Tuesday, April 13, 2021 09:59 AM

चमोली की त्रासदी से सबक ले हिमाचल

निश्चित रूप से मैकेंजी की बदलते हुए वैश्विक रोजगार से संबंधित रिपोर्ट के मद्देनजर देश में डिजिटल रोजगार के मौकों को बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर डिजिटल रोजगार के मौकों को बड़ी संख्या में प्राप्त करने के लिए अभी से ही रणनीतिक कदम उठाए जाने जरूरी हैं। तभी नए अवसर नई पीढ़ी की मुट्ठियों में आ सकेंगे...

हाल ही में 18 फरवरी को वैश्विक रोजगार पर मैकेंजी के द्वारा प्रकाशित की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक दुनियाभर में डिजिटल दौर के कारण करीब 10 करोड़ लोगों को अपने रोजगार को बदलना पड़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन, फ्रांस, भारत, जर्मनी, स्पेन, यूके और यूएस में हर 16 में से एक कर्मचारी को इस बदलाव से गुजरना पड़ेगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उच्च डिजिटल कौशल वाले रोजगारों की मांग बढ़ेगी और परंपरागत रोजगारों की उपलब्धता में कमी आएगी। निःसंदेह कोविड-19 के बाद अब देश और दुनिया में रोजगार परिदृश्य पर बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा है। ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के चलते जहां कई क्षेत्रों में रोज़गार कम हो रहे हैं, वहीं डिजिटल अर्थव्यवस्था में रोजगार बढ़ रहे हैं। जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था डिजिटल होती जा रही है, वैसे-वैसे अब एक ओर कई रोजगार ऐसे भी दिख रहे हैं जिनके नाम पहले सुने भी नहीं गए हैं। वहीं दूसरी ओर रोजगार के लिए लगातार नए-नए स्किल्स सीखना जरूरी होता जा रहा है।

इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि कोरोना वायरस से पूरी तरह बदली हुई नई आर्थिक दुनिया में भारत की उच्च कौशल प्रशिक्षित नई पीढ़ी की अभूतपूर्व रोजगार भूमिका निर्मित होते हुए दिखाई दे रही है। दुनिया के कई शोध संगठनों के द्वारा यह कहा जा रहा है कि डिजिटलीकरण से भारत में रोजगार के नए मौके तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। वस्तुतः कोविड-19 ने नए डिजिटल अवसर पैदा किए हैं क्योंकि देश और दुनिया की ज्यादातर कारोबार गतिविधियां अब ऑनलाइन हो गई हैं। वर्क फ्रॉम होम (डब्ल्यूएफएच) करने की प्रवृत्ति को व्यापक तौर पर स्वीकार्यता से आउटसोर्सिंग को बढ़ावा मिला है। कोरोना की चुनौतियों के बीच भारत के आईटी सेक्टर के द्वारा समय पर दी गई गुणवत्तापूर्ण सेवाओं से वैश्विक उद्योग-कारोबार इकाइयों का भारत की आईटी कंपनियों पर भरोसा बढ़ा है। अब आने वाले वर्षों में आईटी और कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) की बढ़ती उपयोगिता के कारण उच्च आईटी कौशल प्रशिक्षित भारत की नई पीढ़ी को देश और दुनिया में चमकीले मौके मिलने की संभावना रहेगी। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अभी भी दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को संभालने में भारत की कौशल प्रशिक्षित नई पीढ़ी प्रभावी भूमिका निभा रही है। अब नए डिजिटल दौर में भारत के पेशेवरों की भूमिका और महत्त्वपूर्ण होगी तथा दुनिया के कई देशों के द्वारा उनके उद्योग-कारोबार में भारतीय पेशेवरों को सहभागी बनाया जाना आर्थिक रूप से लाभप्रद माना जाएगा। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि अमरीका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन के सत्ता में आने के बाद भारत के आईटी सेक्टर के तेजी से बढ़ने की संभावनाएं बढ़ी हैं। जो बाइडेन ने नए राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद तीन फरवरी को एच-1बी वीजा नीति को जारी रखने की बात कही है। इससे भारतीय कुशल कर्मचारियों को वीजा नियमों के स्तर पर राहत मिली है। राष्ट्रपति जो बाइडेन अमरीका की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए भारत की आईटी सेवाओं का अधिक उपयोग लेना चाहेंगे। इसी परिप्रेक्ष्य में हाल ही में अमरीका में बाइडेन प्रशासन ने संसद में महत्त्वाकांक्षी अमरीका नागरिकता विधेयक 2021 पेश किया है। इसके कानून बनने के बाद एच-1बी वीजा धारकों के आश्रितों को भी काम करने की अनुमति मिलेगी। विधेयक में रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए किसी देश के प्रवासियों की संख्या सीमित करने पर पूर्व में लगाई गई रोक को भी खत्म करने का प्रावधान है। इस कानून के बनने से लाखों भारतीय आईटी पेशेवरों और उनके परिवारों को फायदा होगा। इस विधेयक के पारित हो जाने से ग्रीन कार्ड के लिए 10 साल से अधिक समय से इंतजार कर रहे लोगों को भी तत्काल वैध तरीके से देश में स्थायी निवास की अनुमति मिल जाएगी क्योंकि उन्हें वीजा की शर्त से छूट मिल जाएगी।

