Tuesday, September 29, 2020 11:20 PM

हिमाचली शिक्षा की श्रेष्ठता किस ओर

एचपी बोर्ड, सीबीएसई और आईसीएसई के दम पर चल रहे हिमाचल के स्कूलों में लाखों छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। कहीं न कहीं प्रदेश का अपना बोर्ड अन्य बोर्ड से पीछे रहता जा रहा है। बात चाहे परीक्षा के नतीजों की हो या दूसरी गतिविधियों की, कहीं न कहीं कुछ तो कमी रह ही रही है। क्या हिमाचल में यह भेदभाव की शिक्षा है….इसी सवाल के जवाब और अन्य मुख्य पहलुओं के साथ पेश है दखल

—संवाददाता प्रतिमा चौहान  (सहयोग —नीलकांत भारद्वाज, नरेन कुमार मोहर सिंह पुजारी)

हिमाचल प्रदेश में सरकारी शिक्षा में गुणवत्ता लाने के  दावे तो किए जाते हैं, लेकिन अभी तक वे दावे ग्रामीण व जनजातीय क्षेत्रों में दम तोड़ते नजर आते हैं। अगर बात करें, तो सरकारी स्कूलों में एचपी बोर्ड के माध्यम से छात्र पढ़ाई करते हैं। एनसीईआरटी का सिलेबस बोर्ड के माध्यम से छात्रों को पढ़ाया जाता है। दसवीं और जमा दो के छात्रों की बोर्ड परीक्षा भी हर साल होती है, जिसमें तीन लाख से ज्यादा छात्र भाग लेते हैं।

हालांकि कुछ सालों से अगर बोर्ड के रिजल्ट को देखें, तो 80 प्रतिशत से ज्यादा छात्रों के रिजल्ट के परिणाम नहीं आ रहे हैं। इस बार जमा दो का परिणाम 76.7 प्रतिशत रहा है, जो कि पिछले वर्ष के मुकाबले 14.6 प्रतिशत अधिक है। इसके साथ ही दसवीं के रिजल्ट की बात करें, तो इस साल दसवीं कक्षा का रिजल्ट॒68.11॒फीसदी रहा। बोर्ड परीक्षा में 70571 विद्यार्थी पास हुए हैं। 5617 विद्यार्थियों की कंपार्टमेंट आई है, जबकि॒27197 विद्यार्थी फेल हुए हैं। सीबीएसई की दसवीं कक्षा के परीक्षा परिणाम में भी इस बार हिमाचल पंचकूला ज़ोन में अव्वल रहा। प्रदेश का परीक्षा परिणाम 96.92 फीसदी रहा है। पंचकूला ज़ोन के दूसरे राज्य हरियाणा का परीक्षा परिणाम 94.01 फीसदी रहा।

हिमाचल का परीक्षा परिणाम पड़ोसी राज्य पंजाब और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ से भी ज्यादा रहा है। हालांकि जे एंड के ने इस बार भी चंडीगढ़ ज़ोन में बाजी मारी। आईसीएसई का परिणाम भी बेहतर रहा है। सीबीएसई ओर आईसीएसई बोर्ड के परिणाम एचपी बोर्ड से बेहतर रहे हैं। वर्ष 2019 में प्रदेश सरकार ने कक्षा पहली से लेकर जमा दो तक एनसीईआरटी का सिलेबस शुरू किया है। अब एनसीईआरटी का ही सिलेबस छात्र पढ़ रहे हैं।

