Tuesday, April 13, 2021 10:29 AM

सशक्तिकरण की राह पर हिमाचली महिलाएं

जबरदस्त बहुमत के साथ 2014 में सत्ता में आई भाजपा सरकार ने इसे पारित कराने के कोई प्रयास नहीं किए जबकि अपने चुनावी-घोषणापत्र में उन्होंने इसका वादा भी किया था। अगर इस सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति है तो दशकों का सपना मिनटों में पूरा हो सकता है...

हमारा लोकतंत्र आज एक कठिन चुनौती का सामना कर रहा है। देश का किसान अपने ही तंत्र के सामने तीन महीने से भी अधिक समय से सीना तानकर खड़ा है। इसमें कोई शक नहीं कि किसान आंदोलन अब एक ऐतिहासिक महत्त्व हासिल करता जा रहा है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही इसे एक महत्त्वपूर्ण अवसर के रूप में देख रहे हैं, लेकिन इस आंदोलन में वर्गीय मांगों के अलावा सत्ता का लोकतंत्रीकरण भी एक आवश्यक आयाम है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हमें भारतीय राजनीति के एक बहुत ही जरूरी लोकतांत्रिक सवाल, अर्थात राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के प्रश्न पर बात करना आवश्यक है। किसानों ने विवादित कानून मांगे नहीं थे, परंतु सरकार न केवल उन्हें लेकर आई, बल्कि उनके विरोध के बावजूद उन्हें लागू कराने की जिद भी कर रही है। इसके ठीक विपरीत महिलाओं द्वारा कई दशक से निरंतर मांगे जा रहे आरक्षण को लेकर सरकार खामोश बैठी हुई है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां आजादी के बाद पहले चुनाव से ही महिलाओं को मताधिकार हासिल है। इतना ही नहीं, श्रीलंका के बाद दुनिया में दूसरा देश भारत ही था जहां प्रधानमंत्री के पद पर एक महिला आसीन हुई थी। अब तक देश में राष्ट्रपति से लेकर लोकसभा अध्यक्ष और अनेक राज्यों में राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री के पदों को महिलाएं सुशोभित कर चुकी हैं।

अनेक महिलाओं ने केंद्रीय मंत्री और संसद-विधानसभा सदस्य रहते हुए राजनीति में अपना बेहतरीन योगदान दिया है, परंतु यहां हम इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि समाज की आधी आबादी की राजनीति में क्या भागीदारी है? वर्ष 2019 में 17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों में जीतने वाली महिलाओं की संख्या अब तक की सबसे अधिक 78 रही, जो कि कुल सांसदों का मात्र 14.58 प्रतिशत है। इसकी तुलना में 2014 के लोकसभा चुनाव में 11.23 प्रतिशत महिलाएं जीती थीं। सन् 1952 के पहले आम चुनाव में लोकसभा में 22 सीटों पर महिलाएं चुनकर आई थीं, लेकिन 2014 में हुए चुनाव के बाद लोकसभा में 62 महिलाएं ही पहुंच सकीं, यानी 62 वर्ष में महज 36 प्रतिशत की वृद्धि। जिनेवा स्थित इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में भारत 150वें स्थान पर है, जबकि पाकिस्तान को 101वां स्थान मिला है। अर्थात महिलाओं के विधायी प्रतिनिधित्व के मामले में पाकिस्तान भी हमसे बेहतर हालत में है। इस रिपोर्ट में रवांडा पहले, क्यूबा दूसरे और बोलिविया तीसरे स्थान पर है। इन देशों की संसद में महिला सदस्यों की संख्या 50 प्रतिशत से ज़्यादा है। दुनिया के 50 देशों की संसद में महिलाओं की संख्या कुल सदस्यों के 30 प्रतिशत से अधिक है। महिलाओं को राजनीति में समुचित हिस्सेदारी देने और देश के विकास में उनके योगदान को सुनिश्चित करने की पहल 1993 में संसद द्वारा 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन से हो गई थी। पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देकर उन्हें सशक्त करने एवं महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए नवीन पंचायतीराज विधेयक पारित किया गया था, जिसे 1993 में संसद ने संविधान में भाग-9 जोड़कर अनुच्छेद 243-डी के तहत महिला आरक्षण की व्यवस्था की थी। आज देश की इन पंचायतीराज संस्थाओं में 13.45 लाख महिला प्रतिनिधि (कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में 46.14 प्रतिशत) लोकतंत्र की बुनियादी इकाई में सक्रिय रहते हुए क्षेत्रीय विकास में योगदान दे रही हैं, लेकिन जब विधानसभा और लोकसभा में भी एक-तिहाई महिला आरक्षण की बात आई तो राजनीतिक दलों की करनी और कथनी का अंतर आड़े आ गया।