 न केवल अमरीका में वरन् जापान, ब्रिटेन और जर्मनी सहित दुनिया के विभिन्न देशों में औद्योगिक और कारोबार आवश्यकताओं में तकनीक और नवाचार का इस्तेमाल तेज होने की वजह से आईटी के साथ ही कई अन्य क्षेत्रों में मसलन हेल्थकेयर, नर्सिंग, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रानिक्स, फूड प्रोसेसिंग, जहाज निर्माण, विमानन, कृषि, अनुसंधान, विकास, सेवा व वित्त आदि क्षेत्रों में कौशल प्रशिक्षित भारतीय कार्यबल की भारी मांग बनी हुई है। ऐसे में रोजगार की बदलती हुई डिजिटल दुनिया में भारत पूरी तरह से लाभ की स्थिति में है। लेकिन स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अभी सीमित संख्या में ही भारत की कौशल प्रशिक्षित प्रतिभाएं डिजिटल अर्थव्यवस्था की रोजगार जरूरतों को पूरा कर पा रही हैं। अब दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाले भारत को बड़ी संख्या में युवाओं को डिजिटल दौर की और नई तकनीकी रोजगार योग्यताओं के साथ अच्छी अंग्रेजी, कम्प्यूटर दक्षता तथा कम्युनिकेशन स्किल्स की योग्यताओं से सुसज्जित करना होगा। चूंकि मशीनें अब मनुष्यों से ज्यादा स्मार्ट हो रही हैं और कार्यक्षेत्र में मनुष्य का स्थान ले रही हैं, ऐसे में नई पीढ़ी को मशीनों का मैनेजमेंट सीखने और वह कार्य करने की जरूरत है जो मशीनें नहीं कर सकती हैं। इसके लिए त्वरित निर्णय लेने एवं सॉफ्ट स्किल्स को विकसित किया जाना होगा तथा भविष्य में नैतिक मूल्य रचनात्मकता व समग्र दृष्टिकोण को कार्य का प्रभावी अंग बनाया जाना होगा। अब नए डिजिटल रोजगारों के लिए आवश्यक बुनियादी जरूरतों संबंधी कमियों को दूर करना होगा। चूंकि देश की ग्रामीण आबादी का एक बड़ा भाग अभी भी डिजिटल रूप से अशिक्षित है, अतएव डिजिटल भाषा से ग्रामीणों को सरलतापूर्वक शिक्षित-प्रशिक्षित करना होगा। चूंकि बिजली डिजिटल अर्थव्यवस्था की महत्त्वपूर्ण जरूरत है, अतएव ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की पर्याप्त पहुंच बनाई जाना जरूरी है। निःसंदेह नई शिक्षा नीति में डिजिटल दुनिया के नए दौर के कौशल विकास पर काफी जोर दिया गया है।

