Sunday, May 09, 2021 06:17 PM

देवभूमि से वीरभूमि तक हिमाचल का सफर

अतः कम ही सही, लेकिन श्रमिक को कुछ रोजगार मिलता रहे, इसके लिए जरूरी है कि श्रम की उत्पादकता को  बढ़ाया जाए। श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के दो प्रमुख उपाय हैं। एक यह कि उत्तम मशीनों का उपयोग किया जाए जिससे कि उसी कुशलता के स्तर का श्रमिक अधिक उत्पादन कर सके। दूसरा यह है कि श्रमिक की कुशलता में विस्तार किया जाए। अकसर उद्योगों में देखा जाता है कि श्रमिक पूरी तत्परता और मनोयोग से काम नहीं करते हैं। वर्तमान श्रम कानून में व्यवस्था है कि यदि कोई उद्यमी श्रमिक को बर्खास्त करना चाहे तो उसे प्राकृतिक न्याय के अनुरूप उसकी सुनवाई करनी होती है और उसके बाद श्रम न्यायालय में उसका विवाद चलता है, जिस भय के कारण उद्यमी श्रमिक को रखना ही नहीं चाहते हैं...

वर्तमान में अपने देश में लगभग 40 श्रम कानून लागू हैं। सरकार ने इन्हें समेट कर 4 लेबर कोड में संकलित कर दिया है। इन नए कानून को एक अप्रैल से लागू होना था जिसे सरकार ने चुनाव के कारण कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया है। चुनाव के बाद इन्हें शीघ्र ही लागू किए जाने की पूरी संभावना है। इन लेबर कोड को बनाने के पीछे सरकार की मंशा श्रम कानूनों को सरल करने की थी जिससे कि देश में उद्यमियों के लिए श्रमिकों को रोजगार देना आसान हो जाए और मन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में देश की अधिक संख्या में रोजगार उत्पन्न हो सकें। लेबर कोड के प्रावधानों में कुछ श्रमिकों के पक्ष में हैं तो कुछ उनके विपरीत हैं। जैसे यदि किसी श्रमिक को कोई आरोप लगाकर मुअत्तल किया जाता है तो अब व्यवस्था कर दी गई है कि 90 दिन में उसकी जांच पूरी की जाएगी। पूर्व में ग्रेच्युटी कई वर्षों के बाद लागू होती थी जिसे अब एक वर्ष के बाद लागू कर दिया गया है। अल्पकाल के लिए रखे गए श्रमिकों को अब वे सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी जो स्थायी श्रमिकों को उपलब्ध हैं। ये प्रावधान श्रमिकों के हित में हैं। इसके विपरीत उद्यमों को बंद करने अथवा श्रमिकों की छंटनी करने के लिए पूर्व में 100 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाली कंपनियों के लिए सरकार से अनुमति लेना जरूरी था। अब इसे 300 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाली कंपनियों मात्र पर लागू किया गया है। 100 से 300 श्रमिकों को रोजगार देने वाली कंपनियों को सरकार से अनुमति लेने से मुक्त कर दिया गया है।

यह श्रमिकों के विपरीत है। इस प्रकार नया लेबर कोड मिश्रित है। देखना यह है कि नए लेबर कोड से रोजगार उत्पन्न करने को कितना प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसके लिए हमें समझना होगा कि उद्यमी द्वारा रोजगार किन परिस्थितियों में उत्पन्न किए जाते हैं। उद्यमी को सस्ता माल बनाना होता है जिससे कि वह बाजार में अपना माल बेच सके। सस्ता माल बनाने के लिए जरूरी है कि वह उत्पादन में श्रम की लागत को कम करे। इसलिए वह उसके लिए जरूरी होता है कि वह श्रम की उत्पादकता बढ़ाए यानी एक श्रमिक से ही पूर्व की तुलना में अधिक उत्पादन कराए। जैसे एक श्रमिक पूर्व में 10 मीटर कपड़ा एक दिन में बुनाई करता था। वही श्रमिक यदि अब 20 मीटर कपड़ा बुनाई करने लगे तो उद्यमी की उत्पादन लागत कम हो जाती है और वह बाजार में अपने सस्ते माल को बेच पाता है। लेकिन अधिक उत्पादन करने के कारण अब कम श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। जैसे मान लीजिए पूर्व में उद्यमी प्रति दिन 100 मीटर कपड़ा एक दिन में बेच पाता था और वह 10 मीटर प्रति श्रमिक की दर से 10 श्रमिकों को रोजगार देता था। उत्पादकता बढ़ाने के बाद उसी 100 मीटर कपड़े का उत्पादन करने के लिए अब 20 मीटर प्रति श्रमिक की दर से उसे केवल पांच श्रमिकों की जरूरत होगी। इस प्रकार सस्ते माल और रोजगार के बीच सीधा अंतर्विरोध है।