 कितने आश्चर्य की बात है कि जिस संसद ने स्थानीय निकायों में भागीदारी के लिए महिलाओं को योग्य माना, उसने अपनी सदस्यता में महिलाओं की न्यूनतम गारंटी के कानून को विगत तीन दशकों से लटका रखा है। महिला आरक्षण विधेयक की मांग विभिन्न दलों की महिला सांसदों के द्वारा की जा रही थी। इस समूह की अगुवाई अक्सर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की वयोवृद्ध सांसद गीता मुखर्जी करती थीं। इस विधेयक को पहली बार 1996 में एचडी देवगौड़ा सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में पेश किया था, लेकिन देवगौड़ा सरकार अल्पमत में आ गई और 11वीं लोकसभा को भंग कर दिया गया। सन् 1996 में यह विधेयक भारी विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति के हवाले कर दिया गया था। सन् 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में फिर से विधेयक पेश किया, लेकिन गठबंधन की मजबूरियों और भारी विरोध के बीच यह रद्द हो गया। सन् 1999, 2002 तथा 2003 में इसे फिर लाया गया, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। वर्ष 2008 में मनमोहन सिंह सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण से जुड़ा 108वां संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा में पेश किया। इसके दो साल बाद 2010 में तमाम राजनीतिक अवरोधों को दरकिनार कर राज्यसभा में यह विधेयक पारित करा दिया गया। कांग्रेस को बीजेपी और वाम दलों के अलावा कुछ अन्य दलों का साथ मिला, लेकिन लोकसभा में 262 सीटें होने के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार विधेयक को पारित नहीं करा पाई और एक बार फिर कानून का पिछली बार की ही तरह का हश्र हुआ। जबरदस्त बहुमत के साथ 2014 में सत्ता में आई भाजपा सरकार ने इसे पारित कराने के कोई प्रयास नहीं किए जबकि अपने चुनावी-घोषणापत्र में उन्होंने इसका वादा भी किया था। अगर इस सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति है तो दशकों का सपना मिनटों में पूरा हो सकता है। लोकसभा में सरकार के पास विशालकाय बहुमत है और राज्यसभा मनमोहन सिंह के समय ही इसे पारित कर चुकी है। चूंकि राज्यसभा एक स्थायी सदन है, इसलिए यह विधेयक तकनीकि रूप से अभी भी जीवित है।

 दिलचस्प है कि महिलाओं को आरक्षण के मामले में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सहमत हैं और दोनों ही पार्टियां सत्ता में रहते हुए विधेयक लेकर आईं, लेकिन फिर भी कानून पारित नहीं हो पा रहा। जाहिर है राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव इसके पीछे प्रमुख कारण है। इसके अलावा एक और कारण लगता है। जब-जब संसद में इस विधेयक को प्रस्तुत किया गया, तब-तब कुछ पार्टियों, जैसे समाजवादी पार्टी, राजद आदि ने इसका तीखा प्रतिरोध किया। इसके पीछे वे जो वजह बताते हैं उसे सिरे से ख़ारिज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यदि महिलाओं के लिए सीटों को आरक्षित किया गया तो यह अपने आपमें समाज के अगड़े तबके की महिलाओं को लाभ पहुंचाएगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन के चलते अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाएं उन्हें बराबरी की चुनौती नहीं दे पाएंगी। इसलिए महिलाओं के लिए प्रस्तावित आरक्षण के अंदर इन पिछड़े तबकों की महिलाओं के लिए उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान किया जाए। इस मांग में भी दम है और हमारे राजनीतिक नेतृत्व को इस न्यायोचित मांग को मद्देनजर रखते हुए जल्दी ही इस मामले का समाधान निकालना चाहिए।

