Friday, September 25, 2020 09:56 AM

हिमाचली शिक्षा से दूर रही मुस्कान

हिमाचल का शिक्षा विभाग अपने लक्ष्यों के निष्पादन में अव्वल हो सकता है, लेकिन बच्चों की महत्त्वाकांक्षा का निर्धारण करने में शायद ही कोई भूमिका अदा कर रहा है। बद्दी की मुस्कान का यूपीएससी परीक्षा में 87वें रैंक तक पहुंचने में हिमाचल की शिक्षा पर एक बहस हो सकती है। मुस्कान अपनी स्कूली शिक्षा भले ही बद्दी से लेती है, लेकिन न हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम चुनती है और न ही सरकारी स्कूल। उच्च शिक्षा के लिए भी वह चंडीगढ़ के एसडी कालेज से बीकॉम ऑनर्ज चुनती है। क्या मुस्कान की सफलता से हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड या प्रदेश का कोई कालेज अपनी प्रासंगिकता जोड़ पाएगा। यह दीगर है कि शिक्षा के वर्तमान ढर्रे ने प्रदेश के बच्चों को राजनीतिक दलों का कार्यकर्ता या नेताओं का पिछलग्गू बनाकर सरकारी नौकरी का फरियादी बना दिया। सफलताओं के राष्ट्रीय फलक पर ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहां शिक्षा के गुणात्मक मूल्य,किसी न किसी तरह हिमाचल की व्यवस्था को ठुकरा कर मुक म्मल हुए या इस चुनौती का हल ढूंढे बिना हिमाचल का अध्ययन कक्ष मुकम्मल नहीं होगा।

शिक्षा विभाग के निम्न व उच्च स्तर पर नए प्रयास किए बिना छात्रों के बीच मुस्कान नहीं मिलेगी। दूसरी ओर हिमाचली प्रतिभा का वारिस बने बिना शिक्षा विभाग अपने दायित्व को पूरा नहीं कर पाएगा। जिस तरह हिमाचली प्रतिभा का रुझान निजी स्कूलों की तरफ या तेजी  से सीबीएसई या आईसीएसई पाठ्यक्रमों की तरफ हो रहा है, उससे प्रदेश की सफलता का मूल्यांकन न तो सरकारी स्कूल और न ही शिक्षा बोर्ड पूरी तरह कर पा रहा है। अब तक दसवीं की पढ़ाई तक हर साल पहुंच रहे टॉप पांच हजार छात्रों के फलक पर ही यह निर्धारित होता आया है कि हिमाचली प्रतिभाएं शिक्षा के मायने किस तरह सफलता में बदल रही हैं। यही बच्चे तमाम स्कूलों की मैरिट या करियर की मैरिट बनाते हुए यह बता रहे हैं कि किस तरह के परिवर्तन करने होंगे। हालांकि केंद्र द्वारा घोषित नई शिक्षा नीति पुनः सारी पद्धति का शीर्षासन कराएगी, लेकिन हिमाचल के परिप्रेक्ष्य  में रूसा अपनाने व इसे कमजोर करने के उदाहरण से बहुत कुछ सीखने की गुंजाइश है। बेशक मास एजुकेशन प्रदान करने में हिमाचल के कई प्रयास अनुकरणीय हैं, लेकिन अब शिक्षा में मुस्कान चाहिए ताकि पढ़ लिख कर भी बच्चे भ्रमित न रहें।

उच्च शिक्षा विभाग की रूपरेखा और यूजीसी की वित्तीय स्वीकृ तियों में बारह कालेजों का दर्जा आदर्श बनाया जा रहा है। हो सकता है कुछ इमारतों की निगरानी में शिक्षा का आसन ऊंचा किया जाए, लेकिन प्रदेश को ऐसा माहौल कौन देगा, जो हर मुस्कान को तराश कर आईएएस बना दे या हर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में यहां के बच्चों को खड़ा कर दे। बद्दी की मुस्कान की तरह अनेक बच्चों को अपने ड्रीम स्कूल या कालेज हिमाचल में क्यों नहीं मिल रहे। सफलता के मानदंड व प्रतिस्पर्धा का स्तर जिस तरह ऊंचा हो रहा है, उसे देखते हुए हिमाचल को अपने सरकारी तंत्र और अधोसंरचना का बेहतर इस्तेमाल करना होगा। नई शिक्षा नीति के वास्तविक अर्थों में जो बदलाव आपेक्षित है, उसे समझते हुए हिमाचली शिक्षा के संदर्भ, लक्ष्य और अनुशासन तय करने होंगे। अगर शिक्षा की पटरी पर राजनीति की रेल ही दौड़ानी है, तो हिमाचल ने अपनी क्षमता से कहीं अधिक स्कूल-कालेज सिर पर उठा रखे हैं, लेकिन शिक्षा को अपना सिर उठाने के लिए आदर्श अध्यापक और निपुण फैकल्टी चाहिए।

समय आ गया है कि राज्य अपने वर्तमान ढांचे के भीतर ही आदर्श ढूंढे। स्कूलों और कालेजों की रैंकिंग के लिए मॉडल दर्जा होना एक तमगा हो सकता है, लेकिन बच्चों के हुनर को जागृत करने के लिए पिछली तमाम पद्धतियां व परंपराएं बदलनी पड़ेंगी। सामान्य छात्रों के पाठ्यक्रमों में रोचकता व रोजगार की गारंटी अगर शिक्षा दे, तो यह भी तय है कि दूसरी ओर सफलता की श्रेष्ठता हासिल करने का माहौल भी पैदा किया जा सकता है। मॉडल कालेजों का असली रंग रूप एक बड़े लक्ष्य के साथ ही निखर सकता है। इन कालेजों को कम से कम एक विषय के राज्यस्तरीय अध्ययन का प्रमुख केंद्र बनाया जाए, तो कल हिमाचल में भी अलग-अलग विषयों के श्रेष्ठ कालेज होंगे। स्वरोजगार नीति और शिक्षा की संपूर्णता पर नए आधार की जरूरत को नजरअंदाज करके शायद ही आदर्श कायम होंगे।

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