फिलहाल अगर बात करें, तो एचपी बोर्ड में अभी भी सुधार की बेहद आवश्यकता है। एचपी बोर्ड के माध्यम से जो छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, उनकी गुणवत्ता देखें, तो वे सीबीएसई और आईसीएसई के तहत पढ़ने वाले छात्रों को काफी पीछे छोड़ रहे हैं। हिमाचल में तीन बड़े स्कूल शिक्षा बोर्डों से संबद्ध स्कूल हैं और हजारों छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। एचपी बोर्ड सीबीएसई और आईसीएसई शिक्षा क्षेत्र में अति उल्लेखनीय कार्य रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में सीबीएसई बोर्ड का शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान है। स्कूलों में छात्रों को बेहतर एजुकेशन प्रदान करने में सीबीएसई का विशेष महत्त्व है। समय के साथ एजुकेशन सिस्टम व पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन किया जाता है। वहीं, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम सबसे उत्तम है। छात्रों की स्कूलों में आम परीक्षाएं भी प्रतियोगी परीक्षाओं के पैटर्न पर भी करवाई जाती हैं, जिसका लाभ छात्रों को मिलता है।  एचपी बोर्ड भी एजुकेशन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बावजूद इसके एचपी बोर्ड के छात्र भी सीबीएसई में पढ़ने के लिए अधिक रुचि भी दिखाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में एचपी बोर्ड ने बेहतरीन कार्य किया है, वहीं शहरी क्षेत्रों में सीबीएसई का कमाल देखने को मिलता है

—एसएच खान, प्रिंसीपल, डीएवी पब्लिक स्कूल धर्मशाला

सीबीएसई बोर्ड बन रहा छात्रों की पहली पसंद

हिमाचल प्रदेश में भी सीबीएसई बोर्ड ही छात्रों की पहली पंसद बनी हुई है। प्राइवेट स्कूलों में भी सीबीएसई में ही सबसे ज्यादा छात्रों की संख्या है। दरअसल सीबीएसई में दोनों भाषाओं को तवज्जो दी जाती है। इसके साथ ही सभी प्रकार के विषय भी सीबीएसई बोर्ड वाले स्कूलों में पढ़ाए जाते हैं। देखा भी जाए, तो आईसीएसई के बहुत कम स्कूल अब प्रदेश में बचे हैं। बहुत सालों पुराने कॉन्वेंट स्कूलों में ही अब आईसीएसई का सिलेबस पढ़ाया जाता है। आईसीएसई बोर्ड का सिलेबस बहुत टफ होता है। अंग्रेजी, मैथ्स से लेकर सभी विषयों में वेस्टर्न अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है। इसी वजह से आईसीएसई स्कूल बोर्ड में छात्रों की संख्या कम होती जा रही है।

हिमाचल में सीबीएसई के 205 स्कूल चार लाख से ज्यादा छात्र

प्रदेश में 205 सीबीएसई से संबद्धता प्राप्त प्राइवेट स्कूल हैं। इन स्कूलों में चार लाख से ज्यादा छात्रों के दाखिले होने की जानकारी मिली है। बता दें कि सीबीएसई बोर्ड पूरे इंडिया में एक जैसा है। इस बोर्ड के तहत पढ़ने वाले छात्रों को सभी प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने का भी मौका मिल जाता है। दरअसल सीबीएसई बोर्ड में छात्रों के लर्निंग आउटकम्स को सुधारने पर फोकस किया जाता है। देश भर के सभी स्कूलों में सीबीएसई के इनफॉर्म्ड प्रश्न पत्र होते हैं। इसके साथ ही इस बोर्ड में अप्लाइड प्रश्न पत्र छात्रों से पूछे जाते हैं। हिमाचल की अगर बात करें, तो सीबीएसई बोर्ड के प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का रिजल्ट पंजाब व हरियाणा से आगे ही रहता है। वहीं, 90 प्रतिशत से ज्यादा रिजल्ट की प्रतिशतता रही है।

16 हजार से जयादा स्कूलों में एचपी बोर्ड, आठ लाख स्टूडेंट्स

हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड के साथ राज्य के साढ़े 15 हजार सरकारी स्कूल इस समय रजिस्टर्ड हैं। इन स्कूलों में आठ लाख से ज्यादा छात्र पढ़ाई करते हैं। इसके साथ ही अगर प्राइवेट स्कूलों की बात करें, तो 1389 स्कूल एचपी बोर्ड से एफिलिएटिड हैं। इन स्कूलों में 50 हजार से ज्यादा छात्र पढ़ाई करते हैं। हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड स्कूलों में छात्रों को किताबें, नोट बुक्स भी मुहैया करवाता है। इसके साथ ही बोर्ड परीक्षाओं के दौरान कई तरह की व्यवस्थाएं भी की जाती हैं।