मैंने स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत से ऐसे परिवार देखे हैं, जिनकी एक ही बेटी है और अभिभावक उसकी परवरिश में कोई  कसर नहीं छोड़ते। जरूरत है बस थोड़ा सजग होने की। बेटी अनमोल है, उसे इतना सशक्त बनाएं ताकि वह भी आगे जीवन में सक्षम बने, अपने फैसले स्वयं ले सके, विपरीत परिस्थिति में भी डगमगाए नहीं, बल्कि निडरता के साथ डट कर मुकाबला करे। केवल महिला दिवस के दिन विचार गोष्ठी व सम्मेलन करने से महिलाओं के प्रति हमारा दायित्व पूरा नहीं हो जाएगा। जरूरत इस बात की है कि हम महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें...

प्राचीन काल से ही भारत में नारी का उच्च स्थान रहा है। पौराणिक काल से पार्वती से लेकर त्रेता युग की सीता, द्वापर युग की यशोधा, अहिल्या और आधुनिक युग में कस्तूरबा और मदर टेरेसा आदि नारी हृदय में दया, करुणा, ममता और प्रेम हमेशा विद्यमान रहा। महिला मानव सृष्टि की जननी है, वह मनुष्य की जन्मदात्री है। नारी का त्याग और बलिदान भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है। मनु ने मनु स्मृति में स्त्रियों का विवेचन करते हुए लिखा है, ‘यत्र नार्यस्तु पुजयन्ते रमन्ते तत्र देवताः।’ अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। देहज प्रथा, पर्दा प्रथा, महिलाओं को उच्च शिक्षा न देना आदि कुरीतियों ने समाज में महिलाओं की स्थिति को दयनीय बना दिया था, जिसका असर समाज में आज भी बरकरार है। आज पूरे विश्व में महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। चारदिवारी से निकलकर महिलाएं पुरुषों के साथ समाज के हर क्षेत्र में आत्मविश्वास के साथ काम कर रही हैं। कामकाजी महिलाएं हों या फिर गृहिणी, सभी कुशलता के साथ घर-परिवार चलाकर सामाजिक दायित्व निभा रही हैं। महिलाओं की जिंदगी में तमाम तरह के बदलाव आ रहे हैं, लेकिन आज भी उन्हें समाज में व्याप्त बुराइयों और घरेलू प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। समाचार पत्रों में आए दिन नारी की अस्मिता को तार-तार कर लहूलुहान करने के किस्सों से पन्ने भरे मिलते हैं।

जहां पर नारी की मनोस्थिति को बयां करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं, वहीं दूसरी ओर घिनौनी मानसिकता वाले ये चेहरे भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं, फिर किसी लाडली का चीरहरण कर उसे उम्रभर समाज के इन उजले चेहरे से चेहरा छुपाने के लिए मजबूर कर देते हैं। सुबह की पहली किरण के साथ अखबार के पन्नों को पलटती मां का दिल गुमनाम लाडली के साथ हुए घिनौने अपराध की खबर पढ़कर ज़रूर सिहर उठता है। समाज के निर्माण में महिलाओं की अहम भूमिका है। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के दूरस्थ गांव की प्रसिद्ध समाज सेविका किंकरी देवी ने पर्यावरण को बचाने में अहम योगदान दिया। बहुत सी ऐसी महिलाएं है जो राजनीतिक, साहित्यिक व अपनी रुचि अनुसार अपने-अपने क्षेत्र में एक अलग मुकाम हासिल कर चुकी हैं और दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही हैं। बदलते परिवेश में हिमाचली ग्रामीण महिलाओं की बात करें, तो वे भी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। शिक्षित होने के कारण वह अपनी बेटी की शिक्षा पर उतना ही बल दे रही है जितना कि बेटों की शिक्षा पर। वह मानसिक रूप से तो सशक्त है ही, साथ ही स्वयं सहायता समूह चलाकर मधुमक्खी पालन, पापड़ व बडि़यां तैयार करना, सिलाई व कढ़ाई का काम घर बैठकर करके अपनी आर्थिक स्थिति भी मजबूत कर रही है। हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में मनरेगा के तहत काम करने वाली महिलाओं की संख्या 61 से 63 फीसदी है। शहरी परिवेश की महिलाओं की अगर हम बात करें तो महिलाएं शिक्षित होने के कारण घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ अपने कैरियर के प्रति भी सजग हैं। वे सेना, एयर हॉस्टेस, पायलट, प्रशासन, शिक्षा, टैक्नॉलौजी, मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में अपना लोहा मनवा चुकी हैं। वर्तमान संदर्भ में यदि हम महिलाओं की समाज में स्थिति की बात करें तो उसके भी प्रमाण हमें मिल जाएंगे। महिला सशक्तिकरण का मतलब वास्तव में महिलाओं की सामाजिक, मानसिक व आर्थिक स्थिति को मजबूत करना है, फिर चाहे वह ग्रामीण परिवेश से हो या फिर शहरी परिवेश से।

