. यशवंत सिंह परमार का यह प्यार था कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए प्रदेश में लैंड एंड टेनेंसी एक्ट लागू कर धारा 118 लगा दी। इस कानून के बनने से हिमाचल में जमीन की खरीद पर लगाम लगी। डाक्टरेट की उपाधि होने के बावजूद वह अनपढ़ ग्रामीणों के साथ बैठकर योजनाएं बनाते थे। परमार के पहनावे में ठेठ पहाड़ी कमीज, बास्केट, सिरमौरी पायजामा और सर्दियों में लोइया शामिल होता था। उन्होंने कई पुस्तकें लिखकर अपनी पहचान बनाई हुई थी। हिमाचल प्रदेश एरिया एंड लेंगुएजिज नामक शोध आधारित पुस्तकें भी लिखी। डा. परमार 2 मई 1981 को स्वर्ग सिधार गए। यशवंत सिंह परमार की ईमानदारी व पाक राजनीतिक जीवन का इससे बड़ा प्रमाण नहीं होगा कि अपने अंतिम समय में भी उनके बैंक खाते में 563 रुपए थे।

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