झिरकेश्वर महादेव

मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस रमणीक स्थल पर पूजा-अर्चना कर शिवलिंग की स्थापना की थी। तभी से यह जगह तपोभूमि के रूप में विख्यात है। श्रद्धालु इसे झिरकेश्वर महादेव के नाम से भी पुकारते हैं। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली से बड़ी संख्या में शिव भक्त यहां आते हैं…

श्रावण मास की पुराणों में बहुत अधिक महिमा है। श्रावण मास भगवान शिव को विशेष प्रिय है। श्रावण मास आते ही चारों और वातावरण शिवभक्ति में होता है। भगवान शिव के अनेको मंदिर पूरी दुनिया में हैं और प्रत्येक की अद्भुत महिमा और इतिहास है। ऐसा ही एक प्राचीन झीरी वाला शिव मंदिर का अनूठा इतिहास है। हरियाणा-राजस्थान बार्डर पर फिरोजपुर झिरका में प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण अरावली की वादियों की गोद में है यह मंदिर। मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस रमणीक स्थल पर पूजा-अर्चना कर शिवलिंग की स्थापना की थी। तभी से यह जगह तपोभूमि के रूप में विख्यात है। श्रद्धालु इसे झिरकेश्वर महादेव के नाम से भी पुकारते हैं। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली से बड़ी संख्या में शिव भक्त यहां आते हैं। यहां अरावली पर्वत श्रृंखलाओं की हरियाली सैलानियों व भक्तों का मन मोह लेती है।  कहा जाता है कि यहां पवित्र गुफा में शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही जन्म-जन्मांतर के दुखों का निवारण हो जाता है। मान्यता है कि यहां की पर्वत मालाओं से बहते प्राकृतिक झरने में स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। किंवदंतियों के अनुसार 1846 के तत्कालीन तहसीलदार जीवन लाल शर्मा को अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं में शिवलिंग होने का स्वप्न आया था। इसका अनुसरण करते हुए उन्होंने पवित्र शिवलिंग खोज निकाला। उसके बाद से यहां पूजा-अर्चना की जा रही है। शिवरात्रि पर यहां मेले में श्रद्धालु नीलकंठ, गौमुख व हरिद्वार से पवित्र कांवड़ लेकर आते हैं। इसके अलावा क्षेत्र की नवविवाहित महिलाएं संतान प्राप्ति के लिए शिवलिंग पर दोघड़ चढ़ाती हैं। यहां श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनी हैं। प्राचीन समय से यहां एक कदम का वृक्ष है। श्रद्धालु मनोकामना पूर्ति के लिए यहां धागा बांधते हैं। मंदिर के महंत मौनी बाबा के नाम से विख्यात हैं, जिन्होंने लगातार 12 वर्ष तक मौन व्रत रख कठोर तपस्या की थी। विकास समिति मंदिर के रखरखाव का जिम्मा संभाल रही है और दो सरोवर भी बनवाए हैं।

जयघोष से गूंज उठती हैं अरावली की वादियां

मंदिर परिसर में बनी भोलेनाथ की प्रतिमा और उनकी जटा से निकलती धारा भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है। शाम को पूजा व आरती के वक्त यहां घंटे, नगाड़ों की आवाज पहाड़ों से टकराकर कानों में पड़ती है और भोलेनाथ के जयघोष से अरावली की वादियां गूंज उठती हैं। यह मंदिर दिल्ली से 115 और पलवल से 70 किमी. की दूरी पर स्थित है। वहीं, राजस्थान के तिजारा से 17 किमी. व अलवर से 60 किमी. की दूरी पर है। यहां बसों के अलावा निजी साधनों व टैक्सी के जरिये भी पहुंचा जा सकता है।

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