Tuesday, June 15, 2021 12:20 PM

Himachal News : कांगड़ा के भंगवार गांव में ‘मां’ नहीं ‘मानवता’ की चिता जली

महिला की मौत पर रिश्तेदारों की बेरुखी, पंचायत-प्रशासन की लापरवाही और गांववासियों की बेदर्दी ने किया शर्मसार

हैडक्वार्टर ब्यूरो – कांगड़ा

‘वैराग्य’ की ये पंक्तियां देखिए कितनी सटीक हैंः मानवता आज लज्जित है, भरोसे ने साथ छोड़ा है, छल से फल दे, आज मानव ने मानवता को तोड़ा है।

सचमुच, कांगड़ा उपमंडल की भंगवार पंचायत के भंगवार गांव में मानवता लज्जित हुई है, मानवता रोई है और उसकी चिता जली है। और यह कारनामा किसी अबोध, अनजान या दरिंदे का नहीं, बल्कि ‘सभ्य और भद्र’ समाज ने किया है। रानीताल के साथ लगती भंगवार पंचायत में कोरोना संक्रमित एक 72 वर्षीय महिला की मौत गुरुवार साढ़े चार बजे हो जाती है। अभागी महिला का बेटा पंचायत, आस-पड़ोस और रिश्तेदारों को सूचना देता है। तीन सगे रिश्तेदार और गांव वाले अंतिम संस्कार में भाग लेने की पुष्टि करते हैं। पर धीरे-धीरे, एक-एक कर सभी पीछा छुड़ाते हैं। प्रशासन औपचारिकता के लिए छह पीपीई किट पहुंचाता है। रिश्तेदार आने से मना कर देते हैं और गांव वाले चिता के लिए लकडि़यों का प्रबंध कर इतिश्री कर लेते हैं। अब बारी है अर्थी को कंधा देने की।

न मित्र, न भाई, न आस, न पड़ोस…। बेटा पीपीई किट पहनता है…मां को पहनाता है…शव को अकेला कंधे पर उठाता है और पत्नी और डेढ़ साल के अपने मासूम बच्चे के साथ श्मशानघाट को निकल पड़ता है। वह ‘मां’ की ममता की ताकत थी, जो अकेला बेटा शव को श्मशानघाट तक पहुंचाने में सफल हो गया, अन्यथा अर्थी तो चार कंधों को भी थका देती है। अभागी मां के जिंदादिल बेटे वीरी सिंह की हिम्मत की आज सारी दुनिया दाद दे रही है। वह पूछ रही है कि यह कैसा समाज, यह कैसी सभ्यता, ये कैसे संस्कार, यह कैसा प्रशासन और यह कैसी सरकार। वह पूछ रही है कि इस बीमारी से शारीरिक संक्रमण हो रहा है या मानसिक दिवालियापन? अगर इनसानियत ही मर गई, तो जिंदा रहने का क्या फायदा। हालांकि गांववासियों का कहना है कि पीडि़त परिवार ने आश्वस्त किया था कि अंतिम संस्कार के लिए पर्याप्त लोग हैं। बाद में वे सभी साथ देने से मुकर गए।

गुलेर में भी ऐसा ही हुआ है

भटेहड़ बासा। ऐसा ही वाकया देहरा क्षेत्र के गुलेर में भी हुआ है। यहां एक 50 वर्षीय महिला कोरोना पॉजिटिव थी और होम आइसोलेटेड थी। 13 मई को महिला की तबीयत खराब हुई, लेकिन अस्पताल ले जाने को एंबुलेंस नहीं मिली। घर वाले उसे निजी गाड़ी में कांगड़ा के एक कोविड अस्पताल में ले गए, जहां पर उसकी मौत हो गई। शव को लाने के लिए भी एंबुलेंस नहीं मिली। अंतिम संस्कार के जो चार पीपीई किट दी गई, उसमें एक खराब निकली। ऐसे में एक युवक ने बिना पीपीई किट के ही कंधा दिया।

क्या कहते हैं एसडीएम साहब

कांगड़ा। एसडीएम कांगड़ा अभिषेक वर्मा का पक्ष थोड़ा अलग है। वह कहते हैं कि स्वास्थ्य विभाग और पंचायत ने इसकी कोई सूचना प्रशासन को नहीं दी थी। नतीजतन प्रशासन को इसकी कोई भनक न लगी और जल्दबाजी में यह काम हुआ। एसडीएम अभिषेक वर्मा ने बताते हैं कि वह उस परिवार के घर गए थे और परिवार के सदस्यों के कोविड टेस्ट लिए गए हैं, जो कि नेगेटिव आए हैं। वह कहते हैं कि महिला की मौत से पहले उनके रिश्तेदार घर में आए हुए थे। मृतका के बेटे ने अपने तीनों जीजों को कंधा देने के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया और जल्दबाजी में वह शव को कंधे पर उठाकर श्मशान घाट ले गया। चिता का बंदोबस्त पहले ही कर दिया गया था। वह कहते हैं कि  छह पीपीई किट अंतिम संस्कार करवाने वालों के लिए उपलब्ध करवाई गई थीं। बावजूद इसके रीति रिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार न होना मानवता को शर्मसार करता है।

होम आइसोलेशन में नहीं है कोई पूछ

सरकार और स्वास्थ्य विभाग को इस समय होम आइसोलेशन में रखे गए मरीजों की तरफ ज्यादा ध्यान देना होगा। अब तक जो भी रिपोर्ट्स हैं, वे सरकार और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर रही है। ‘दिव्य हिमाचल’ के पास ऐसे कई फोन आ रहे हैं, जहां घरों में रह रहे कोविड मरीज परेशानियों से जूझ रहे हैं।