Friday, September 24, 2021 08:23 AM

गोवा के इतिहास का हमसे नाता

प्रदेश में आए नए राज्यपाल ने हमारे सरोकारों और याददाश्त को झिंझोड़ कर रख दिया और आखिर हमें यह ढूंढने की नौबत आ गई कि जिस वीर सैनिक राम सिंह की गोवा मुक्ति आंदोलन में भागीदारी रही, उसका परिवार है कहां। प्रदेश के पास न संदर्भ है, न फाइल और न ही कला, भाषा एवं संस्कृति विभाग या अकादमी की कोई किताब इस महान विभूति को ढूंढने में काम आई। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर जिस सम्मान के साथ हमारे बीच के योद्धा को आदरांजलि दे रहे हैं, दरअसल उस शौर्य को हिमाचल ने आज तक छुआ तक नहीं। बहरहाल राज्यपाल की कृतज्ञता के आगे हम केवल यह प्रायश्चित कर सकते हैं कि प्रदेश ने अपने सपूतों का इतिहास लिखने में कहीं कोताही की है। दोषी हमारे विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, शोध व इतिहास का ज्ञान भी है, जो वर्षों बाद भी अपनी रूह में माटी का कर्ज नहीं उतार सका। विडंबना यह कि हमारे छात्रों को इतिहास पढ़ाने वाले शिमला तथा केंद्रीय विश्वविद्यालय भी अंदर से कितने खोखले साबित हो रहे हैं। विडंबना यह भी कि स्वतंत्रता सेनानियों को ताज पहनाने वाले हाथ भी खाली हैं। आखिर यह राम सिंह कौन, जिसके प्रति एक राज्यपाल को गोवा के इतिहास से तो ज्ञात है, लेकिन जिसकी मातृभूमि को यह भी पता नहीं कि कभी किसी हिमाचली सैनिक ने गोवा को मुक्त कराया था।

 हालांकि गोवा मुक्ति संग्राम की अनेक कहानियां व विचारधारा की एक नई पौध उभर आई है, लेकिन हमें तो बस इस राम सिंह का चित्र चाहिए ताकि माल्यार्पण किया जा सके। बेशक हिमाचल ने राष्ट्रीय गान की धुन बनाने वाले कैप्टन राम सिंह को भी जन्म दिया और उनके प्रति वर्षों से कृतज्ञता दर्ज है, लेकिन इसी फलक पर अब एक नया सितारा सामने आया है। क्या गोवा के सम्मान का पात्र हिमाचल के नाम से जुड़ पाएगा या हम किसी सियासी मुहूर्त में ऐसे सम्मान का पदचाप सुनेंगे। जो भी हो राज्यपाल आर्लेकर जी ने अपनी पृष्ठभूमि का एक नाता हिमाचल से जोड़ कर यह बता दिया कि संवैधानिक पद के साथ नैतिकता का कितना बड़ा परिदृश्य जुड़ सकता है। राज्यपाल ने पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री रहे शांता कुमार के विजन को दृश्य पटल पर रखते हुए, कमोबेश गैरराजनीतिक आधार पर अतीत को याद करने का अवसर दिया है। हिमाचल को राज भवन से देखने की उच्च परंपराओं के बीच यहां की संस्कृति, सभ्यता व पहाड़ीपन अलंकृत होता रहा है। पूर्व में विष्णु कांत शास्त्री के नाम का संस्मरण आते ही हिमाचल के देवस्थलों के सांस्कृतिक महत्त्व पर एक रोशनी का प्रवाह दिखाई देता है। तत्कालीन राज्यपाल शास्त्री जी ने मंदिरों में श्लोकोच्चारण तथा मंत्रोच्चारण की बारीकियों को समझते हुए, इन्हें सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने की मुहिम चलाई थी, लेकिन बाद में यह अभियान भी कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग के नाक से उतर गया।

 आश्चर्य यह कि ऑनलाइन कार्यक्रमों की महानता में अपने राष्ट्रीय संपर्कों को साधते अधिकारी एक ओर उपनिषद व तमाम धार्मिक ग्रंथों पर व्याख्याएं करवा रहे हैं या फिल्म से जुड़ी हस्तियों की पूजा कर रहे हैं, लेकिन अपने दायित्व के अधीन मंदिर व्यवस्था की उस उच्च परंपरा का निर्वहन नहीं करवा पा रहे हैं, जिसे कभी एक पूर्व राज्यपाल ने अपने सरोकारों से सींचा था। क्या मंदिर परिसरों में मंत्रोच्चारण के सलीके और पूजा पद्धति की मान्यताओं में ज्ञान की गंगा लाने में कला-संस्कृति विभाग असमर्थ ही रहेगा। कायदे से नए राज्यपाल जिस महानुभाव यानी वीर सैनिक राम सिंह के परिवार का पता पूछ रहे हैं, उसके संपर्क व जीवन यात्रा के प्रकाशन तो अकादमी के अस्तित्व के साथ नत्थी होने चाहिए थे। उम्मीद है भाषा विभाग ऐसे गंभीर विवेचन तथा राज्य के सम्मान के साथ जुड़े विषयों पर अधिकतम लेखन कार्य करवाने के प्रति भविष्य में कटिबद्ध होगा, वरना बाकी कार्य तो सिर्फ चंद लोगों के स्वार्थ का महिमामंडन ही माना जाएगा। वर्षों से एक राज्य स्तरीय स्वतंत्रता सेनानी स्मारक की भूमि धर्मशाला में चयनित है, लेकिन इसके निर्माण की रसीद भी शायद गायब ही रहेगी।