Sunday, October 25, 2020 02:14 AM

हिमाचली घर के सियासी तमगे

राष्ट्रीय मुद्दों की बौखलाहट से अलग हिमाचली नागरिक समाज का राजनीतिक व्यवहार अलग तरह की गुंजाइश पैदा करता है। यह इसलिए कि हिमाचल की दो तिहाई आबादी मध्यम वर्ग को पुष्ट और प्रमाणित करती है, जबकि राष्ट्रीय स्तर यह दर लगभग पच्चीस फीसदी टिकती है। जिन तीन कृषि विधेयकों को लेकर हंगामा बरपा है, उनसे कहीं अलग हिमाचल में ऐसी कोई बेचैनी नहीं। दूसरी ओर प्रदेश का कृषक व बागबान समाज पूरी तरह मध्यम वर्ग का पात्र हो जाता है और वह इसी नजरिए से सोचता है। ऐसे में प्रदेश के राजनीतिक मजमून नागरिकों की  महत्त्वाकांक्षा से सिंचित होते हैं, न कि किसी विचारधारा के प्रति समर्थन जाहिर करते हैं। अतीत में इसका एक उदाहरण तो बाबरी विध्वंस से शहीद हुई शांता कुमार सरकार को लेकर है, जहां अयोध्या मुद्दे पर भी भाजपा की वापसी नहीं हुई थी। धीरे-धीरे नागरिक महत्त्वाकांक्षा, नागरिक सक्रियवाद तक पहुंच गई, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल हिमाचल की जनता को अपने पाले में होने की गारंटी नहीं ले सकता, बल्कि यह कहना होगा कि प्रदेश में मध्यम वर्ग की पहचान के विषय हर बार अपना मूल्य अर्जित करते हैं। हर चुनाव में सियासत के संबोधन उसी दायरे में घूमते हैं जहां मध्यम वर्ग सुशोभित है यानी सरकारी नौकरी देंगे, धारा 118 पर कोई पाप नहीं करेंगे, कर्मचारियों के साथ खड़े होंगे और विकास की कोई कमी नहीं होगी।

इससे  एक हौआ राजनीति ने जन्म लिया, जो वोट के अखाड़े में खड़े होकर ‘पवित्र गाय’ बनने की कोशिश करती है। इस कारण चुनी हुई सरकारों के प्रदर्शन से जनता के लाभ तो सुनिश्चित हैं, लेकिन राज्य का प्रदर्शन निरंतर कमजोर हो रहा है। मध्यमवर्गीय झुकाव ने इनसानी फितरत का लहजा और सरकार से पाने की आकांक्षा को इतना विस्तार दे दिया कि हर सरकार का वित्तीय ढांचा किसी आधार के बिना झूलता हुआ नजर आता है। यहां आधुनिक अर्थशास्त्र की कोई भूमिका ही दिखाई नहीं देती, बल्कि सियासी विरोध भी मध्यमवर्गीय पहचान का पिंजरा बन चुका है। प्रदेशवासियों की प्रति व्यक्ति आय, साक्षरता दर में वृद्धि, उपभोक्ता मांग में बढ़ोतरी, जीवनशैली में उत्थान, निजी उपलब्धियों के विवरण के बीच, राज्य के ताज बन कर दिखाई नहीं देते क्योेंकि यहां सिर्फ सरकारी खजाने से पाने का हुजूम बढ़ रहा है। सरकार से मोल भाव करने की यह अदा स्थायी हो चुकी है, क्योंकि समाज के भीतर कोई खाई दिखाई नहीं देती। यहां ग्रामीण-शहरी बंटवारा न के बराबर है या किसान-बागाबान का घर भी नौकरीपेशा है। यहां खेत का चरित्र बदला, तो बागबानी का प्रभाव भी बढ़ा। कस्बों ने शहर का रूप धारण किया और हर घर ने तमगे पहनने शुरू कर लिए, लेकिन सियासत का रंग देखिए कि शहरीकरण को अनगढ़ा मजमून इसलिए बना दिया ताकि लोगों को शुल्क अदा न करने पड़े। मध्यमवर्गीय महत्त्वाकांक्षा ने प्रगति को गांव के हर घर तक पहुंचा दिया, लेकिन आर्थिक संपन्नता की यह क्षमता राज्य के प्रति अछूत रही।

 एक ओर हिमाचल के मध्यम वर्ग ने अपने बच्चों को पड़ोस के श्रेष्ठ स्कूल-कालेजों या विश्वविद्यालयों में पढ़ाना शुरू कर दिया, तो दूसरी ओर सरकारों ने शिक्षण संस्थानों की ऐसी खेप बढ़ा दी जिसके प्रति नागरिक महत्त्वाकांक्षा के सरोकार घट गए। यह कैसी विडंबना कि आठ मेडिकल कालेज या एम्स होते हुए भी हिमाचल की प्रतिष्ठा पीजीआई चंडीगढ़ में इलाज करवाने से पूरी होती है। राज्य का बजट हमेशा सेवाभाव से आता है, लेकिन मध्यम वर्ग को यह छूट देता है कि वह इसे पढ़े बिना अनुमान लगा ले कि इस बार उसका दायरा और कितना बढ़ेगा। बेशक हिमाचल के समाज से बेहतरीन व क्षमतावान प्रोफेशनल निकल रहे हैं, लेकिन उनके काबिल यह प्रदेश नहीं रहा। जिस प्रदेश के मध्यम वर्ग ने अपने बच्चों को देश के काबिल बनाया, उनके लिए हिमाचल की चिंता दिखाई नहीं देती, लेकिन सत्ता केवल सरकारी नौकरियों की खोज व कर्मचारियों की फौज के प्रति सेवाभाव लेकर अपने फर्ज की इतिश्री कर रही है। इस तरह यह प्रदेश इनोवेटिव व ताजी हवाओं से दूर राजनीति के भंवर में फंसा रहेगा, न जाने कब तक।

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