28 प्राइवेट स्कूलों में आईसीएसई बोर्ड, 60 हजार तक विद्यार्थी

प्रदेश में आईसीएसई के स्कूलों की बात करें, तो 28 प्राइवेट स्कूलों में इस बोर्ड के तहत छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। राज्य में अंग्रेजों के समय के कॉन्वेंट स्कूलों में इस बोर्ड के तहत छात्रों को पढ़ाया जा रहा है। अहम यह है कि शिमला ब्रिटिशकाल के समय में स्थापित हुए बिशप कॉटन स्कूल, ऑकलैंड स्कूल व अन्य कई बड़े-बड़े कॉन्वेंट स्कूलों में आईसीएसई बोर्ड के तहत छात्रों को पढ़ाया जा रहा है। इसमें छात्रों को सिलेबस भी अंग्रेजी विषय में ही होता है, इसके साथ ही छात्रों को प्रश्नपत्र भी अंग्रेजी विषय में ही पूछे जाते हैं।

कब-कब हुई शुरुआत

हिमाचल प्रदेश स्कूल एजुकेशन बोर्ड (एचपीबोस):1968

हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड की बात करें, तो प्रदेश ने अपने ही बोर्ड की स्थापना 1968 में हुई थी। पहले शिमला में एचपी बोर्ड का कार्यालय होता था, लेकिन जनवरी 1983 में इसे धर्मशाला में शिफ्ट कर दिया गया था। एचपी बोर्ड से हर साल पांच लाख छात्र परीक्षाएं देते हैं। इसके साथ आठवीं, दसवीं, जमा एक, जमा दो और जेबीटी, टीटीसी की फाइनल परीक्षाएं आयोजित करता है।

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई): 1962

सीबीएसई की अगर बात करें, तो 1962 में इसकी स्थापना हुई थी। 57 साल से इस बोर्ड के तहत अभी भी हिमाचल प्रदेश में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई की जा रही है। पहले इक्का-दुक्का स्कूलों में ही सीबीएसई का सिलेबस पढ़ाया जा रहा था, लेकिन अब देखें, तो सीबीएसई स्कूलों का आंकड़ा 238 तक पहुंच गया है। भारत में सबसे पहले उत्तर प्रदेश बोर्ड ऑफ हाई स्कूल एंड इंटरमीडिएट एजुकेशन पहला बोर्ड की स्थापना सन् 1921 में हुई थी। राजपुताना, मध्य भारत तथा ग्वालियर इसके अधिकार क्षेत्र में आते थे, और संयुक्त प्रांतों की सरकार द्वारा किए गए अभ्यावेदन के उत्तर में तत्कालीन भारत सरकार ने सभी क्षेत्रों के लिए वर्ष 1929 में एक संयुक्त बोर्ड स्थापित करने का सुझाव दिया, जिसका नाम बोर्ड ऑफ हाई स्कूल एंड इंटरमीडिएट एजुकेशन राजपूताना रखा गया।

इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (आईसीएसई) : 1958

आईसीएसई बोर्ड की बात करें, तो हिमाचल में इस बोर्ड से संबद्धता प्राप्त स्कूलों की संख्या बहुत कम है, जिसमें 24 प्राइवेट स्कूलों के नाम शामिल है। आईसीएसई एक संस्था है और यह पहली से बारहवीं तक के छात्रों की परीक्षा इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट के तहत करवाते हैं। सन 1958 से राजधानी के कॉन्वेट स्कूलों में इस बोर्ड के तहत छात्रों को पढ़ाया जाता है। शिमला के सबसे पुराने बिशप कॉटन स्कूल में सबसे पहले से आईसीएसई बोर्ड के तहत छात्रों को पढ़ाया जा रहा है। इसके अलावा अब ऑकलैंड स्कूल व कई बड़े स्कूलों में इस बोर्ड के तहत छात्रों को अंग्रेजी मीडियम से छात्रों को पढ़ाया जा रहा है।