 ऐसे में उसके प्रभावी क्रियान्वयन से डिजिटल अर्थव्यवस्था में रोजगार के मौके बढ़ाए जा सकेंगे। अब कृषि, स्वास्थ्य और वेलनेस, टेलीमेडिसिन, शिक्षा और कौशल विकास जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रियता से टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस बनाए जाने होंगे। अब देश के डिजिटल सेक्टर को यह रणनीति बनाना होगी कि किस तरह के काम दूर स्थानों से किए जा सकते हैं और कौन से काम कार्यालय में आकर किए जा सकते हैं। अब देश के डिजिटल रोजगार अवसरों को महानगरों की सीमाओं के बाहर छोटे शहरों और कस्बों में गहराई तक ले जाने की जरूरत को ध्यान में रखा जाना होगा। अब भारत के स्टार्टअप के संस्थापकों को आईटी से संबंधित वैश्विक स्तर के उत्पाद बनाने पर ध्यान देना होगा, जिससे तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में देश की जगह बनाई जा सकेगी। निश्चित रूप से मैकेंजी की बदलते हुए वैश्विक रोजगार से संबंधित रिपोर्ट के मद्देनजर देश में डिजिटल रोजगार के मौकों को बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर डिजिटल रोजगार के मौकों को बड़ी संख्या में प्राप्त करने के लिए अभी से ही रणनीतिक कदम उठाए जाने जरूरी हैं। ऐसा करने पर ही देश और दुनिया के नए डिजिटल रोजगार के मौके बड़ी संख्या में नई पीढ़ी की मुठ्ठियों में आ सकेंगे। इससे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी और 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनते हुए दिखाई दे सकेगी।

बारिशें बेमौसमी होने की वजह से ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ोतरी सभी के लिए परेशानी का सबब बन रही है। जंगलों की ज़मीन अवैध निर्माण की वजह से दिनोंदिन घटती जा रही है। राजनीतिक पहुंच रखने वालों ने सरकारी ज़मीनों पर आवासीय मकान सहित रेस्टोरेंट और होटल बनाकर सरकारी नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं। बरसात के दिनों में इंद्र देवता हमेशा अपना रौद्र रूप दिखाते हैं, मगर स्वार्थी लोगों के दिलों से भगवान का भय तक खत्म हो चुका है। खड्डों और नालों में पानी बहाव वाली जगहों पर लोगों द्वारा अवैध निर्माण किए जाने से बरसात प्रत्येक वर्ष जानलेवा बनती जा रही है। सरकारें अवैध निर्माण हटाने की बातें करती हैं, मगर रसूखदार लोगों के खिलाफ  प्रशासन कार्रवाई नहीं करता...

उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर फटने से मची तबाही से पूरे विश्व को सबक लेने की ज़रूरत है। यह त्रासदी हिमाचल प्रदेश के लोगों पर भी भारी पड़ी है। इससे पूर्व केरल व तमिलनाडु में भी प्राकृतिक आपदा के कहर से खूब जान-माल की हानि हो चुकी है, मगर इसके बावजूद हम लोगों ने प्रकृति से छेड़छाड़ किए जाने की अपनी आदत नहीं छोड़ी है। नतीजा चमोली त्रासदी के रूप में देखा जा सकता है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए आम जनमानस को अब तैयार रहना होगा। चमोली हादसे के मलबे में दबे लोगों की तलाश अभी चल ही रही है कि इस बीच जिला मंडी के सराज में ठीक ऐसी ही घटना की पुनरावृत्ति ने दिल को दहला दिया है। पहाड़ किस कदर घातक बन रहे हैं, इस हादसे से जरूर सीख लेनी होगी। नीचे सड़क पर एक जीप में सवार होकर लोग गुजर रहे थे कि इस बीच ऊपर की पहाड़ी से अचानक मलबा उनकी गाड़ी पर गिरने से वे नीचे गहरी खाई में जाकर गिरे। इस दर्दनाक हादसे में तीन लोगों की मौके पर मौत हो चुकी है और अन्यों को स्थानीय प्रशासन और लोगों की मदद से अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। बढ़ती जनसंख्या के चलते अब विकास की गति भी उतनी ही जरूरी है जितनी प्रकृति की सुरक्षा करना। यह सभी की जिम्मेदारी बनती है। हिमाचल प्रदेश में सड़क विस्तारीकरण नियमों को ताक पर रखकर किया जा रहा है जिसके चलते ऐसी प्राकृतिक घटनाओं में वृद्धि हो रही है।