 यदि माल सस्ता बनाते हैं तो रोजगार कम होते हैं। चीन का माडल इससे भिन्न था जो कि विशेष परिस्थितियों में लागू हुआ था। चीन ने श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ अपने बाजार का भारी विस्तार किया। जैसे मान लीजिए पूर्व में चीन में एक श्रमिक 10 मीटर कपड़े की बुनाई करता था, उत्पादकता बढ़ाने के बाद वह 20 मीटर कपड़ा बुनने लगा। लेकिन इसी अवधि में चीन का बाजार 100 मीटर से बढ़कर 400 मीटर हो गया तो 400 मीटर कपड़े का उत्पादन करने के लिए बढ़ी हुई उत्पादकता के बावजूद 20 श्रमिकों की जरूरत पड़ेगी। 20 श्रमिक 20 मीटर कपड़ा प्रतिदिन बुनेंगे, तब 400 मीटर कपड़े का उत्पादन होगा। इस प्रकार यदि बाजार का भारी विस्तार होता रहे तो श्रमिक की उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ रोजगार भी बढ़ सकते हैं। लेकिन यह विशेष परिस्थिति थी जब चीन ने विश्व बाजार पर अपना प्रभुत्व बनाया था। यदि बाजार का तीव्र विस्तार न हो तो उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ रोजगार के बढ़ने की संख्या निश्चित रूप से घटेगी। कटु सत्य यह है कि यदि श्रम की उत्पादकता बढ़ाई जाती है तो सीमित बाजार होने के कारण रोजगार घटते हैं और यदि श्रम की उत्पादकता नहीं बढ़ाई जाती है तो उद्यमी के लिए श्रम के स्थान पर मशीन का उपयोग करना लाभप्रद हो जाता है और पुनः रोजगार में गिरावट आती है। इन दोनों कठिन विकल्पों के बीच मेरा मानना है कि हमें श्रम की उत्पादकता तो बढ़ानी ही पड़ेगी। यदि श्रम की उत्पादकता नहीं बढ़ाई जाएगी तो उद्यमी स्वचालित मशीनों का उपयोग करेगा और श्रमिक पूरी तरह बाजार से बाहर हो जाएगा।

अतः कम ही सही, लेकिन श्रमिक को कुछ रोजगार मिलता रहे, इसके लिए जरूरी है कि श्रम की उत्पादकता को  बढ़ाया जाए। श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के दो प्रमुख उपाय हैं। एक यह कि उत्तम मशीनों का उपयोग किया जाए जिससे कि उसी कुशलता के स्तर का श्रमिक अधिक उत्पादन कर सके। दूसरा यह है कि श्रमिक की कुशलता में विस्तार किया जाए। अकसर उद्योगों में देखा जाता है कि श्रमिक पूरी तत्परता और मनोयोग से काम नहीं करते हैं। वर्तमान श्रम कानून में व्यवस्था है कि यदि कोई उद्यमी श्रमिक को बर्खास्त करना चाहे तो उसे प्राकृतिक न्याय के अनुरूप उसकी सुनवाई करनी होती है और उसके बाद श्रम न्यायालय में उसका विवाद चलता है, जिस भय के कारण उद्यमी अकसर श्रमिक को रखना ही नहीं चाहते हैं। लेबर कोड ने श्रम कानून की इस बाधा को दूर नहीं किया है। पश्चिमी देशों में उद्यमी को छूट है कि वह अपनी मर्जी से श्रमिकों को रख सकता है अथवा बर्खास्त कर सकता है। इसलिए पश्चिमी देशों में उद्यमी के लिए कुशल श्रमिक को रखना और अकुशल श्रमिक को बर्खास्त करना दोनों ही आसान है। श्रम कानून में इस दिशा में कोई सुधार नहीं किया गया है। इसलिए यह लेबर कोड नए रोजगार उत्पन्न करने में सहायक नहीं होगा। अपने देश के श्रमिक चीन आदि देशों के श्रमिकों की तुलना में अकुशल हैं और उनकी कुशलता में सुधार करने के लिए लेबर कोड असफल है। इसलिए मेरा मानना है कि अपने देश में श्रम की उत्पादकता न्यून स्तर पर बनी रहेगी। उद्यमी अधिकाधिक मशीनों का उपयोग करते रहेंगे और हमारे श्रमिकों के रोजगार के अवसर घटते ही जाएंगे। इस दिशा में लेबर कोड में मूल चिंतन बदलने की जरूरत है।

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देश की आज़ादी व स्वाभिमान के लिए बलिदान देकर शौर्यगाथाओं के मजमून लिखने वाले वीरभूमि के शूरवीरों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए। साथ ही हिमाचल रेजिमेंट भी दी जाए...