इसलिए आगे है सीबीएसई

सीबीएसई स्कूलों में पढ़ाई करवाने का तरीका कुछ अलग होता है। बच्चों में बेहतर समझ विकसित करने का प्रयास अध्यापकों में रहता है। विषय रटाया नहीं, विस्तारपूर्वक समझा जाता है। सीबीएसई की पेपर सेटिंग अलग होती है। टेस्ट लेने का तरीका अलग होता है। विद्यार्थी को आसान तरीके से पढ़ाकर प्रश्न का पूरा आंसर देने के लिए तैयार किया जाता है। पाठ्यक्रम की बात करें, तो सीबीएसई और स्टेट बोर्ड में फर्क नहीं है। दोनों में एनसीईआरटी का सिलेबस होता है। महत्त्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने के लिए बच्चों को तैयार किया जाता है। यह जरूरी नहीं है कि इंटेलिजेंट छात्र सीबीएसई में हैं। एचपी बोर्ड में भी पढ़ाई अच्छी है। अंतर यह है कि सीबीएसई का विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेने में पीछे नहीं हटता

—स्वामी स्वयंप्रभा परिव्राजिका, प्रबंधक, ब्रह्मऋषि मिशन स्कूल जरड़

सीबीएसई और एचपी बोर्ड में सिलेबस हालांकि एक सा होता है, लेकिन सीबीएसई का पढ़ाने का सिस्टम बिलकुल अलग होता है। सीबीएसई छात्रों से डायरेक्ट प्रश्न नहीं पूछता। जैसे ही बाहरी देशों में सिलेबस चेंज होता है, सीबीएसई उसे तुरंत अडॉप्ट कर लेता है। सीबीएसई का मानना है कि एजुकेशन चाइल्ड सेंटर्ड होनी चाहिए। रीडिंग और राइटिंग स्किल के अलावा बिहेवियर स्किल के लिए भी बच्चे को इंट्रोड्यूस करवाता है। बच्चे को शुरू से ही तैयारी इस तरह करवाई जाती है कि वे आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो सकें। प्रतियोगी परीक्षा क्लीयर करने वालों में सीबीएसई बैकराउंड के बच्चे अधिक होते हैं

—घनश्याम कश्यप, प्रिंसीपल हमीरपुर

2013 में शुरू हुई उच्च शिक्षा परिषद बनाने की कवायद

प्रदेश में उच्च परिषद के गठन को लेकर 2013 में चर्चा शुरू होने लगी थी, लेकिन रूसा शुरू होने के तीन साल बाद भी इस परिषद का गठन हिमाचल में नहीं हो सका। बता दें कि उच्च शिक्षा परिषद के गठन का मकसद उच्च शिक्षा में सुधार लाना था। इसके साथ ही कालेजों में रूसा के तहत होने वाली पढ़ाई में नई योजनाएं बनाकर उसका विकास करना था, लेकिन 2016 तक वर्तमान सरकार हायर एजुकेशन काउंसिल का एक्ट लागू नहीं कर पाया। नवंबर 2018 में विधानसभा सत्र के दौरान हायर एजुकेशन काउंसिल एक्ट लागू किया गया। मार्च 2019 में काउंसिल का अध्यक्ष बनाया गया। इसके साथ ही उसके बाद पूरी काउंसिल में 21 सदस्यों को चुना गया है। काउंसिल में अध्यक्ष के पद पर पूर्व वीसी सुनील गुप्ता, उपाध्यक्ष शिक्षा सचिव को चुना गया है। अन्य सदस्यों के तौर पर दो सदस्य इंडस्ट्री, दो पॉलिसी मेकर, दो स्किल डिवेलपमेंट, कालेज प्रिंसीपल व अन्य विभागों से जुड़े सदस्यों को इस काउंसिल में चयन किया गया है। गौर हो कि इस काउंसिल का गठन उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार करने को लेकर हुआ था। इसके साथ ही जिन कालेजों को नैक से एक्रिडिटेशन नहीं मिली है, उन्हें अच्छी ग्रेड दिलाने के मकसद से भी इस काउंसिल का गठन हुआ था। राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा जब से लागू हुआ है, तब से इस काउंसिल के गठन को हर राज्य को जरूरी बताया गया है।