 जब तक महिलाआें की मानसिकता में बदलाव नहीं आता, वैचारिक विकास उनका नहीं होता, तब तक वह स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम नहीं हो सकती। महिला परिवार की अहम धुरी होती है, जो रिश्तों की डोर को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास उम्रभर करती रहती है, शादी से पहले मायके में और शादी के बाद ससुराल में। वास्तव में नारी तुलसी के उस पौधे की तरह है, जो घर-आंगन को हमेशा महकाती है। जब तक समाज में महिलाओं के प्रति मानसिकता में बदलाव नहीं आता, उनका वैचारिक विकास नहीं होता, तब तक समाज का विकास भी असंभव है। नारी यदि शिक्षित होगी, तो वह पूरे परिवार को शिक्षित कर सकती है, समाज को सुदृढ़ कर सकती है, पूरे राष्ट्र को सुदृढ़ कर सकती है। यदि वह शिक्षित होगी, तो उसे अपने अधिकारों का भी ज्ञान होगा। अपने ऊपर हो रही घरेलू हिंसा या फिर समाज की प्रताड़ना की शिकायत करने के लिए उसे कहां जाना है, उसे न्याय कैसे मिल सकता है, इन सभी के प्रति वह और ज्यादा सजग होगी। महिला जब सक्षम, शिक्षित ओर स्वावलंबी होगी तो सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ लेने के लिए भी आगे आएगी। साथ ही समाज की अशिक्षित महिलाओं को भी दिशा देने का काम कर सकती है। गांव के अंतिम छोर तक जब शिक्षा की लौ पहुंचेगी, तो उसकी रोशनी से समाज जरूर जगमगा उठेगा। बदलते परिवेश में ग्रामीण क्षेत्रों के रहन-सहन में बहुत ज्यादा बदलाव आया है। बेटी के जन्म पर अब खुशियां बांटी जाती हैं।

मैंने स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत से ऐसे परिवार देखे हैं, जिनकी एक ही बेटी है और अभिभावक उसकी परवरिश में कोई  कसर नहीं छोड़ते। जरूरत है बस थोड़ा सजग होने की। बेटी अनमोल है, उसे इतना सशक्त बनाएं ताकि वह भी आगे जीवन में सक्षम बने, अपने फैसले स्वयं ले सके, विपरीत परिस्थिति में भी डगमगाए नहीं, बल्कि निडरता के साथ डट कर मुकाबला करे। केवल महिला दिवस के दिन विचार गोष्ठी व सम्मेलन करने से महिलाओं के प्रति हमारा दायित्व पूरा नहीं हो जाएगा। जरूरत है तो इस बात की कि हर दिन महिलाओं के प्रति, उसकी सोच के प्रति हमारा सम्मान जागे, जीवन के हर क्षेत्र में उसे आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करें। इसकी शुरुआत तो हमें अपने घर से ही करनी होगी। ‘नारी अबला नहीं सबला है’, इस सोच के साथ हमें अपनी मानसिकता को मजबूत करना होगा।