देश की आजादी के बाद 15 अप्रैल 1948 को 30 पहाड़ी रियासतों के एकीकरण के साथ हिमाचल प्रदेश स्वतंत्र भारत की इकाई के रूप में वजूद में आया था, लेकिन हिमालय के आंचल में बसे इस छोटे से पर्वतीय प्रदेश की गौरव-गाथाओं का प्राचीनतम इतिहास गौरवमयी रहा है। महाभारत के रणक्षेत्र से लेकर स्वतंत्रता संग्राम, विश्व युद्धों, आजाद हिंद सेना तथा देश के लगभग सभी सैन्य अभियानों व युद्धों में राज्य के वीर सपूतों ने असंख्य कुर्बानियां देकर हिमाचली रक्त को श्रेष्ठ साबित करके प्रदेश को देवभूमि के साथ वीरभूमि की कतार में भी खड़ा किया है। इसीलिए राज्य अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विशिष्टताओं के साथ देश के गौरवशाली सैन्य इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर भी पहचान बनाए हुए है।

राज्य में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ, सिद्धपीठ व कई अन्य प्राचीन मंदिर, गुरुद्वारे, मठ आदि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथों में हिमालय की पर्वतमालाओं को भगवान शिव का मूल वास व क्रीड़ास्थली माना गया है। वहीं राज्य प्राचीन से कई ऋषि-मुनियों की तपोस्थली, ध्यान, साधना का परमधाम रहा है। इनमें महर्षि भृगु, व्यास, मार्कण्डेय, पराशर, पांडव पुरोहित महार्षि धौम्य, रामायणकालीन महर्षि श्रृंगी, मांडव्य, लोमष ऋषि, जमदग्नि, रघुवंश के कुलगुरू महर्षि वशिष्ठ, परशुराम, कल्पी ऋषि तथा राज्य की सबसे प्राचीन रियासत त्रिगर्त राज्य के कुलगुरू महर्षि शेशिनारायण जैसे महान मनीषियों की भक्ति व तपोबल के व्यापक चिन्ह राज्य की मुकद्दस पर्वत श्रृंखलाओं में आज भी मौजूद हैं। आस्था का केन्द्र रहे राज्य के धार्मिक स्थलों के दर्शन दीदार, मानसिक शांति व सुकून के लिए लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। यदि बात वीरभूमि के संदर्भ में करें तो जब भारत ब्रिटिश सत्ता का गुलाम था, दुनिया में बर्तानवी हुकूमत का कभी सूर्यास्त नहीं होता था, लोगों के जहन में अंग्रेजों की गुलामी का खौफ  इस कदर था कि मुल्क में कोई शख्स उनके खिलाफ आवाज बुलंद करने की हिमाकत नहीं करता था, उस दौर में सन 1846 में नूरपुर रियासत के बीस वर्षीय नौजवान ‘वजीर रामसिंह पठानिया’ ने इसी हिमाचल की धरती से फिरंगी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह को अंजाम देकर आज़ादी का सफीना जारी कर दिया था। पठानिया की उसी बगावत की आग से उपजे इंकलाब ने देश के लाखों लोगों को आज़ादी का ख्वाब दिखा दिया।