उच्च शिक्षा परिषद के गठन से रूसा के तहत कालेजों की शिक्षा में सुधार तो होगा, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि इस काउंसिल की मॉनिटरिंग सही रूप से की जाए। अगर समय-समय पर उच्च शिक्षा को लेकर बैठकों का आयोजन होता रहा, तो रूसा में बेहतर सुधार होने की उम्मीद है

—प्रो. पीयूष सेवल, असिस्टेंट प्रोफेसर, कम्प्यूटर साइंस

हायर एजुकेशन काउंसिल का उच्च शिक्षा में सुधार करने का एक अहम रोल है। परिषद का मकसद तभी पूरा हो सकता है, जब इसमें समन्वय भी सही ढंग से बना पाएं। महामारी के बाद तो परिषद पर जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। ऐसे में इस महामारी में परिषद के लिए जरूरी है कि कालेज व यूनिवर्सिटीज के लिए ज्यादा से ज्यादा बजट केंद्र सरकार से मुहैया करवाएं

—प्रो. विकास डोगरा, पत्रकारिता विभाग

एक बार हुई काउंसिल की बैठक

हिमाचल प्रदेश में जब से उच्च शिक्षा परिषद का गठन हुआ है, तब से लेकर अभी तक केवल एक बार ही बैठक हुई है। दिसंबर में अध्यक्ष सुनील गुप्ता की अध्यक्षता में एक बार बैठक का आयोजन किया गया था, जिसमें शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चर्चा की गई थी। अब कोरोना काल में भी बैठक होने के आसार नहीं हैं।

…ताकि यूजीसी से मिले पूरा बजट

उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष सुनील गुप्ता का कहना है कि उच्च शिक्षा परिषद के गठन के बाद कालेजों की नैक एक्रिडिटेशन करवाई जाएगी, इसके साथ ही जो कालेज अभी तक ग्रेड नहीं ले पाए हैं, उन्हें भी ए और बी गे्रड दिलाना है, ताकि रूसा के तहत यूजीसी से पूरा बजट कालेजों को मिल सके।

सभी बराबर…जारी है लर्निंग सिस्टम सुधारने की कोशिश

शिक्षा सचिव राजीव शर्मा

के साथ बातचीत के मुख्य अंश

हिमाचल में स्कूल शिक्षा बोर्ड के माध्यम से शिक्षा को स्तरोन्नत करने और अन्य बोर्ड के बराबर लाने के लिए क्या योजना है?

हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड की शिक्षा के विकास को लेकर कई विकास कर रहा है। वर्तमान में स्कूल शिक्षा बोर्ड परीक्षाएं व रिजल्ट घोषित करता है। इसके साथ ही पुस्तकों का मुद्रण भी समय पर किया जा रहा है। इस बार भी लॉकडाउन से पहले छात्रों तक किताबें पहुंचाई गई थी। वहीं, अगर बात करें, तो शिक्षा में गुणवत्ता व शिष्टाचार लाने के लिए छात्रों की मॉर्निंग असेंबली, छात्रों की लय के सुधार को लेकर कार्य किए जा रहे हैं। इसके अलावा एचपी बोर्ड ने अपना कुलगीत भी तैयार कर लिया है। जल्द ही इसे लांच किया जाएगा। इसके अलावा छात्रों को नई प्रार्थनाएं सिखाई जाएंगी। ये नई प्रार्थनाएं ट्रैफिक नियम, प्रकृति जल संग्रह, शौर्य, सौंदर्य पर आधारित होंगी। नैतिक शिक्षा को भी व्यवहारिक रूप से लाया जाएगा। छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन करने के मकसद से वैदिक मैथेमेटिक्स लाने का भी प्रयास किया जाएगा। इसके अलावा भी बोर्ड कक्षा एक से लेकर आठवीं तक के छात्रों के लर्निंग सिस्टम को सुधारने के लिए और भी बेहतर प्रयास कर रहा है।

क्या बिना फीस के कोई निजी स्कूल बच सकता है, जबकि उसे सभी स्टाफ की सैलरी देनी है और फिक्स खर्चे भी उठाने हैं?

