Tuesday, June 15, 2021 12:48 PM

हिमाचली लोकगीतों पर शोध का प्रकाशन

पुस्तक समीक्षा

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय धर्मशाला की हिंदी विभागाध्यक्ष डा. मीनाक्षी दत्ता साहित्य प्रेमियों के लिए शोध लेकर आई हैं। इस शोध प्रकाशन का नाम है ‘मध्यकालीन कृष्ण काव्य के परिप्रेक्ष्य में हिमाचली लोकगीतों का अनुशीलन’। डा. मीनाक्षी दत्ता का कहना है कि प्रस्तुत शोध प्रबंध पर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से वर्ष 1993 में उपाधि मिलने के पश्चात इसका प्रकाशन कहीं से हो, यह उनकी निरंतर सोच रही ताकि यह शोध कार्य शोधार्थियों के लिए सहज उपलब्ध हो सके। यह प्रकाशन कई वर्षों बाद संभव हो पाया है।

यह प्रकाशन सामयिक इसलिए है कि लोकगायन की परंपरा अब धीरे-धीरे घटती जा रही है क्योंकि इस गायन के अवसर विशेष या स्थितियां रस्मी होती जा रही हैं। नई पीढ़ी (लड़कियों) को इस परंपरा को ग्रहण करने के अवसर व समय नहीं मिल रहे। वे शिक्षा तथा व्यवसाय की ओर उन्मुख होती जा रही हैं या उन्हें सुनने व स्मरण करने का अवसर नहीं पा रहीं। लोकगायन, लोकनृत्य, गोपांकन जैसी विविध गतिविधियों तथा अध्ययन-लेखन में विशेष अभिरुचि रखने वाली डा. मीनाक्षी दत्ता की इससे पहले भी कुछ रचनाएं आई हैं जिनमें ‘लोकगीतों में कृष्ण काव्य का स्वरूप’ तथा ‘हिमाचली कृष्ण काव्य’ विशेषकर उल्लेखनीय हैं। विवेच्य पुस्तक में लोकजीवन के साहित्यिक व कलात्मक अभिदर्शन को उसकी मूल संवेदना में अत्यंत प्रभावी ढंग से उद्घाटित किया गया है।

सूरदास वर्णित कृष्ण के लोकरंजक रूप तथा वात्सल्य भाव के समानांतर लोकमानस की रचनाधर्मिता, चित्रात्मक समाजशैली में वर्णित तथा विश्लेषित हुई है। सूक्ष्म अनुभूति परक अवलोकन, लोकमानस में गहरी अंतर्दृष्टि तथा पारंगत भाषा शैली कृति की ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे संग्रहणीय बनाती हैं। शोध के विषयों में विविधता भी है। लोकगीत ः स्वरूप एवं वर्गीकरण, अवतार की अवधारणा, कृष्ण कथा की परिकल्पना एवं परंपरा, भक्ति संप्रदाय का विकास, कृष्णभक्ति आंदोलन एवं उसका प्रसार, हिमाचल में कृष्णभक्ति परंपरा ः प्रभाव एवं प्रसार, हिमाचली लोकगीतों में कृष्णकथा प्रसंग तथा विवेच्य लोकगीतों का अनुशीलन ऐसे विषय हैं जिन पर चिंतन-मनन तथा व्यापक शोध हुआ है। 316 पृष्ठों का यह शोध 795 रुपए का है। पंकज पुस्तक प्रकाशन मऊ (यूपी) से प्रकाशित यह शोध शोधार्थियों व साहित्य प्रेमियों को अवश्य ही पसंद आएगा।

-राजेंद्र ठाकुर

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