अपनी शमशीर से विदेशी हुकूमत के वजूद को ललकार कर आज़ादी की शमां जलाने वाले राम सिंह पठानिया ने देश के लिए अल्पायु में ही जीवन कुर्बान कर दिया था। यदि आज जम्मू-कश्मीर भारतीय ध्वज तले हमारे मानचित्र पर मौजूद है तो इसका पूरा श्रेय हिमाचली शूरवीर ‘नेपोलियन ऑफ द ईस्ट’ महान जरनैल ‘जोरावर सिंह कहलुरिया’ को जाता है जिन्होंने 1840 में अफगानों को हराकर स्कर्दू, गिलगिट व बाल्टिस्तान को जीतने के बाद अपने सैन्य अभियानों से लेह-लद्दाख को जम्मू-कश्मीर रियासत की सरहदों में मिलाकर रणक्षेत्र में ही अपना बलिदान दे दिया था। लेह क्षेत्र में रण कौशल के माहिर उस योद्धा के पराक्रम की निशानी ‘जोरावर किला’ मौजूद है, मगर अफगान लड़ाकों को शिकस्त देने वाला कश्मीर का फातिम जनरल जोरावर सिंह तथा क्रांतिवीर राम सिंह पठानिया हिमाचल के इतिहास में गुमनामी के दौर में चले गए। देश में 1857 के देशव्यापी विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति के तौर पर माना जाता है, मगर उस संग्राम में मंगल पांडे व झांसी की रानी की तरह ब्रिटिश सत्ता की खिलाफत करने वाले कुल्लू की बदाह रियासत के कंवर युवराज प्रताप सिंह हिमाचल के अग्रणी योद्धा थे। उस क्रांतिवीर को अंग्रेजों ने गिरफ्तार करके 3 अगस्त 1857 को धर्मशाला के पुलिस मैदान में सार्वजनिक रूप से फांसी की सजा दे दी थी। 25 अगस्त 1944 को अंग्रेज सरकार ने मेजर दुर्गामल को लाल किले में फांसी पर चढ़ा दिया था जो कि ‘आज़ाद हिंद फौज’ के सैनिक थे। भारत व पाक के बीच हुए चार बड़े युद्धों में पाक सिपहसालारों का मुख्य केंद्र बिंदु कश्मीर ही रहा है। कश्मीर को महफूज रखने में हिमाचल की सैन्य कुर्बानियों का सिलसिला 1947 में पाक सेना के ऑपरेशन ‘गुलमर्ग’ से शुरू हो गया था जब मेजर सोमनाथ शर्मा ने 3 नवंबर 1947 में शहादत देकर श्रीनगर की धरती पर तिरंगा फहराकर पाक सुल्तानों के अरमानों पर पानी फेर दिया था। स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सरफराज होने का गौरव उसी हिमाचली जांबाज को प्राप्त है। 1965 पाक ‘आपरेशन जिब्राल्टर’ में कश्मीर के पुंछ क्षेत्र में बिलासपुर के सिपाही सुखराम सिंह ठाकुर ‘वीर चक्र’ ने अदम्य साहस का परिचय देकर पाक सेना की मंसुबाबंदी को नेस्तानाबूद करके अपना बलिदान दिया था।

 10 दिसंबर 1971 की रात को पाक की सरहद में घुसकर भारत पर पाक सेना के हमले की पूरी तजवीज को ध्वस्त करके पाकिस्तान के शकरगढ़ में तिरंगा फहराने वाला जाबांज मेजर गुरूदेव सिंह जसवाल (22 पंजाब) भी हिमाचली सपूत था। युद्धक्षेत्र में उच्चकोटी के सैन्य नेतृत्व व पराक्रम के लिए मेजर जसवाल को ‘वीर चक्र’ (मरणोपरांत) से नवाजा गया था। मई 1999 में कारगिल के दुर्गम पहाड़ों की बुलंदियों पर पाक सेना की घुसपैठ का पता लगाने वाले कैप्टन सौरभ कालिया से लेकर उस युद्ध को अंजाम तक पहुंचाने में कैप्टन विक्रम बतरा ‘परमवीर चक्र’ सरीखे हिमाचल के 52 युवा सैनिकों ने मजीद किरदार अदा करके मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। बेशक वर्तमान में हिमाचल प्रदेश शिक्षा, बागवानी, पर्यटन व कई अन्य विकास कार्यों में उन्नति करके उस मुकाम पर पहुंच गया है कि देश-विदेश में किसी तारूफ का मोहताज़ नहीं है, मगर देश की आज़ादी व स्वाभिमान के लिए बलिदान देकर शौर्यगाथाओं के मजमून लिखने वाले वीरभूमि के शूरवीरों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए। केन्द्र सरकार को चाहिए कि सर्वोच्च सैन्य पदक दो ‘विक्टोरिया क्रास’ व चार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित प्रदेश के रणबांकुरों के नाम पर राज्य में सैन्य संस्थान या वर्षों से चली आ रही ‘रेजिमेंट’ की मांग पर तवज्जो दे ताकि भावी पीढि़यां राज्य के शूरवीरों के अविस्मरणीय सैन्य योगदान व क्रांतिकारी ऐतिहासिक विरासत से अवगत हो सके।