कोविड के इस संकट में कई लोगों की नौकरियां चली गई, ऐसे में प्राइवेट स्कूलों की भारी भरकम फीस देना हर किसी के लिए संभव नहीं है। हालांकि किसी को भी फीस देने के लिए मना नहीं किया गया है। प्राइवेट स्कूलों के लिए ये आदेश दिए गए हैं कि वह केवल अभिभावकों से ट्यूशन फीस ही लें। इसके अलावा जो स्कूल ऑनलाइन पढ़ाई नहीं करवा रहे, उन्हें यह कहा गया है कि वे ट्यूशन फीस भी न लें। अभिभावकों की मांग व महामारी के इस संकट में ऐसा फैसला लेना जरूरी था।

ऐसा क्यों होता है कि एचपी बोर्ड की दसवीं- बारहवीं के मैरिट होल्डर ज्यादातर बच्चे निजी स्कूलों के होते हैं?

इस बार अगर एचपी बोर्ड के रिजल्ट देखें, तो उसमें सरकारी स्कूल के छात्रों की ज्यादा मैरिट आई है। वहीं, प्राइवेट स्कूलों के छात्रों को सरकारी स्कूल के छात्रों ने पीछे छोड़ा है। खास यह है कि सरकारी स्कूलों की छात्राओं ने इस बार दोगुना मैरिट में अपना स्थान पाया है। ऐसे में यह कहना कि प्राइवेट स्कूल हर बार एचपी बोर्ड के रिजल्ट में आगे रहते हैं, बिल्कुल भी सही नहीं है। सरकारी स्कूलों में भी रिजल्ट देखें, तो काफी सुधार हुआ है, वहीं सीसीटीवी कैमरे में भी बेहतर प्रदर्शन छात्रों ने दिया है।

प्रदेश के मेधावी छात्र ज्यादातर सीबीएसई और आईसीएसई से संबंध स्कूलों में शिक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं, इससे सरकार व शिक्षा विभाग क्या सीख ले रहा है?

ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योंकि दो साल का आंकड़ा देखा जाए, तो प्राइवेट स्कूलों से ज्यादा सरकारी स्कूलों में एनरोलमेंट बढ़ रही है। इसके साथ ही संस्कृत को सरकार ने दूसरी भाषा घोषित किया है, ऐसे में अब जल्द दूसरी से दसवीं तक छात्रों के लिए संस्कृत विषय शुरू किया जाएगा, ताकि उन पर एकदम किसी भी तरह का दबाव न पड़े। रही बात सीबीएसई बोर्ड में छात्रों की ज्यादा रुचि है, तो यह भी स्पष्ट कर दें कि सरकारी स्कूलों में अब पहली से लेकर जमा दो तक एनसीईआरटी का सिलेबस पढ़ाया जा रहा है। वहीं, सीबीएसई की तरह ही स्कूलों में छात्रों को पढ़ाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।

स्कूल शिक्षा बोर्ड केवल अपने बोर्ड के छात्रों को सम्मानित करता है, पुरस्कृत करता है, क्या यह अपने ही राज्य के मेधावी बच्चों से भेदभाव नहीं है?

ऐसा नहीं है, स्कूल शिक्षा बोर्ड प्राइवेट स्कूलों के मेधावी छात्रों को नजरअंदाज कर रहा है। बोर्ड में टॉपर रहने वाले छात्रों को स्कॉलरशिप के माध्यम से सरकार सम्मानित कर रही है। सरकार के लिए सभी छात्र एक बराबर है, वहीं सभी मेधावी छात्रों को सम्मानित किया जाता है।

सरकार पिछले तीन-चार महीने से निजी स्कूलों को दबाने में लगी हुई है, क्यों उनकी उपलब्धियों को नजरअंदाज किया जा रहा है?