हरे पेड़ों को काटकर जंगल के बीचोंबीच सड़क विस्तारीकरण का काम चल रहा है। सड़क निर्माण कार्यों में जुटे कर्मचारी स्वयं अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं करते तो आम जनमानस की आखिर कौन सोचे, आज बड़ा सवाल है। जंगलों को जेसीबी मशीनों से काटकर पहाड़ों के अस्तित्व को हिलाने की कोशिश की जा रही है। नतीजतन मामूली बारिश पड़ने पर जंगल का मलबा सड़कों पर गिरकर सदैव यातायात को अवरुद्ध करके राहगीरों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। सड़क निर्माण सुरक्षायुक्त बने और जंगलों का अस्तित्व भी बरकाकर रहे, आज यह सोचना होगा। जंगलों में इस कदर कुल्हाड़ी चली कि अब ज्यादातर खरपतवार के पौधे ही नजर आने लगे हैं। प्रत्येक वर्ष बेशक पौधारोपण के नाम पर सरकारें करोड़ों रुपए खर्च करके वाहवाही लूटती रहें, मगर सच्चाई किसी से छुपी नहीं है। जंगलों में मौजूद पेड़ बड़े पहाड़ों को अपनी जड़ों से जकड़कर रखते थे जिसकी वजह से पहले कोई भूस्खलन की घटनाएं घटित नहीं होती थी। एक तो जंगलों में पेड़ रहे नहीं जिसकी वजह से पहाड़ बिल्कुल हिलकर रह चुके हैं। वहीं सड़क निर्माण कार्यों में जंगलों को जेसीबी मशीनों से काटना भी सुरक्षा लिहाज से ठीक नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में बनने वाली सड़कों के किनारे पक्के डंगे बनाए जाने से ही भूस्खलन की रोकथाम कुछ हद तक की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अब हिमाचल प्रदेश में अवरुद्ध पड़ी परियोजनाओं के कार्यों को हरी झंडी दिखा दी है। अगर समय रहते अब भी सुरक्षा को पहल नहीं दी गई तो इसका खामियाजा भी जनता को भुगतने के लिए कमर कसनी होगी। जंगलों में पानी के चैकडैम बनाकर भी विकास कार्य गिनाए जाने के दावे किए जा रहे हैं। क्या इस तरह के निर्माण कार्य किए जाने से जंगलों का अस्तित्व चिरकाल तक रह सकता है, कोई सोचने को तैयार नहीं है। सच्चाई यह भी कि अब विश्वस्तर पर ही मौसम में जमीन-आसमान का बदलाव आ रहा है।

बारिशें बेमौसमी होने की वजह से ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ोतरी सभी के लिए परेशानी का सबब बन रही है। जंगलों की ज़मीन अवैध निर्माण की वजह से दिनोंदिन घटती जा रही है। राजनीतिक पहुंच रखने वालों ने सरकारी ज़मीनों पर आवासीय मकान सहित रेस्टोरेंट और होटल बनाकर सरकारी नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं। बरसात के दिनों में इंद्र देवता हमेशा अपना रौद्र रूप दिखाते हैं, मगर स्वार्थी लोगों के दिलों से भगवान का भय तक खत्म हो चुका है। खड्डों और नालों में पानी बहाव वाली जगहों पर लोगों द्वारा अवैध निर्माण किए जाने से बरसात प्रत्येक वर्ष जानलेवा बनती जा रही है। सरकारें अवैध निर्माण हटाए जाने की बातें तो जरूर करती हैं, मगर  रसूखदार लोगों के खिलाफ  प्रशासन कार्रवाई करने में सफल नहीं होता है। खड्डों, नालों में अवैध खनन की वजह से जमीनों का खूब दोहन हो रहा है और जल स्रोत सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि जमीन का जल स्तर नीचे चला गया है। जेसीबी मशीनों से खड्डों व नालों का अवैध खनन किए जाने से कई फुट गहरी और लंबी खाइयां बन चुकी हैं। नतीजतन किसानों की कीमती जमीनें पानी के गलत बहाव की वजह से पानी में बहती जा रही हैं। सरकारों ने जितने जल स्रोत जनता के सुपुर्द किए, ठीक पानी की समस्या उतनी ही ज्यादा बढ़ी है। हालात इस कदर नाजुक बनते जा रहे हैं कि जल स्रोतों में पानी सूख जाने की वजह से लोगों को हर बार खासकर पानी की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सड़कों के विस्तारीकरण के साथ प्रकृति की सुरक्षा करना भी सभी की जिम्मेदारी होनी चाहिए।