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि निजी स्कूलों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रदेश के प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को भी स्कॉलरशिप सरकार की ओर से दी जा रही है। इसके साथ ही निजी स्कूलों के रिजल्ट को भी सरकार चैक कर रही है। प्राइवेट स्कूल शिक्षा के नाम पर अभिभावकों से पैसे न एंठें, इस पर विशेष ध्यान जरूर दिया जाता है, इसके साथ ही उपनिदेशकों को आदेश जारी किए गए हैं कि वे निजी स्कूलों की परफॉर्मेंस को भी समय पर चैक करते रहे।

बोर्ड कब सीबीएसई और आईसीएसई जैसी पढ़ाई की व्यवस्था कर पाएगा? कब तक हम पुराने ढर्रे पर ही चले रहेंगे?

एचपी बोर्ड ने पिछले कई सालों से शिक्षा के क्षेत्र में निजी शिक्षा को भी पीछे छोड़ने का प्रयास किया है। सीबीएसई की तर्ज पर अब सरकारी स्कूलों में एनसीईआरटी का सिलेबस पढ़ाया जा रहा है। इसके साथ ही प्री प्राइमरी भी स्कूलों में शुरू की गई है। छात्रों में शिक्षा को लेकर गुणवत्ता लाई जा सके, इसके लिए सभी परीक्षा केंद्रो में सीसीटीवी कैमरे लगा दिए गए हैं। शिक्षकों पर रिजल्ट वार की शर्त हटाकर अभी पूरी तरह से नकल रोकने पर फोकस किया है।

प्राइवेट की तरह सरकारी स्कूलों में भी ऑनलाइन स्टडी से छात्रों को पढ़ाया जा रहा है। यहां यह भी साफ कर दें कि सीबीएसई की तरह इस साल एचपी बोर्ड भी कुछ शर्तों के साथ सिलेबस कम करने में लगा हुआ है। इसे लेकर कमेटी का गठन भी कर दिया गया है। राज्य सरकार से जल्द इस बारे में बैठक आयोजित कर फैसला लिया जाएगा।

सीबीएसई-आईसीएसई में स्पोर्ट्स के लिए भी तैयार हो रहे छात्र

प्राइवेट व केंद्रीय विद्यालयों में सीबीएसई और आईसीएसई का सिलेबस छात्रों को पढ़ाया भी जाता है, साथ ही उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी तैयार किया जाता है। इन दोनों बोर्ड के तहत पढ़ने वाले छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में इस वजह से भी आगे बढ़ने का मौका मिलता है, क्योंकि इस बोर्ड के तहत छात्रों के लिए हर बार नया पैटर्न लाया जाता है। अगर सवाल-जवाब भी पूछे जाते हैं, तो हर विषय से जुड़े सवालों को पूछा जाता है। पठन पाठन के तरीकों को भी समय के साथ बदला जाता है। इंगलिश व हिंदी दोनों भाषाओं पर फोकस किया जाता है।

वहीं, क्लास वाइज छात्रों के लर्निंग आउटकम्स को सुधारा जाता है। इसी तरह आईसीएसई की बात करें, तो इस बोर्ड के तहत छात्रों को अंगे्रजी मीडियम से ही पढ़ाया जाता है।  वहीं, अध्ययन करने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए सीबीएसई बोर्ड ज्यादा उपयुक्त है। सीबीएसई द्वारा एआईईईई की परीक्षा आयोजित की जाती है, लेकिन आईसीएसई यह परीक्षा आयोजित नहीं करता। सीबीएसई में पर्यावरण विषय का अध्ययन अनिवार्य है, जबकि आईसीएसई में पर्यावरण विषय का अध्ययन अनिवार्य नहीं है। आईसीएसई केवल अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा प्रदान करता है तथा सीबीएसई अंग्रेजी और हिंदी दोनों माध्यम की शिक्षा प्रदान करता है, जिसमें छात्र दो भाषाओं में से किसी एक को चुन सकते हैं।

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